प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ श्री विट्ठलेशरायजी महाराज के प्राकट्योत्सव पर श्रीजी को धराया विशेष श्रृंगार।
पुष्टिमार्गीय वल्लभ सम्प्रदाय की प्रधान पीठ श्रीनाथजी की हवेली में श्रावण शुक्ल चतुर्दशी के अवसर पर प्रथम तिलकायत नित्यलीलास्थ श्री विट्ठलेशरायजी महाराज का प्राकट्योत्सव पुष्टि परंपरा अनुसार मनाया बनाया गया, इस अवसर पर श्रीजी में विशेष श्रृंगार एवं भोग धराया गया।
श्री विट्ठलेशरायजी महाराज, श्री गुसांईजी के प्रपौत्र तथा उनके प्रथम पुत्र गिरधरजी के द्वितीय पुत्र दामोदरजी के पुत्र थे। श्रीजी को उनके द्वारा धराया जाने वाला टिपारा का विशेष श्रृंगार अत्यंत प्रिय था, जिसके कारण उन्हें ‘टिपारा वाले विट्ठलेशजी’ के नाम से भी जाना जाता है। श्रीजी ने स्वयं आज्ञा देकर उन्हें गृह के मुखिया के रूप में तिलक कर प्रथम तिलकायत के रूप में नियुक्त किया था। साथ ही वर्ष के 360 दिनों में 60 दिन विशेष ‘घर के श्रृंगार’ करने की आज्ञा प्रदान की थी। श्री विट्ठलेशरायजी महाराज ने ही श्रीजी को दूधघर की विभिन्न सामग्रियां अरोगाने की परंपरा प्रारंभ की। तिलकायत पद पर रहते हुए उन्होंने श्रीजी के अनेक मनोरथ किए। उनके चमत्कारों से तत्कालीन मुगल बादशाह जहांगीर भी प्रभावित हुए और गोकुल एवं जतीपुरा में भूमि प्रदान की जहां श्री विट्ठलेशरायजी ने बड़ी गौशालाओं का निर्माण करवाया। उनके काल से ही श्रीजी में तिलकायत परंपरा का प्रारंभ हुआ, जो आज भी निरंतर जारी है। उनके नित्यलीला में प्रवेश के पश्चात उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री लालगिरिधरजी तिलकायत के रूप में पदासीन हुए। उत्सव के अवसर पर श्रीनाथजी की हवेली के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को हल्दी से लीपा गया तथा आशापाल की सूत की डोरी की वंदनमाल बांधी गई।
श्रीजी को रुपहली पठानी किनारी से सुसज्जित चंपाई मलमल का पिछोड़ा धराया गया। श्रीमस्तक पर कुल्हे के ऊपर सुनहरी घेरे का श्रृंगार सुशोभित रहा। श्रीजी को मध्य से दो अंगुल ऊंचा, घुटने तक का श्रृंगार धराया गया तथा माणक के सर्व-आभरण धारण कराए गए।
श्रीमस्तक पर चंपाई मलमल की कुल्हे के ऊपर सिरपैंच, सुनहरी घेरा और बायीं ओर शीशफूल धराया गया। हांस एवं त्रवल नहीं धराए गए, जबकि कली माला और बघ्घी धराई गई। श्रीकर्ण में माणक के मकराकृति कुंडल तथा पीले पुष्पों की रंग-बिरंगी मालाजी के साथ विविध रंगों के पवित्रा मालाजी के रूप में धराए गए। श्रीहस्त में कमलछड़ी, माणक के वेणुजी एवं दो वेत्रजी धराए गए। पट पीला तथा गोटी श्याम मीना की धराई गई।
श्रीजी में आज चंपाई मलमल पर रुपहली जरी की किनारी के हांशिया से सुसज