चुनावी जीत के आगे पार्टी के सिद्धांत और अनुशासन की क्या अहमियत?
राजनीति में न कोई स्थायी अपना होता है और न कोई स्थायी पराया। यह एक बार फिर साबित हो रहा है। छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित किए गए सारण के बीजेपी नेता राहुल राज को एमएलसी चुनाव जीतने के बाद फिर से भाजपा की सदस्यता दिलाई दी गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और राजीव प्रताप रूडी की मौजूदगी में उनकी पार्टी में वापसी हो है।
इससे एक सवाल जरूर उठता है कि क्या राजनीतिक दलों में सिद्धांत और अनुशासन की कोई अहमियत रह गई है? या फिर चुनाव जीतने की क्षमता ही किसी नेता की पार्टी में वापसी का सबसे बड़ा आधार बन गई है?
आज की राजनीति में सिद्धांतों से ज्यादा चुनावी जीत और राजनीतिक फायदे को महत्व दिया जा रहा है। जब तक कोई नेता चुनावी नतीजों में पार्टी के लिए उपयोगी नहीं होता, तब तक उसके लिए दरवाजे बंद रहते हैं, लेकिन जीत हासिल करते ही वही दरवाजे फिर खुल जाते हैं।
यही आज की राजनीति की एक कड़वी सच्चाई नजर आती है।