नालंदा विश्वविद्यालय, राजगीर द्वारा अपने सभी विद्यार्थियों के लिए नालंदा- बोध का एक अनिवार्य पाठ्यक्रम "Nalanda Spirit" नाम से इस सत्र से प्रारंभ किया गया है।यह पाठयक्रम प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के आत्म - तत्त्व को केंद्र में रखकर तैयार किया गया है।वास्तव में यह न सिर्फ भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनर्स्थापना का अभिनव प्रयास है बल्कि भारत के सभ्यतागत विमर्श की पुनर्स्थापना का भी एक सार्थक प्रयास है। चाहे सटीक तर्कों के माध्यम से सत्य तक पहुंचने की भारतीय परम्परा "शास्त्रार्थ "हो या विकास के साथ प्रकृति के संरक्षण का धारणीय संकल्प,चाहे नेट जीरो कैंपस की बात हो या "सहभागिता"के माध्यम से नजदीकी गांवों के सुख - दुख की चिंता और उन्हें कुशल और आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास।वास्तव में,नालंदा स्पिरिट आज सिर्फ भारतीय सभ्यता के की पुनर्स्थापना का अभिनव सांस्थानिक प्रयास नहीं है बल्कि विश्व की समस्याओं और चुनौतियों का सार्थक और अनिवार्य समाधान भी है। वर्तमान कुलपति प्रो.सचिन चतुर्वेदी जी के दृष्टिसम्पन्न नेतृत्व में जब नालंदा- बोध आज देश - दुनिया में प्रतिमान केन्द्र की तरह उभर रहा है तो कुछ बाह्य ताकतों द्वारा इस परंपरा में अवरोध उत्पन्न करने के लिए विदेश में बैठे भारतीयों को अपना हथकंडा बनाया जा रहा है और इसे हिंदू सभ्यता और बौद्ध सभ्यता के रूप में पृथक् कर एक नया नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।वास्तव में भारतीय सभ्यता अपने एकत्व में ही वैविध्य को संजोए हुए है।इस श्रृंखला में जितने भी भाषण हुए हैं, अद्वितीय और लाजवाब रहे हैं।भारतीय ज्ञान परंपरा के मूर्धन्य लोगों के भाषण हुए हैं।लेकिन दुर्भाग्य से कुछ लोगों को उभरता हुआ नया प्रतिमान केन्द्र पच नहीं रहा है क्योंकि इसका ध्येय भारतीय है,भाव भारतीय है और दृष्टि भारतीय है।अमेरिका में बैठकर भारत से सहानुभूति का स्वांग रचने वालों को नालंदा बोध समझ में नहीं आएगा। चरैवेति चरैवेति यही तो मंत्र है अपना.........!
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Bihar, India | Sep 7, 2026