
450 करोड़ की सरकारी जमीन पर कथित फर्जीवाड़े का बड़ा खेल बेनकाब!
7.26 एकड़ नजूल भूमि पर कूटरचित दस्तावेजों से निजी अधिकार का दावा, प्रशासन की जांच में खुली परतें;
उरई कोतवाली में एफआईआर
जालौन में सरकारी संपत्ति बचाने को डीएम राजेश कुमार पाण्डेय का बड़ा एक्शन, लहरिया की बेशकीमती जमीन का मामला पहुंचा पुलिस तक
जनपद जालौन में करोड़ों रुपये की सरकारी संपत्ति को लेकर सामने आए कथित फर्जीवाड़े ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है।
उरई के ग्राम लहरिया स्थित गाटा संख्या 518 की 7.26 एकड़ नजूल भूमि, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 450 करोड़ रुपये बताई गई है, को निजी हित में खुर्द-बुर्द किए जाने के प्रयास का प्रशासन ने खुलासा किया है।
कूटरचित एवं फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी जमीन पर अधिकार जताने तथा उसके हस्तांतरण/विक्रय के प्रयास के आरोपों में कोतवाली उरई में एफआईआर दर्ज कराई गई है।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण नाम जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय का सामने आता है, जिन्होंने प्रकरण को महज जमीन का विवाद मानने के बजाय सीधे सरकारी संपत्ति की सुरक्षा से जोड़ते हुए जांच कराई।
जिलाधिकारी के 06 मई 2026 और 27 मई 2026 के आदेशों के क्रम में अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) की अध्यक्षता में त्रिसदस्यीय जांच समिति गठित की गई।
1914 की लीज से 2026 की एफआईआर तक पहुंचा मामला
प्रशासनिक जांच के मुताबिक संबंधित जमीन मूल रूप से नजूल संपत्ति है। अभिलेखों में 15 मार्च 1914 को इसे वार्षिक लीज रेंट जमा करने तथा आवासीय मकान स्थापित करने की शर्त पर 99 वर्ष के पट्टे पर दिए जाने का उल्लेख है।
पट्टे में कलेक्टर की अनुमति के बिना भवन में परिवर्तन तथा भूमि अथवा भवन का मूल उपयोग बदलने पर रोक जैसी शर्तें थीं।
पुराने अभिलेखों की पड़ताल में प्रारंभिक लीज ए.के. पसन्ना के नाम दर्ज होने का उल्लेख मिला।
इसके बाद वर्ष 1918 में ए.के. पसन्ना की पुत्री एलिस पसन्ना द्वारा बी.सी.एच., पूना के पक्ष में भूमि विक्रय का उल्लेख सामने आया।
आगे बी.सी.एच., पूना के अधिकृत प्रतिनिधि मिस्टर जॉन ई. नॉटन द्वारा 23 सितंबर 1949 को मिस एडेलिन ग्रीगर के पक्ष में विक्रय किए जाने का उल्लेख जांच में मिला।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
2014 में लीज खत्म, फिर भी जमीन पर दावे क्यों?
