जीवन मे मर्यादा न हो तो जीवन अधूरा है, मर्यादित जीवन ही व्यक्ति को मोक्ष मार्ग की ओर ले जा सकता है: प्रतिभा श्री जी
दैनिक वीरधरा राजस्थान।
चित्तौड़गढ़। पर्वाधिराज पर्यूषण के द्वितीय दिवस शान्ति भवन सेन्थी मे विराजीत महासातियो के प्रवचन हुए।
सर्वप्रथम श्री प्रेरणा श्री जी म. सा. ने अन्तःगढ़ सूत्र का वाचन किया।
स्पष्ट वक्ता श्री प्रेक्षा श्री जी म. सा. ने फरमाया कि आत्मा में बसना पर्यूषण है व दुनिया मे बसना प्रदूषण है। सामायिक के महत्व पर विचार व्यक्त करते हुए आपने बताया कि सामायिक विभाव से स्वभाव मे पहुंचा देती है। शरीर व आत्मा का भेद तब ज्ञात होता है जब शरीर को कष्ट होता है। भटकते मन को स्थिर करने के लिए सामायिक आवश्यक है। सामायिक स्व आत्म कल्याण का साधन है। सामायिक से ही अनेक आत्माऐं मोक्ष तक पहुंची है। साधु की सामायिक को दीक्षा कहते है अर्थात् जीवन भर के लिए सामायिक व्रत अंगीकार करना। सामायिक मे विकार नही होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि सभी साधना एक जैसी है किन्तु सबके साध्य अलग अलग है। यदि व्यक्ति लक्ष्य से भटक गया तो उसे मन्जिल कभी नही मिल सकती है। सामायिक मोक्ष प्राप्ति का साधन है। साधु की सामयिक 3 करण व 3 योग की होती है जबकि 2करण की सामयिक श्रावक की होती है। श्रावक सामायिक पूरी वेशभूषा मे करे तो ही सामायिक भाव उत्पन्न होगे। प्रातःकालीन सामायिक शुद्ध सामायिक होती है । शान्त वातावरण मे सामायिक करना मन व तन को प्रफुल्लित करता है। सामायिक मे तप आराधना होती है। क्रोध की आग को बुझाना है ' मन की चंचलता को मिटाना है या आत्मा को सुखी बनाना है तो सामायिक अवश्य करे ।
साध्वी श्री प्रतिभा श्री जी ने जैनम् जयति शासनम् के साथ अपने व्याख्यान में फरमाया कि जीवन मे मर्यादा न हो तो जीवन अधूरा है। मर्यादित जीवन ही व्यक्ति को मोक्ष मार्ग की ओर ले जा सकता है। अग्नि पानी व हवा तीनों अनियन्त्रित हो तो विध्वंस सम्भव है उसी प्रकार व्यक्ति मे मर्यादा आवश्यक है।