'पुष्पा' का असर या समाज में बढ़ती दबंगई? फिल्मों से असली जिंदगी तक हीरोइज्म का बढ़ता खुमार
सिनेमा का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है, लेकिन जब फिल्मों में दिखाए जाने वाले असामाजिक या दबंग किरदारों को लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उतारने लगें, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। हाल के दिनों में 'पुष्पा' जैसी फिल्मों के किरदारों और उनके अंदाज का असर न केवल आम जनता पर, बल्कि राजनीतिक मंचों पर भी खूब दिखाई दे रहा है। जब राजनेता और जनप्रतिनिधि भी उसी स्टाइल की नकल करते नजर आते हैं, तो सड़कों पर आम लोगों का उसी अंदाज में दबंगई दिखाना एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
मनोरंजन और वास्तविकता का अंतर मिटता देख चिंता
फिल्मी परदे पर जो केवल मनोरंजन का एक हिस्सा होता है, उसे जब समाज में असली जिंदगी का 'हीरोइज्म' और दबंगई का मॉडल बना दिया जाता है, तो इसका नकारात्मक असर पूरे सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। सवाल केवल किसी एक वायरल वीडियो या घटना का नहीं है, बल्कि सवाल यह है कि सार्वजनिक जीवन में हम किस तरह के हिंसक या दबंग व्यवहार को सामान्य मानते जा रहे हैं।
पर्दे तक सीमित रहें फिल्मी संवाद
जानकारों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि फिल्मी स्टाइल और डायलॉग केवल परदे तक ही अच्छे लगते हैं। सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर केवल कानून, व्यवस्था और नागरिक जिम्मेदारी ही चलनी चाहिए। सिनेमाई दबंगई की अंधी नकल से समाज में अराजकता ही बढ़ेगी, जिस पर सभी को सोचने की सख्त जरूरत है।
Hardoi, Hardoi | Sep 20, 2026