सहरिया/चंबल अंचल के अनुष्ठानों पर दो दिवसीय परिसंवाद का आयोजन
भूमिया बाबा के भोपा की अनुष्ठानिक स्तुति में सदियों पुरानी लोक-स्मृति और आस्था की गूंज सुनाई दी
----
सहरिया/चंबल अंचल के जनजातीय एवं लोक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक परंपराओं और उनके सामाजिक अभिप्रायों पर केंद्रित दो दिवसीय परिसंवाद का आयोजन 22 एवं 23 सितंबर, 2026 को शासकीय आदर्श कन्या महाविद्यालय, श्योपुर के सहयोग से किया जा रहा है। परिसंवाद में सहरिया समाज की परंपराओं, अनुष्ठानों, लोकज्ञान, भाषा, प्रकृति और बदलते सामाजिक परिवेश के विभिन्न पक्षों पर विशेषज्ञों एवं शोधार्थियों द्वारा विचार-विमर्श किया जा रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डिप्टी कलेक्टर श्री शिवलाल शाक्य ने कहा कि जनजातीय समुदाय की अनेक रीति-रिवाज और परंपराएँ आज भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जाती हैं। बदलते समय के साथ परिस्थितियाँ भी बदल रही हैं, इसलिए शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से समाज को नए अवसरों के लिए तैयार करना आवश्यक है। उन्होंने जनजातीय समाज में शिक्षा का स्तर बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देने की बात बताई।
अकादमी के निदेशक डॉ. धर्मेन्द्र पारे ने कहा कि अनुष्ठान केवल पूजा-पद्धति नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर गहरे सांस्कृतिक और सामाजिक अभिप्राय निहित होते हैं।
जनजातीय समुदायों की पूजा एवं अनुष्ठान परंपराओं में लोकज्ञान, प्रतीक, गीत और सामुदायिक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा कि भाषा का खत्म होना संस्कृति के खत्म होने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है, क्योंकि भाषा के साथ लोकज्ञान, परंपराएँ और पीढ़ियों से संचित सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी जुड़ी होती हैं।
वक्ता सुश्री सर्विष्ठा जाट ने सहरिया समुदाय के बीच रहकर उनकी जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक परंपराओं को करीब से समझने के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि सहरिया समाज की सांस्कृतिक परंपराओं में सामुदायिक जीवन और स्थानीय परिवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है।
वक्तव्य देते हुए श्योपुर के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं मुक्तिबोध के उर्दू ओर हिन्दी भाषा के साथ ही हाड़ौती बोली के ज्ञाता श्री प्रणय प्रभात ने कहा कि चौमासे के दौरान होने वाले विभिन्न अनुष्ठान जीवन और प्रकृति के साथ समुदाय के संबंध को अभिव्यक्त करते हैं। उन्होंने सावन से जुड़ी परंपराओं, झूला झूलने की लोककथाओं, चौमासे के पहले रविवार को मनाए जाने वाले भाई के व्रत तथा तेजाजी के मेले जैसी लोक परंपराओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तकनीक और बदलती जीवन-शैली के कारण सहरिया समाज की कई पारंपरिक गतिविधियाँ और मौखिक परंपराएँ प्रभावित हुई हैं।
अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य डा ओमप्रकाश शर्मा ने कहा कि सहरिया समाज की जीवन-पद्धति, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत पर विस्तृत एवं गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है। सहरिया समाज का जीवन अपने प्राकृतिक परिवेश से गहरे रूप से जुड़ा रहा है। प्रकृति के सौम्य वातावरण में विकसित उनकी जीवन-शैली में प्रकृति, परंपरा और सामुदायिक जीवन का गहरा अंतर्संबंध दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि ऐसे शोध कार्य सहरिया समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों और लोकज्ञान को भावी पीढ़ियों के लिए दस्तावेजीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अनुष्ठानिक प्रस्तुतियों ने जीवंत की सांस्कृतिक परंपराएँ
परिसंवाद के दौरान सहरिया/चंबल अंचल की पारंपरिक अनुष्ठानिक एवं लोक प्रस्तुतियाँ भी हुईं। श्रीमती कन्या आदिवासी ने अनुष्ठानिक सावन गायन प्रस्तुत किया, जिसमें सावन से जुड़ी लोकपरंपरा और सामुदायिक भावों की अभिव्यक्ति हुई। श्री हरिराम ने लहंगी नृत्य की प्रस्तुति दी। वहीं श्री आसाराम आदिवासी ने भूमिया बाबा का भोपा अनुष्ठान की प्रस्तुति देकर क्षेत्र की पारंपरिक अनुष्ठानिक संस्कृति और लोकविश्वासों से परिचित कराया।
परिसंवाद में शोधार्थियों एवं विशेषज्ञों द्वारा सहरिया/चंबल अंचल के अनुष्ठानों, लोक परंपराओं, भाषा, प्रकृति, तकनीकी परिवर्तन और सांस्कृतिक स्मृति से जुड़े विभिन्न विषयों पर जिज्ञासा प्रकट की गई जिसका उत्तर अनुष्ठान प्रस्तुत करने वाले जनों ने समझाया।
कार्यक्रम के अंत में संयोजक डॉ. परवीन वर्मा ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों, कलाकारों एवं आयोजन से जुड़े सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने आयोजन में सहयोग के लिए शासकीय आदर्श कन्या महाविद्यालय, श्योपुर के प्राचार्य, प्राध्यापकों एवं समस्त सहयोगी सदस्यों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
-
CM Madhya Pradesh
Jansampark Madhya Pradesh
#JansamparkMP
#sheopur