*वन हेल्थ के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर जिला स्तरीय समन्वय तंत्र होगा सुदृढ़*
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*मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच समन्वय स्थापित कर बीमारियों की रोकथाम, निगरानी एवं त्वरित कार्रवाई पर जोर*
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पश्चिमी सिंहभूम जिला समाहरणालय स्थित प्रकोष्ठ में उपायुक्त श्री मनीष कुमार की अध्यक्षता में वन हेल्थ कार्यक्रम के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर बैठक आयोजित की गई। बैठक में उप विकास आयुक्त श्री उत्कर्ष कुमार, सिविल सर्जन डॉ. जुझार माझी सहित स्वास्थ्य, पशुपालन एवं पशु चिकित्सा, वन एवं पर्यावरण, कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल एवं स्वच्छता, पंचायती राज सहित संबंधित विभागों के पदाधिकारी उपस्थित रहे। बैठक में मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच पारस्परिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए जिले में वन हेल्थ दृष्टिकोण को प्रभावी रूप से लागू करने, स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की समय रहते पहचान करने, उनकी रोकथाम एवं निगरानी तथा किसी संभावित बीमारी के प्रकोप की स्थिति में त्वरित एवं समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करने पर विस्तार से चर्चा की गई।
उपायुक्त श्री मनीष कुमार ने कहा कि वर्तमान समय में स्वास्थ्य संबंधी अनेक चुनौतियां मानव, पशु एवं पर्यावरण के परस्पर संबंधों से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में किसी भी संभावित स्वास्थ्य जोखिम से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय, नियमित सूचना आदान-प्रदान और समयबद्ध संयुक्त कार्रवाई आवश्यक है। उन्होंने संबंधित विभागों को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करते हुए समन्वित कार्ययोजना तैयार करने तथा जमीनी स्तर से प्राप्त सूचनाओं पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि वन हेल्थ की समन्वित व्यवस्था जिले में संभावित स्वास्थ्य खतरों की समय रहते पहचान, विभागों के बीच त्वरित सूचना आदान-प्रदान, संयुक्त जांच एवं प्रभावी नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर किसी स्थानीय स्वास्थ्य जोखिम को व्यापक संकट में बदलने से पहले ही नियंत्रित करना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य होगा।
*◆ जिला स्तर पर सुदृढ़ होगा वन हेल्थ समन्वय तंत्र*
बैठक में प्रस्तावित जिला वन हेल्थ व्यवस्था के तहत जिला स्तर पर वन हेल्थ समिति के गठन एवं उसके प्रभावी संचालन पर चर्चा की गई। समिति के तकनीकी स्तर पर जिला सर्विलांस पदाधिकारी/महामारी विशेषज्ञ, पशु चिकित्सा प्रतिनिधि, वन एवं पर्यावरण प्रतिनिधि तथा प्रयोगशाला के नोडल प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। वहीं प्रखंड एवं समुदाय स्तर पर प्रखंड चिकित्सा पदाधिकारी, पशु चिकित्सा पदाधिकारी एवं फील्ड स्टाफ, वन एवं सामुदायिक कार्यकर्ता, पंचायत एवं शहरी निकाय प्रतिनिधि तथा आशा एवं आंगनबाड़ी सहित अन्य अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं के माध्यम से सूचना एवं संदर्भन व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
*◆ समुदाय से जिला स्तर तक त्वरित सूचना प्रवाह पर जोर*
वन हेल्थ के तहत समुदाय स्तर से प्राप्त स्वास्थ्य संबंधी संकेतों एवं असामान्य घटनाओं की जानकारी को प्रखंड स्तर पर सत्यापित कर शीघ्र जिला स्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था विकसित की जाएगी। जिला स्तर पर स्वास्थ्य, पशु चिकित्सा तथा वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रतिनिधियों द्वारा संयुक्त रूप से जोखिम का आकलन किया जाएगा। आवश्यकता के अनुसार संयुक्त जांच, प्रयोगशाला के माध्यम से पुष्टि तथा नियंत्रणात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। कार्रवाई के उपरांत समुदाय तक आवश्यक जानकारी एवं फीडबैक पहुंचाने पर भी विशेष बल दिया गया, ताकि लोगों में जागरूकता के साथ-साथ स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को लेकर भरोसा कायम रहे।
*◆ रोकथाम, पहचान और त्वरित कार्रवाई होगी मुख्य रणनीति*
