
भारत में यदि अंग्रेजी ना होती तो क्या होता?
राजकीय महाविद्यालय गंगाशहर में आज हिंदी दिवस पर हिंदी की दशा एवं हमारा कर्तव्य विषय पर एक बौद्धिक सत्र का आयोजन किया गया। महाविद्यालय की प्राचार्य प्रोफेसर बबीता जैन ने विद्यार्थियों के बौद्धिक व्यायाम की दृष्टि से प्रश्न रखा कि भारत में यदि अंग्रेजी ना होती तो क्या होता? इस प्रश्न के रोचक जवाब विद्यार्थियों ने दिए। भारत में यदि अंग्रेजी ना होती तो अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय भी नहीं होते। शिक्षा भी इतनी महंगी नहीं होती। अमीर और गरीब की पढ़ाई का भेद नहीं होता, इत्यादि। महाविद्यालय प्राचार्य ने इस रोचक सत्र को आगे बढाते हुए कहा कि यदि भारत में स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी ना होता तो नवीन ज्ञान का सृजन भारतीय भाषाओं में होता। हिंदी एवं भारतीय भाषाओं का अद्वितीय विकास होता। हम औपनिवेशिक मानसिकता से शीघ्र ही मुक्त हो गए होते। अंग्रेजी की उपस्थिति ने भारत में उत्तर दक्षिण विवाद को अधिक गहरा किया है। यदि अंग्रेजी ना होती तो सभी भारतीय भाषाओं में मौसेरी बहनों जैसा प्यार होता। महाविद्यालय में हिंदी के सहायक आचार्य हरि राम तर्ड ने हिंदी शब्द की उत्पत्ति के साथ ही हिन्दी की ऐतिहासिकता, राजभाषा बनने की प्रक्रिया और चुनौतियों को बताया और साथ ही हिंदी की वैज्ञानिकता को समझाते हुए बताया कि हिंदी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है जिसमें पूरी वर्णमाला वैज्ञानिक आधार पर बनी है। हर वर्ण का निश्चित स्थान वहीं क्यों है इस पर बारीकी से विश्लेषण करते हुए आज के समय में हिंदी की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। अंत में छात्र छात्राओं ने अपने भाषा संबंधी प्रश्न और समस्याएं रखी जिनके समाधान के साथ कार्यक्रम को समाप्ति हुई।