विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी विभाग भिवानी द्वारा बंधुत्व दिवस कार्यक्रम आयोजित
भिवानी, 14 सितंबर । विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी विभाग भिवानी द्वारा हलवासिया विद्या विहार स्कूल में 11 सितंबर 1893 को शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानंद जी द्वारा की गई ऐतिहासिक सिंह गर्जना की स्मृति में विश्व बंधुत्व दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी चंद्रशेखर तलवार ने शिरकत की। कार्यक्रम का शुभारंभ परंपरागत रूप से तीन बार ओमकार मंत्रोच्चारण और भारत माता एवं स्वामी विवेकानंद जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी विभाग भिवानी प्रमुख लाल बहादुर शास्त्री ने सभी आगंतुकों का हृदय से स्वागत किया। उन्होंने अपने बीज वक्तव्य में नरेंद्र से विवेकानंद बनने की यात्रा को सभी के समक्ष रखा।
शास्त्री ने बताया कि गुलामी की पीड़ा को हृदय में लिए हुए जब स्वामी जी ने सम्पूर्ण भारत का पैदल भ्रमण किया और अंत में कन्याकुमारी स्थित शिला पर पहुँचे, तो वहाँ उन्होंने तीन दिन तक अखंड ध्यान किया। वहीं उन्हें भारत माता के भूत, वर्तमान और भविष्य का साक्षात्कार हुआ और उन्होंने निश्चय किया कि भारत की नकारात्मकता को दूर कर भारत माता की सेवा करनी है और इसी संकल्प के साथ शिकागो की ओर प्रस्थान करना है।
मुख्य वक्ता चंद्रशेखर तलवार ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में कहा कि स्वामी जी ने व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र पुनर्निर्माण का मंत्र दिया।
उन्होंने शिकागो सम्मेलन की पृष्ठभूमि बताते हुए कहा कि उस समय अमेरिका अपनी खोज के 400 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा था और वह अपनी भौतिक उन्नति के साथ यह भी सिद्ध करना चाहता था कि उसका धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है।
स्वामी जी सम्मेलन से काफी पहले ही शिकागो पहुँच गए थे और उनके पास के सारे रुपए समाप्त हो चुके थे। तब किसी के सुझाव पर वे बोस्टन गए और वहाँ हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट तथा अन्य प्रोफेसरों से मिले। सभी विद्वानों ने एक स्वर में स्वामी जी को उन सबसे भी अधिक विद्वान माना।
शिकागो में जब स्वामी जी ने अपना ऐतिहासिक भाषण मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो से शुरू किया तो पूरा सभागार खड़ा हो गया और कई मिनट तक तालियों की गडग़ड़ाहट गूंजती रही।
स्वामी जी ने कहा - मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की ओर से धन्यवाद देता हूँ। मुझे गर्व है मैं ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं। मुझे गर्व है मेरे देश ने यहूदियों और पारसी धर्म के लोगों को शरण देकर मदद की।
उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता, कट्टरता और धर्मांधता ने इस सुंदर पृथ्वी पर कब्जा कर इसे हिंसा से रक्तरंजित कर दिया है। यदि यह न होता तो मानव समाज आज से कहीं अधिक उन्नत होता। अब समय है असहिष्णु भावनाओं को दूर करने का।
तलवार ने बताया कि वह सम्मान केवल विवेकानंद जी का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष का सम्मान था। इसीलिए आज भी अमेरिका में विवेकानंद स्ट्रीट मौजूद है। वहाँ के लोग कहने लगे कि हिंदू धर्म रिश्तों में सभी का पिता है और भारत भूमि सभी की माता है।
भारत लौटने के बाद स्वामी जी ने एक बार अपने गुरु के स्थान को बनवाने के लिए धन एकत्र किया, परंतु बाद में वह सारा धन बीमार लोगों की सेवा में लगा दिया और कहा कि मेरे गुरु जी ने मानव सेवा को ही माधव सेवा कहा है।
अपने उद्बोधन में एम. ए. मथाई ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के हवाले से बताया कि डॉ. साहब ने कहा था कि पिछले 200 वर्षों में विवेकानंद जैसा व्यक्तित्व पैदा नहीं हुआ।
तलवार ने आगे कहा कि शिकागो भाषण में ही देश की आजादी की नींव रख दी गई थी, तभी 1947 में हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई। स्वामी जी ने ही देश में देशभक्ति की भावना भरी। उन्होंने हीन भावना को दूर कर हमें अपने गौरवपूर्ण अतीत की याद दिलाई। जो विदेशी भारतीयों को सपेरे, गंडे-ताबीज और अंधविश्वासियों का देश बताते थे, विवेकानंद जी ने उनकी आँखें खोल दीं। उन्हीं से प्रेरणा लेकर महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह जैसे महापुरुषों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व अर्पित किया। हिंदू धर्म को जानना है तो विवेकानंद को जानना होगा।
कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन शिक्षिका बहन सीमा जांगड़ा ने किया।
मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. रवि भीष्म , अविनाश सरदाना , प्रेम प्रकाश , प्रो. दशरथ चौहान एवं महंत चरण दास उपस्थित रहे।
कार्यक्रम को सफल बनाने में नगर प्रमुख सुमन एवं कार्य पद्धति प्रमुख बलराम का विशेष योगदान रहा। इसके साथ ही कार्यकारिणी के सभी सदस्य उपस्थित रहे। इस गरिमामय अवसर पर पंजाब और हरियाणा की प्रभारी बहन प्राञ्जलि दीदी सहित नगर के अन्य गणमान्य लगभग 160 बंधु-भगिनियों की उपस्थिति रही।