जिले में वन हेल्थ प्रणाली के तहत रोकथाम, पहचान एवं त्वरित कार्रवाई को प्रमुख आधार बनाकर कार्य करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। रोकथाम के अंतर्गत जोखिम वाले क्षेत्रों का मानचित्रण, सामुदायिक जागरूकता, पशु टीकाकरण एवं नियंत्रण तथा आवश्यक पर्यावरणीय कार्रवाई की जाएगी। इसी प्रकार बीमारी या स्वास्थ्य जोखिम की पहचान के लिए मानव, पशु एवं पर्यावरण से जुड़े स्वास्थ्य संकेतकों की निगरानी, प्रयोगशाला नेटवर्क से बेहतर समन्वय, आंकड़ों का साझा उपयोग तथा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत किया जाएगा। संभावित प्रकोप की स्थिति में संयुक्त जांच, समन्वित नियंत्रणात्मक कार्रवाई, जोखिम संबंधी संचार तथा घटना के बाद समीक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
*◆ जूनोटिक एवं वेक्टर जनित बीमारियों पर विशेष निगरानी*
वन हेल्थ के तहत पश्चिमी सिंहभूम जिले में रेबीज, लेप्टोस्पायरोसिस, ब्रुसेलोसिस, एंथ्रेक्स, जापानी इंसेफेलाइटिस सहित अन्य स्थानीय रूप से प्रासंगिक पशुजनित एवं जूनोटिक बीमारियों की निगरानी को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके साथ ही मलेरिया, डेंगू एवं अन्य वेक्टर जनित बीमारियों, सर्पदंश, मानव-वन्यजीव एवं मानव-पशु संपर्क से जुड़े जोखिमों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। बैठक में रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध, असुरक्षित खाद्य एवं पेयजल, अपशिष्ट प्रबंधन, प्रदूषण तथा पर्यावरणीय क्षरण जैसे विषयों को भी वन हेल्थ के महत्वपूर्ण जोखिम क्षेत्रों के रूप में शामिल करने पर चर्चा की गई।
*◆ विभागवार जिम्मेदारियों को किया जाएगा स्पष्ट*
वन हेल्थ के प्रभावी क्रियान्वयन में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा मानव स्वास्थ्य की निगरानी, असामान्य बीमारी समूहों की पहचान, रोगियों की जांच एवं उपचार, संदर्भन, प्रयोगशाला जांच तथा संयुक्त प्रकोप जांच में प्रमुख भूमिका निभाई जाएगी। पशुपालन एवं पशु चिकित्सा विभाग द्वारा पशु रोगों की निगरानी, असामान्य बीमारी अथवा पशु मृत्यु की सूचना, पशु टीकाकरण तथा संभावित जूनोटिक बीमारी के मामलों की जांच में सहयोग किया जाएगा। वन, पर्यावरण एवं वन्यजीव क्षेत्र से जुड़े विभागों द्वारा वन्यजीव स्वास्थ्य संबंधी संकेतों, असामान्य वन्यजीव मृत्यु तथा मानव-वन्यजीव संपर्क से जुड़े मामलों की निगरानी एवं जानकारी साझा की जाएगी। कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल एवं स्वच्छता से जुड़े विभाग सुरक्षित कृषि पद्धतियों, खाद्य जनित बीमारियों की निगरानी, खाद्य नमूना जांच, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता एवं अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाएंगे।
*◆ पंचायत एवं समुदाय की भागीदारी होगी महत्वपूर्ण*
वन हेल्थ व्यवस्था को जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाने में ग्राम पंचायतों, जनजातीय एवं सामुदायिक प्रतिनिधियों, विद्यालयों तथा आशा, आंगनबाड़ी सहित अन्य अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। समुदाय स्तर पर रेबीज, सर्पदंश, पशुजनित बीमारियों, सुरक्षित भोजन एवं पेयजल तथा समय पर उपचार लेने के संबंध में जागरूकता बढ़ाई जाएगी। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर जोखिम वाले क्षेत्रों, व्यवसायों तथा मौसमी स्वास्थ्य घटनाओं की पहचान में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने पर बल दिया गया।
*◆ प्रथम चरण में तैयार होगा जिला वन हेल्थ कार्ययोजना*
बैठक में वन हेल्थ कार्यक्रम के प्रारंभिक चरण के लिए जिला वन हेल्थ समिति का गठन, विभिन्न विभागों के नोडल पदाधिकारियों एवं प्रखंड स्तरीय संपर्क पदाधिकारियों का नामांकन, प्राथमिकता वाले जूनोटिक एवं अन्य स्वास्थ्य जोखिमों की सूची को अंतिम रूप देने तथा उपलब्ध प्रयोगशालाओं, निगरानी तंत्र, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों एवं संसाधनों का मानचित्रण करने पर चर्चा की गई। इसके अतिरिक्त विभागवार दायित्व निर्धारित करते हुए समयबद्ध जिला वन हेल्थ कार्ययोजना तैयार करने, प्रत्येक माह तकनीकी समन्वय बैठक तथा प्रत्येक तिमाही जिला स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित करने का प्रस्ताव रखा गया। पहले 90 दिनों के भीतर संयुक्त अभ्यास अथवा क्षेत्रीय जांच अभियान आयोजित करने पर भी विशेष जोर दिया गया।