प्रशासनिक जांच में सामने आया कि संबंधित भूमि की लीज वर्ष 2014 में समाप्त हो चुकी थी। इसके बावजूद जमीन पर निजी अधिकार और उससे जुड़े लेन-देन के दावे किए जाते रहे।
जांच के दौरान सबसे अहम तथ्य यह सामने आया कि संबंधित सेल डीड का कलेक्टर उरई के नजूल रजिस्टर और नगर पालिका परिषद उरई के संपत्ति रजिस्टर में उल्लेख नहीं मिला।
यही बिंदु पूरे मामले को गंभीर बना देता है—एक तरफ निजी अधिकार और दस्तावेजों के आधार पर जमीन पर दावा, जबकि दूसरी ओर सरकारी अभिलेखों में भूमि का राज्य सरकार की संपत्ति के रूप में दर्ज होना।
1953 की डीड ने बढ़ाई जांच की गंभीरता
जांच समिति ने राजस्व अभिलेखों, खतौनी, नजूल रजिस्टर, पुराने दस्तावेजों और अन्य रिकॉर्ड की गहन पड़ताल की। समिति की रिपोर्ट में वर्ष 1953 में मूल आवंटी से भिन्न व्यक्तियों द्वारा डीड तैयार किए जाने तथा नजूल भूमि को आर्थिक लाभ के उद्देश्य से कूटरचित एवं फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से अवैधानिक रूप से विक्रय किए जाने की बात सामने आने का उल्लेख है।
जांच रिपोर्ट में इन दस्तावेजों के आधार पर ट्रस्ट आदि के निर्माण का भी उल्लेख किया गया है।
प्रशासन ने कार्रवाई के लिए उद्धरण खतौनी, जिलाधिकारी के आदेश पत्रांक 1082/25-एल.वी.ओ. दिनांक 28 जुलाई 2026 और जांच आख्या दिनांक 08 जुलाई 2026 समेत संबंधित अभिलेखों को आधार बनाया।
ईओ रामअचल कुरील ने दर्ज कराई एफआईआर
जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद नगर पालिका परिषद उरई के अधिशासी अधिकारी रामअचल कुरील ने प्रभारी निरीक्षक, कोतवाली उरई को पत्र भेजकर संबंधित व्यक्तियों एवं संस्थाओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई।
प्रकरण में वर्तमान कब्जेदार बेथनी क्रिश्चियन होम्स मिशन/बी.सी.एच. मिशन की प्रबंधक किरन के मसीह, निवासी पटेल नगर, उरई, संस्था से जुड़े अन्य व्यक्तियों तथा नजूल भूमि की खरीद-फरोख्त में शामिल बताए गए व्यक्तियों एवं संस्थाओं को कार्रवाई के दायरे में लिया गया है।
आरोप है कि फर्जी लीज डीड और कूटरचित दस्तावेजों के सहारे करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन को निजी हित में खुर्द-बुर्द करने, उसका विक्रय/हस्तांतरण करने और आर्थिक लाभ अर्जित करने का प्रयास किया गया।
450 करोड़ की जमीन बची या अभी जांच बाकी?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बात किसी छोटे भूखंड की नहीं, बल्कि करीब 7.26 एकड़ बेशकीमती नजूल भूमि की है, जिसकी कीमत प्रशासन द्वारा करीब 450 करोड़ रुपये बताई गई है।
डीएम राजेश कुमार पाण्डेय के निर्देश पर हुई जांच और उसके बाद एफआईआर ने सरकारी जमीनों के पुराने अभिलेखों की निगरानी और जांच को लेकर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या पूरे जालौन में होगी ऐसी जमीनों की जांच?
लहरिया की नजूल भूमि के मामले में जांच और एफआईआर के बाद अब जनपद की दूसरी नजूल एवं सरकारी जमीनों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
यदि जालौन जनपद में पुराने नजूल रजिस्टर, लीज रिकॉर्ड, खतौनियों, सेल डीड और नगर निकायों के संपत्ति रजिस्टर का व्यापक स्तर पर मिलान कराया जाए तो क्या ऐसे और मामले सामने आएंगे?
क्या कहीं सरकारी जमीन पर वर्षों पुराने दस्तावेजों के सहारे निजी दावे कायम हैं?
क्या कहीं लीज समाप्त होने के बाद भी जमीनों का इस्तेमाल या हस्तांतरण जारी रहा?
क्या अन्य सरकारी संपत्तियों के रिकॉर्ड में भी इसी तरह की विसंगतियां मौजूद हैं?
इन सवालों का जवाब अब प्रशासनिक जांच से ही सामने आएगा।
फिलहाल लहरिया प्रकरण ने साफ कर दिया है कि करीब 450 करोड़ रुपये की बताई जा रही सरकारी संपत्ति से जुड़े कथित फर्जीवाड़े को प्रशासन ने गंभीरता से लिया है और मामला अब पुलिस कार्रवाई तक पहुंच चुका है।
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Kalpi, Jalaun | Sep 3, 2026