कान्हा में गूंजीं 51 नन्हे बारहसिंगों की किलकारियां, आबादी बढ़कर 1100 के पार
कभी 66 की संख्या तक सिमटी थी हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा की आबादी, अब बांधवगढ़ में बसाने की तैयारी
वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में मध्यप्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व से उत्साहजनक खबर सामने आई है। कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा की आबादी अब बढ़कर करीब 1100 तक पहुंच गई है। इसी बीच कान्हा के घास के मैदानों में 51 नवजात बारहसिंगा छावनों के जन्म से वन विभाग में खुशी का माहौल है। अब इस दुर्लभ वन्यजीव को बांधवगढ़ नेशनल पार्क में भी बसाने की तैयारी की जा रही है।
1970 में सिर्फ 66 रह गए थे बारहसिंगा
कान्हा नेशनल पार्क की पहचान माने जाने वाले हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा का अस्तित्व एक समय गंभीर संकट में था। वर्ष 1970 में इनकी संख्या घटकर महज 66 रह गई थी। इसके बाद वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के संरक्षण प्रयासों, वैज्ञानिक प्रबंधन और लगातार निगरानी से इनकी आबादी में वृद्धि हुई। आज इनकी संख्या करीब 1100 बताई जा रही है, जिसे वन्यजीव संरक्षण के महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
51 नवजात छावनों की निगरानी में जुटा प्रबंधन
कान्हा के घास के मैदानों में 51 नए बारहसिंगा छावनों का जन्म हुआ है। जन्म के शुरुआती दिनों में छावने बेहद कमजोर होते हैं और खुद की सुरक्षा करने में सक्षम नहीं होते। ऐसे में पार्क प्रबंधन उनकी सुरक्षा और निगरानी पर विशेष ध्यान दे रहा है, ताकि उन्हें शिकारियों और अन्य संभावित खतरों से बचाया जा सके।
वन विभाग के अनुसार, बारहसिंगों के जन्म की प्रक्रिया दिसंबर से शुरू होकर जनवरी और फरवरी तक जारी रहती है। इस अवधि में नवजात छावनों की सुरक्षा और उनकी गतिविधियों पर नजर रखना महत्वपूर्ण होता है।
दूसरे राष्ट्रीय उद्यानों में भी बढ़ाया जा रहा संरक्षण
कान्हा से बारहसिंगों को सतपुड़ा और संजय गांधी सहित अन्य राष्ट्रीय उद्यानों में भेजा जा चुका है, जहां इस प्रजाति को स्थापित करने और उसकी आबादी बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अब बांधवगढ़ नेशनल पार्क में भी बारहसिंगों को स्थानांतरित करने की तैयारी है। इससे वहां के वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
1500 से अधिक आबादी का लक्ष्य
कभी महज 66 की संख्या तक सिमट गए हार्ड ग्राउंड बारहसिंगा की आबादी का करीब 1100 तक पहुंचना संरक्षण के निरंतर प्रयासों को दर्शाता है। अब लक्ष्य इनकी संख्या 1500 से अधिक करना और दूसरे संरक्षित क्षेत्रों में भी इस प्रजाति को सुरक्षित रूप से स्थापित करना है।
कान्हा की यह कहानी बताती है कि वैज्ञानिक प्रबंधन, सतत निगरानी और संरक्षण के प्रयासों से संकटग्रस्त वन्यजीवों के अस्तित्व को नई दिशा दी जा सकती है।
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