शासकीय पेंचवेली महाविद्यालय परासिया में बी.एस.डब्ल्यू. एवं एम.एस.डब्ल्यू. की कक्षाओं का हुआ संचालन
“माटी गणेश एवं सिद्ध गणेश प्रतिमा निर्माण प्रशिक्षण कार्यशाला” आयोजित
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मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठ्यक्रम के अंतर्गत आज शासकीय पेंचवेली महाविद्यालय परासिया में बी.एस.डब्ल्यू. एवं एम.एस.डब्ल्यू. की कक्षाओं का संचालन किया गया। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से “माटी गणेश एवं सिद्ध गणेश प्रतिमा निर्माण प्रशिक्षण कार्यशाला” का आयोजन भी किया गया।
कार्यशाला का आयोजन मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के जिला समन्वयक श्री अखिलेश जैन के निर्देशन एवं विकासखंड समन्वयक श्री संजीव भावरकर के मार्गदर्शन में किया गया। प्रशिक्षक श्री बंटी प्रजापति एवं श्री निखिल प्रजापति ने छात्र-छात्राओं को प्राकृतिक मिट्टी से गणेश प्रतिमा निर्माण की विभिन्न विधियों एवं तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया।
प्रशिक्षण कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य गणेश उत्सव की पूर्व तैयारी के अंतर्गत छात्र-छात्राओं को मिट्टी से पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमा निर्माण की कला में प्रशिक्षित करना था। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद छात्र-छात्राएं गांव-गांव जाकर ग्रामीण समुदाय, नवांकुर संस्था एवं सखी समूहों को मिट्टी की गणेश प्रतिमा बनाने के लिए प्रेरित एवं प्रशिक्षित कर सकेंगे।
कार्यशाला के माध्यम से बताया गया कि घर पर ही प्राकृतिक मिट्टी से गणेश प्रतिमा तैयार कर उसकी पूजा-अर्चना के बाद प्रतिमा को गमले अथवा पॉट में विसर्जित किया जा सकता है। इसके बाद उसी मिट्टी में पौधारोपण कर पौधों के पोषण में उसका उपयोग किया जा सकता है। इस प्रकार धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
पीओपी प्रतिमाओं के दुष्प्रभाव बताए - कार्यशाला में छात्र-छात्राओं को प्लास्टर ऑफ पेरिस से निर्मित गणेश प्रतिमाओं के पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की जानकारी भी दी गई। बताया गया कि पीओपी पानी में आसानी से घुलता नहीं है और विसर्जन के बाद इसके अवशेष जलस्रोतों में लंबे समय तक बने रह सकते हैं। इससे तालाब, नदी एवं अन्य जलस्रोतों की स्वच्छता प्रभावित होती है तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
पीओपी से बनी प्रतिमाओं पर उपयोग किए जाने वाले रासायनिक रंग, पेंट, चमकीले पदार्थ एवं अन्य सजावटी सामग्री भी जल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। मूर्ति विसर्जन के बाद इनके अवशेष जल में जमा होने से जल प्रदूषण बढ़ सकता है तथा मछलियों एवं अन्य जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, विसर्जन के बाद बड़ी मात्रा में मूर्ति अवशेष जलस्रोतों में जमा होने से उनकी सफाई एवं प्रबंधन की समस्या भी उत्पन्न होती है। इसलिए पर्यावरण की दृष्टि से प्राकृतिक मिट्टी से बनी छोटी गणेश प्रतिमाओं को अपनाना बेहतर विकल्प बताया गया। प्राकृतिक मिट्टी से निर्मित माटी गणेश प्रतिमा को घर पर ही सीमित मात्रा में पानी में विसर्जित कर प्राप्त मिट्टी को गमले या पॉट में डालकर उसमें पौधा लगाया जा सकता है। इस प्रकार गणेश उत्सव को आस्था, पर्यावरण संरक्षण और पौधारोपण से जोड़ा जा सकता है। छात्र-छात्राओं को संदेश दिया गया कि वे स्वयं माटी गणेश बनाएं तथा अपने परिवार, गांव एवं ग्रामीण समुदाय को भी “पीओपी की मूर्ति छोड़ें, माटी के गणेश अपनाएं” के लिए प्रेरित करें।
पर्यावरण संरक्षण के लिए किया प्रेरित- विकासखंड समन्वयक श्री संजीव भावरकर ने छात्र-छात्राओं को पर्यावरण संरक्षण, वृक्षों के महत्व तथा प्राकृतिक मिट्टी से गणेश प्रतिमा निर्माण के लाभों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मिट्टी की प्रतिमा का उपयोग धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी किया जा सकता है। गणेश प्रतिमा के विसर्जन के बाद उसी मिट्टी को गमले में उपयोग कर पौधा लगाया जा सकता है, जिससे गणेश उत्सव को “पूजा से प्रकृति संरक्षण” से जोड़ा जा सके। परामर्शदाता श्री शंकर राम प्रजापति ने उपस्थित छात्र-छात्राओं को पर्यावरण अनुकूल गणेश उत्सव मनाने के लिए प्रेरित किया।
छात्र-छात्राओं ने लिया संकल्प - प्रशिक्षण कार्यशाला में छात्र-छात्राओं ने अत्यंत उत्साह एवं रुचि के साथ मिट्टी से गणेश प्रतिमा निर्माण की कला सीखी। उन्होंने संकल्प लिया कि प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान को अपने गांवों एवं समुदाय तक पहुंचाएंगे तथा अधिक से अधिक लोगों को मिट्टी के गणेश बनाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित करेंगे।
कार्यशाला में मुख्य रूप से नवांकुर संस्था से श्री अंकेश बाघ, श्री मनेश भलावी, श्री देवीसिंह राजपूत, श्री कुबेर सिंह सूर्यवंशी एवं मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास पाठ्यक्रम के परामर्शदाता श्री शंकर राम प्रजापति, श्रीमती नविता सिंह, श्री मनीष कैथवास, श्री रूपेश सूर्यवंशी, श्री पंकज अंबेदास सहित बी.एस.डब्ल्यू. एवं एम.एस.डब्ल्यू. के छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की।