*समाज, राष्ट्र व विश्व की सेवा में उपयोग होने पर सत्ता व शक्ति की सार्थकता-आचार्य रामदयालजी महाराज*
*बौद्धिक, आर्थिक, मानसिक विकृतियों के कारण परिवार,समाज व राष्ट्र परेशान*
*माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में दैनिक चातुर्मासिक सत्संग*
भीलवाड़ा :निलेश कांठेड़ ( वरिष्ठ पत्रकार) 17 अक्टूबर। जीवन में हमे जो प्राप्त है वह पर्याप्त है, जो प्राप्त है उसमें संतोष नहीं होना ही सबसे बड़ा दुःख है। जो मिला है उसका आनंद लेना चाहिए। केवल उपलब्धि पाना जीवन की सार्थकता नहीं हो सकती। नीतिशास्त्र कहते है प्रयास, प्रयत्न व पुरूषार्थ करने पर जड़मत भी परम सुजान हो जाता है। पुरूषार्थ एवं परोपकार करने एवं पुण्य के प्रताप से निर्धन भी धनवान बनता है। ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत शनिवार को दैनिक सत्संग में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो देता है वहीं प्राप्त करता है। देने से कीर्ति बढ़ती है। बुद्धि कर्म के अनुसार प्राप्त होती है। सत्ता, शक्ति, संपति, सौन्दर्य, संतान भी उपलब्धि है पर समाज, राष्ट्र व विश्व की सेवा में इसकी सार्थकता है। माता-पिता की सेवा धर्म नहीं कर्तव्य है पर गरीब की सेवा करना कर्तव्य नहीं धर्म है।
सत्संग में आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में प्रकृति, विकृति व संस्कृति का ध्यान रहे। प्रकृति में जीना सीखे, विकृति को उखाड़ फेंके एवं संस्कृति की अर्चना कर जीवन को सत्यम शिवम सुन्दरम बनाओ। विकृति व्यक्ति, परिवार,समाज, राष्ट्र, विश्व किसी की भी हो दुःख देने वाली होती है इसलिए ये सभी विकार व विकृति रहित होने चाहिए। इसीलिए हमारा राष्ट्र एवं विश्व निर्विकार की उपासना करता है। जहां विकार होता है वहां पूजा नहीं होती है। निर्विकार दिव्य गुण की सारा संसार पूजा करता है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक, आर्थिक, मानसिक विकृतियों के कारण आज परिवार,समाज व राष्ट्र परेशान है। इन विकृतियों का ही दुष्परिणाम है कि तीन दिन में चार जनों को फांसी की सजा मिल चुकी है।
आचार्य रामदयाल महाराज ने कहा कि परमात्मा की भक्ति कभी सत्ता व रूप को मोहताज नहीं होती। संसार का सुख दुःख ओर कष्ट देने वाला है। राम नाम के सत्संग में अद्भुत सुख है ओर इसे प्राप्त करने वाला भाग्यशाली होता है। हमारा जीवन विरक्त व अनासक्त राम व भरत की तरह त्यागमय होना चाहिए। उनका त्यागमय जीवन ऐसा था कि वनवास के राम भरत से मिले तो पहचानना मुश्किल हो गया राम कौन ओर भरत कौन है। राम का चरित्र कोई छू भी नहीं सकता पर भरत के चरित्र ने उससे भी उंचाई प्राप्त कर ली ओर विलक्षणता के शिखर पर पहुंच गए। उन्होंने कहा कि रोग दो प्रकार के असाध्य एवं दुसाध्य होते है। जिसका कोई निदान नहीं होता वह असाध्य रोग एवं जिसकी साधना के लिए दुर्लभता का पथिक बनना पड़े वह दुसाध्य रोग होता है। संसार में अधिकतर लोगों की आंखे उंची व दृष्टि नीची होती है जबकि व्यक्ति की आंखे नीची व दृष्टि उंची होनी चाहिए। परमात्मा को देखने का अपना तरीका ही विपन्न व दुःखी जीवन को सम्पन्न बना देता है।
आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। स्वरूपाबाई महिला मण्डल की सदस्यों ने भजन की प्रस्तुति दी। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। प्रतिदिन रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। दैनिक सत्संग सुबह 9 बजे से हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।