शोध में एआई का इस्तेमाल करें, लेकिन शैक्षणिक ईमानदारी का रखें ध्यान: प्रो. पूनम पूनिया
रोहतक। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग की ओर से हरित अर्थव्यवस्था में बदलाव विषय पर संचालित भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) प्रायोजित 10 दिवसीय शोध पद्धति पाठ्यक्रम में विशेषज्ञों ने शोध लेखन और शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग की जानकारी दी।
बीपीएस महिला विश्वविद्यालय, खानपुर के शिक्षा विभाग की प्रो. पूनम पूनिया ने ‘शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ विषय पर व्याख्यान दिए। उन्होंने प्रतिभागियों को शोध की प्रक्रिया, शोध सामग्री पढ़ने के प्रभावी तरीके और गुणवत्तापूर्ण शोध लेखन की बारीकियों से अवगत कराया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शोध कार्य को आसान और प्रभावी बना सकती है, लेकिन इसका उपयोग जिम्मेदारी और पारदर्शिता के साथ किया जाना चाहिए।
प्रो. पूनिया ने शोध सामग्री खोजने और व्यवस्थित करने के लिए गूगल स्कॉलर लैब्स, कंसेंसस, साइस्पेस, रिसर्च रैबिट और सिमेंटिक स्कॉलर जैसे डिजिटल साधनों की उपयोगिता बताई। संदर्भ सामग्री को व्यवस्थित रखने के लिए मेंडेली की जानकारी भी दी। उन्होंने शोध में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग से जुड़े नैतिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि तकनीक का सहारा लेते समय शोध की मौलिकता और अकादमिक ईमानदारी से समझौता नहीं होना चाहिए।
दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मुरथल के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं संचार अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. मनोज दुहन ने ‘शोध की मूल बातें एवं नैतिकता’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने शोध की मूल अवधारणाओं और गुणवत्तापूर्ण शोध में नैतिक मूल्यों की भूमिका समझाई। विशेषज्ञों के व्याख्यान से प्रतिभागियों को शोध सामग्री जुटाने, संदर्भों को व्यवस्थित करने, आधुनिक तकनीक के उपयोग और शोध की नैतिकता से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी मिली।