*हमारी सोच कैसी होगी ये हमारी संगति व वातावरण पर निर्भर-आचार्य रामदयालजी महाराज*
*बुरा नहीं सोचे इसके लिए मन पर बहुत संयम रखना होगा*
*माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में दैनिक चातुर्मासिक सत्संग*
भीलवाड़ा:निलेश कांठेड़ ( वरिष्ठ पत्रकार ) 16 अक्टूबर। स्वतंत्र भारत में सबको सोचने की स्वतन्त्रता का अधिकार दिया गया है फिर भी हम जहां स्वतन्त्र होना चाहिए वहां परतन्त्र है ओर जहां परतन्त्र होना चाहिए वहां स्वतन्त्र है। दुनिया नहीं देखनी है तो आंखे बंद करने ओर बोलना नहीं चाहते तो मुंह बंद रखने की स्वतन्त्रता है पर सोचना ही नहीं चाहते तो उसके लिए क्या बंद करेंगे ये चिंतनीय है। ये विचार अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरू आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत शुक्रवार को दैनिक सत्संग में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि बुरा मत देखो,बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो के तीन सूत्रों के साथ बुरा मत सोचो ओर बुरा मत कहो के सूत्र भी जोड़ने होंगे। बुरा नहीं सोचे इसके लिए हमे अपने अर्न्तात्मा से अपने मन पर बहुत संयम रखना होगा। हम परमात्मा, जन्मदाता व ज्ञानप्रदाता के प्रति बुरा कैसे सोच सकते है।
सत्संग में आचार्यश्री ने कहा कि जहां व्यक्ति को परतन्त्र रहना चाहिए वहां स्वतन्त्र है। आत्मकल्याण के अलावा कुछ न सोचे पर मन वहां स्वतन्त्र है। जहां सारे संसार के बारे में सोचना चाहिए मन वहां अपने को परतन्त्र मान लेता है। हमारी सोच कैसी होगी ये इस पर निर्भर करता है कि सद्गुरू की संगति कैसी प्राप्ति हुई ओर आपके आसपास का वातावरण कैसा है। उन्होंने कहा कि सद्गुरू के बिना मनुष्य पशु के समान है पर सद्गुरू मिलने के बाद भी पाशविक विचार व विकृतियां हो तो फिर मानवता की उम्मीद कैसे कर सकते है। कुसंगति में जाने पर अच्छे विचारों वाले की छवि पर भी नकारात्मक असर होता है।
आचार्य रामदयाल महाराज ने कहा कि अच्छे विचारों की सौरभ वातावरण को सुवासित करती है। महाप्रभु स्वामी रामचरण महाराज के नाम की साधना की सौरभ जहां राष्ट्र व विश्व की सुवासित करती रहेगी। अवतारी पुरूषों व महापुरूषों का जीवन सदा कठिनाईयों से भरा रहा ओर जीवन अग्नि परीक्षा से भरा रहा है। मानवीय विडम्बना है कि किसी के चौमुखी विकास के उन्नति का रहस्य पता न लगे तो व्यक्ति उसके चारित्र की कमियों व व्यक्तिगत गुण दोषों की तरफ देखता है।
आचार्यश्री ने कहा कि विवाह निमित मात्र व्यवहार है। विवाह का अर्थ भोग नहीं होकर ये है कि पति पत्नी दोनों मिलकर भगवत साधना करे ओर ऋषि व ऋषि पत्नी बनकर जीवन की साधना करे। इसका अर्थ गृहस्थ जीवन होता है। गृहस्थाश्रम एक विराट तपोवन है जहां पति पत्नी नाम साधना से स्वयं को, परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व को अद्भुत चिंतन का मार्गदर्शन देता है। उन्होंने कहा कि जिन भावों के साथ देह त्याग किया जाता है वैसी ही गति प्राप्त होती है। अंतिम समय में राम का चिंतन करे ताकि राम की प्राप्ति हो ओर हमारा ये लोक ओर परलोक भी सुधर जाए। अधिक से अधिक नाम स्मरण करे ताकि जीवन पवित्र व पावन हो सके। आचार्यश्री ने कहा कि पंचमी महोत्सव चातुर्मास का समापन नहीं बल्कि जाने की तैयारी की सिंगल दिया जाता है। उन्होंने अर्जियों का वाचन करने वाले रामेश्वर बसेर को भी साधुवाद अर्पित किया। आचार्यश्री से पूर्व अन्तरराष्ट्रीय रामस्नेही सम्प्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस प्रवचन दिया। स्वरूपाबाई महिला मण्डल की सदस्यों ने भजन की प्रस्तुति दी। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई। सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। प्रतिदिन रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। दैनिक सत्संग सुबह 9 बजे से हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती एवं रामस्नेही सम्प्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है।