
राजा के दरबार से आज के दरबार तक: चेहरे बदले, चाटुकारिता नहीं!
इतिहास में राजा के गुणगान के लिए कवि होते थे, आज के दौर में हर व्यवस्था के अपने-अपने प्रशंसक हैं।
प्राचीन काल में राजाओं के दरबार हुआ करते थे। दरबार में विद्वान, कवि, कलाकार, सलाहकार और दरबारी बैठते थे। कुछ कवि अपनी रचनाओं के माध्यम से राजा की वीरता, दानशीलता और पराक्रम का वर्णन करते थे। राजा की प्रशंसा करना उस समय राजाश्रय प्राप्त करने का एक माध्यम भी था। दरबार में ऐसी रचनाएं सुनाई जाती थीं कि राजा स्वयं को इतिहास का सबसे महान शासक समझने लगे। हालांकि, उस दौर में ऐसे विद्वान भी थे, जो राजा के सामने सच कहने का साहस रखते थे और अपनी बुद्धि से सत्ता को आईना दिखाते थे। समय बदला, राजमहल टूटे, सिंहासन संग्रहालयों की शोभा बन गए, लेकिन दरबारी संस्कृति ने अपना रूप बदल लिया। आज राजा की जगह पद, कुर्सी, सत्ता और प्रभाव ने ले लिया है। पहले दरबार में कवि अपनी कविता सुनाते थे, आज कुछ लोग हर छोटी-बड़ी उपलब्धि पर प्रशंसा के ऐसे पुल बांधते हैं, मानो इतिहास में पहली बार कोई काम हुआ हो।सड़क बने तो विकास पुरुष, नाली बने तो जननायक, किसी समारोह में पहुंच जाएं तो जनसेवक की लोकप्रियता का प्रमाण और किसी की तस्वीर के साथ खड़े हो जाएं तो उसे भी ऐतिहासिक उपलब्धि बना दिया जाता है। बस, इतना ध्यान रखना पड़ता है कि प्रशंसा का सुर कभी धीमा न पड़े और तारीफ की माला में कोई फूल कम न हो जाए! आज के दरबारियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे सवाल नहीं पूछते, सवाल करने वालों को ही गलत साबित करने में जुट जाते हैं। यदि कोई नागरिक सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य या किसानों की समस्या पर सवाल उठा दे, तो समस्या का समाधान खोजने के बजाय सवाल उठाने वाले की नीयत पर चर्चा शुरू हो जाती है। तर्क पीछे छूट जाते हैं और व्यक्ति की निष्ठा का प्रमाण मांगा जाने लगता है। पुराने दरबार में कवि राजा की वीरता का वर्णन करते थे, आज कुछ लोग अपने पसंदीदा नेतृत्व की हर बात को दूरदर्शी निर्णय बताते हैं। निर्णय सही हो तो प्रशंसा स्वाभाविक है, लेकिन निर्णय पर सवाल उठाना भी लोकतंत्र का अधिकार है। विडंबना यह है कि कुछ लोगों के लिए प्रशंसा करना कर्तव्य और आलोचना सुनना अपमान बन गया है। दरबारियों का एक वर्ग ऐसा भी होता है, जिसकी वाणी सत्ता के सामने मधुर और आम आदमी के सामने कठोर हो जाती है। कुर्सी के करीब पहुंचते ही उसके शब्दों में मिठास बढ़ जाती है, जबकि जनता के बीच पहुंचते ही उसकी संवेदनाएं कम होने लगती हैं। उसे जनता की परेशानी से ज्यादा यह चिंता रहती है कि उसकी प्रशंसा सही जगह तक पहुंची या नहीं। सोशल मीडिया ने इस दरबारी संस्कृति को एक नया मंच दे दिया है। अब किसी राजा को प्रसन्न करने के लिए राजमहल तक जाने की जरूरत नहीं। मोबाइल हाथ में हो, कैमरा चालू हो और प्रशंसा के कुछ विशेषण याद हों, तो डिजिटल दरबार सजने में देर नहीं लगती। किसी पोस्ट पर तारीफों की झड़ी, किसी तस्वीर पर प्रशंसात्मक टिप्पणियों की कतार और किसी भाषण के बाद वाहवाही का शोर—कभी-कभी ऐसा लगता है कि उपलब्धि से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका प्रचार हो गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर प्रशंसा चाटुकारिता है? बिल्कुल नहीं। अच्छे काम की सराहना होनी चाहिए और जनहित में किए गए प्रयासों का स्वागत भी। अंतर सिर्फ इतना है कि प्रशंसा तथ्य देखकर की जाए, पद देखकर नहीं; सम्मान काम का हो, कुर्सी का नहीं। जहां प्रशंसा सच पर आधारित हो, वहां वह प्रोत्साहन है। लेकिन जहां सच को छिपाकर केवल प्रसन्न करने के लिए गुणगान किया जाए, वहां वह चाटुकारिता बन जाती है। समाज को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो सत्ता के सामने भी सच कह सकें, गलत निर्णय पर सवाल उठा सकें और सही काम की खुलकर सराहना कर सकें। क्योंकि किसी भी व्यवस्था की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके प्रशंसक कितने हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वहां असहमति रखने वालों की आवाज कितनी सुनी जाती है। इतिहास में राजा की प्रशंसा करने वाले अनेक दरबारी कवियों के नाम भले दर्ज हों, लेकिन समय की कसौटी पर वही विचार टिकते हैं, जिनमें सत्य, विवेक और लोकहित की आवाज होती है। आखिर में बात इतनी-सी है-दरबार बदलने से दरबारी नहीं बदलते, जब तक सोच नहीं बदलती। सिंहासन पर बैठा व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसे प्रशंसा से ज्यादा सच की जरूरत होती है। क्योंकि चाटुकारों से दरबार तो सज सकता है, लेकिन समाज और इतिहास नहीं संवारे जा सकते। और हां, दरबार में तालियां बजाने वालों की कमी कभी नहीं होती; कमी हमेशा उस व्यक्ति की होती है, जो सही समय पर खड़े होकर कह सके-“महाराज, सब कुछ ठीक नहीं है!”
✍️राजिद अहमद