“हम स्कूल बचाने आए हैं…” — एक बच्ची का जवाब, व्यवस्था से बड़ा सवाल
“आप लोग यहां क्यों आए हो?”
पत्रकारों के इस सवाल पर अशोकनगर क्रमांक-1 स्कूल से कलेक्ट्रेट पहुंचे बच्चों में से एक छोटी-सी बच्ची ने जो जवाब दिया, वह शायद आज की पूरी कहानी कहने के लिए काफी है “हम स्कूल बचाने आए हैं…”
न कोई राजनीतिक भाषण, न कोई बड़ी-बड़ी बातें….बस एक बच्ची के मुंह से निकले ये शब्द सीधे दिल में उतर गए।
ये बच्चे आज क्रमांक-1 स्कूल को मर्ज किए जाने के विरोध में कलेक्ट्रेट पहुंचे थे। सरकार सांदीपनि स्कूलों को बेहतर बनाने और आसपास के स्कूलों को उनमें मर्ज करने की योजना पर काम कर रही है। नए और बेहतर स्कूल बनाना निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम है, लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास की कीमत पुराने स्कूलों को बंद करके और बच्चों की पढ़ाई को मुश्किल बनाकर चुकाई जानी चाहिए? इन स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे मध्यमवर्गीय, मजदूर और सामान्य परिवारों से आते हैं। स्कूल दूर होगा तो सबसे ज्यादा परेशानी उन्हीं बच्चों को होगी, जिनके परिवार पहले से सीमित संसाधनों में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। विडंबना देखिए सरकार नए स्कूल खोल रही है और बच्चे पुराने स्कूल बचाने के लिए कलेक्ट्रेट पहुंच रहे हैं। आज इन बच्चों में समझदारी दिखाई दे रही है। ये बच्चे शिक्षा के खिलाफ नहीं हैं, स्कूल के खिलाफ नहीं हैं… ये तो अपने स्कूल को बचाने निकले हैं। सरकार से बस इतनी-सी मांग है नए स्कूल खोलिए, उन्हें बेहतर बनाइए, सुविधाएं बढ़ाइए… लेकिन जो स्कूल वर्षों से बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, उन्हें बंद मत कीजिए। क्योंकि स्कूल सिर्फ एक इमारत नहीं होती… वह गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के सपनों का दरवाजा होता है।और जब एक छोटी-सी बच्ची कहती है—
“हम स्कूल बचाने आए हैं…”
तो सवाल बच्चों से नहीं, नीति बनाने वालों से होना चाहिए।
✍️ राजिद अहमद(पत्रकार)
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