
देखिए भारत की व्यवस्था का एक बड़ा सवाल…
भारत में अगर आप एक सिम कार्ड खरीदते हैं तो पहचान के लिए आधार या अन्य दस्तावेज मांगे जाते हैं। बैंक में खाता खोलना हो तो कई स्तर की KYC और वेरिफिकेशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अस्पताल में इलाज कराने जाएं तो मरीज की पहचान दर्ज होती है और उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी रिकॉर्ड के साथ तैयार की जाती है।
यानी देश की व्यवस्था में लगभग हर जगह यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है कि व्यक्ति कौन है और उसके द्वारा दी गई जानकारी कितनी विश्वसनीय है।
लेकिन सवाल तब उठता है, जब मामला न्यायालय में गवाही का हो।
क्या न्यायालय में किसी गवाह की पहचान और उसकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए? क्या सिर्फ किसी व्यक्ति के अदालत में आकर बयान देने से उसकी पहचान और उसके कथन को पर्याप्त आधार मान लिया जाना चाहिए?
अगर कोई व्यक्ति गलत पहचान बताकर या झूठी जानकारी देकर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करे, तो उसकी जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
यह सवाल किसी न्यायालय या न्याय व्यवस्था पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और मजबूत बनाने का सवाल है।
क्योंकि अगर सिम खरीदने से लेकर बैंक खाता खोलने तक पहचान का सत्यापन जरूरी है, तो न्याय के मंदिर में गवाही देने वाले व्यक्ति की पहचान और उसकी विश्वसनीयता को लेकर भी स्पष्ट और मजबूत व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए?
आखिर सवाल सिर्फ एक गवाह का नहीं है…
सवाल यह है कि कहीं किसी गलत व्यक्ति की गवाही के आधार पर किसी निर्दोष के साथ अन्याय तो नहीं हो सकता?
#न्यायव्यवस्था #न्याय_का_सवाल #गवाह #गवाही #न्यायालय #कानून #न्याय #कानूनीव्यवस्था #सत्यापन #पहचानसत्यापन #न्यायिकप्रक्रिया #न्यायकीआवाज #व्यवस्थापरसवाल #जनताकीसवाल #JusticeSystem #Witness #IndianJudiciary