इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने लोकतंत्र और प्रेस की आजादी के हक में एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सरकारी स्कूलों की बदहाली और कमियों को उजागर करने वाले एक पत्रकार पर दर्ज एफआईआर (FIR) पर रोक लगा दी है।
अदालत ने प्रशासन की इस दमनकारी कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सिस्टम की खामियों को सामने लाने वाले पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करना 'किलिंग द मैसेंजर' (संदेशवाहक को ही मार देने) के समान है। अदालत का मानना है कि जो शख्स समाज की भलाई के लिए सच्चाई बता रहा है, उसी को सजा देना सरासर नाइंसाफी है।
हाई कोर्ट का यह फैसला उन पत्रकारों के लिए एक बड़ी राहत और हिम्मत है, जो जमीनी हकीकत और सरकारी दावों की पोल खोलते हैं। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि अपनी नाकामियां छिपाने के लिए पुलिस और प्रशासन का डर दिखाकर सच की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।