#बालाघाट
नरवाई जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति और पर्यावरण को होता है नुकसान, किसानों को करें जागरूक : कलेक्टर आदित्य सिंह
कम्बाईन हार्वेस्टर के साथ बेलर मशीन लगाना अनिवार्य, पराली के बंडल बनाकर पशु चारे के रूप में उपयोग करने पर दिया जोर
खेतों में धान की कटाई के बाद बचने वाली नरवाई (पराली) को जलाने से न केवल पर्यावरण प्रदूषित होता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरा शक्ति और कृषि के लिए उपयोगी जैविक तत्वों को भी नुकसान पहुंचता है। नरवाई जलाने से उठने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ाता है तथा वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य हानिकारक गैसों का उत्सर्जन होता है। इससे मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। नरवाई के उचित प्रबंधन और जिले में पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाने के उद्देश्य से 04 नवंबर को कलेक्ट्रेट सभागार में कम्बाईन हार्वेस्टर एवं कस्टम हायरिंग सेंटर संचालकों की जिला स्तरीय कार्यशाला आयोजित की गई।
कलेक्टर श्री आदित्य सिंह की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यशाला में उप संचालक कृषि श्री फूलसिंह मालवीय, आत्मा परियोजना संचालक डॉ. रामनाथ पटेल, जिला परिवहन अधिकारी श्री देवेश बाथम, कृषि अभियांत्रिकी के सहायक यंत्री श्री सुखराम उइके, तकनीकी सहायक श्री सुनील चौधरी सहित हार्वेस्टर संचालक उपस्थित थे। जिले के विभिन्न क्षेत्रों के कम्बाईन हार्वेस्टर एवं कस्टम हायरिंग सेंटर संचालक वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से भी कार्यशाला में शामिल हुए।
कार्यशाला में कलेक्टर श्री आदित्य सिंह ने कहा कि जिले में कहीं भी नरवाई जलाने की घटना नहीं होनी चाहिए। इसके लिए किसानों को जागरूक करने में हार्वेस्टर संचालकों और कस्टम हायरिंग सेंटर संचालकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि कम्बाईन हार्वेस्टर के साथ बेलर मशीन अनिवार्य रूप से लगाई जाए, ताकि धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पैरा को जलाने के बजाय उसके बंडल तैयार किए जा सकें।
कलेक्टर श्री सिंह ने कहा कि खेतों में नरवाई जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं। साथ ही मिट्टी के जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों को भी नुकसान पहुंचता है। इससे भूमि की प्राकृतिक उर्वरता प्रभावित होती है और किसानों को भविष्य में अधिक उर्वरकों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। वहीं, पराली जलाने से निकलने वाला धुआं आसपास के वातावरण में फैलकर वायु की गुणवत्ता खराब करता है। इससे सांस संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ने के साथ ही सड़क पर आवागमन करने वालों को भी परेशानी होती है। इसलिए नरवाई को आग लगाने के बजाय उसका उपयोगी प्रबंधन करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि इस वर्ष बालाघाट के पड़ोसी क्षेत्रों में कम वर्षा होने के कारण वहां पशुओं के लिए चारे की समस्या उत्पन्न होने की संभावना है। ऐसे में बालाघाट जिले से धान की पैरा की मांग अधिक रहने की उम्मीद है। किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का अवसर भी बन सकता है। किसान धान की पैरा को खेतों में जलाने के बजाय बेलर मशीन की सहायता से उसके बंडल तैयार कर सुरक्षित रखें, ताकि जरूरत वाले क्षेत्रों में इसका उपयोग पशु चारे के रूप में किया जा सके।
कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि फसल अवशेष किसानों के लिए अनुपयोगी कचरा नहीं हैं, बल्कि उनका उचित प्रबंधन कर उन्हें संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे एक ओर खेतों की मिट्टी और पर्यावरण सुरक्षित रहेंगे, वहीं दूसरी ओर पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता बढ़ेगी। पराली के संग्रहण और उपयोग से किसानों को आर्थिक लाभ मिलने की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
कार्यशाला में कम्बाईन हार्वेस्टर एवं कस्टम हायरिंग सेंटर संचालकों की समस्याओं और सुझावों को भी सुना गया। अधिकारियों ने नरवाई प्रबंधन के लिए किसानों, कृषि विभाग, हार्वेस्टर संचालकों और कस्टम हायरिंग सेंटर संचालकों के बीच समन्वय स्थापित कर काम करने पर जोर दिया। कार्यशाला के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि नरवाई को जलाने के बजाय उसका सदुपयोग करना खेतों की सेहत, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आर्थिक मजबूती के लिए जरूरी है।
#CMMadhyaPradesh
#JansamparkMP
#minmpkrishi