
गूगल का एक बड़ा डेटा सेंटर अब सिर्फ कंप्यूटर और सर्वर की वजह से चर्चा में नहीं है।
उसके विस्तार के रास्ते में आने वाली दलदली जमीन यानी वेटलैंड ने पर्यावरण को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
मामला अमेरिका के इंडियाना राज्य के फोर्ट वेन का है, जहां गूगल करीब 2 अरब डॉलर का बड़ा डेटा सेंटर कैंपस बना रहा है। इसका तीसरा चरण भी प्रस्तावित है, जिसमें तीन नए डेटा सेंटर भवन और उनसे जुड़ा ढांचा बनाया जाना है।
इस विस्तार के लिए गूगल की ओर से काम कर रही कंपनी हैचवर्क्स एलएलसी ने लगभग 4.26 एकड़ वनयुक्त वेटलैंड के लिए अनुमति मांगी है। प्रस्ताव के मुताबिक करीब 2.13 एकड़ जमीन को भरकर इमारतों, पानी की पाइपलाइन और बिजली के ढांचे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
अब सवाल यह है कि आखिर कुछ एकड़ दलदली जमीन को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है?
वेटलैंड सिर्फ पानी से भरी खाली जमीन नहीं होती। ये प्राकृतिक इलाके बारिश का पानी रोकने, बाढ़ के असर को कम करने, मिट्टी के कटाव को घटाने और कई पौधों-पक्षियों व दूसरे जीवों को रहने की जगह देने में मदद करते हैं।
यही वजह है कि पर्यावरण को लेकर चिंता जताने वाले लोगों का कहना है कि ऐसी जमीन को पक्का कर देने से प्राकृतिक इकोसिस्टम और फ्लड कंट्रोल की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
दूसरी तरफ, गूगल का कहना है कि उसने प्रभावित वेटलैंड के बदले मिटिगेशन क्रेडिट देने की योजना बनाई है। कंपनी के अनुसार लगभग 9 एकड़ के प्रभाव के मुकाबले 18 एकड़ से ज्यादा वेटलैंड संरक्षण या बहाली के क्रेडिट दिए जा रहे हैं।
यहां असली बहस सिर्फ गूगल की नहीं है। दुनिया भर में एआई और डेटा सेंटर तेजी से बढ़ रहे हैं और इनके लिए जमीन, बिजली और पानी की जरूरत भी बढ़ रही है।
एक तरफ डिजिटल दुनिया को चलाने के लिए नए डेटा सेंटर जरूरी हैं, तो दूसरी तरफ सवाल यह है कि इनके लिए प्राकृतिक इलाकों की कितनी कीमत चुकाई जानी चाहिए।
अगर एआई और टेक्नोलॉजी के विकास के लिए एक प्राकृतिक वेटलैंड बचाना हो, तो आप किसे ज्यादा जरूरी मानेंगे—टेक्नोलॉजी या प्रकृति?
ओरिजन सोर्स: डब्ल्यूबीओआई और फोर्ट वेन दस्तावेज़
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Bihar, India | Sep 12, 2026