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ब्रह्मांड ज्ञान

@brahmandgyan
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आपकी उम्र 30 साल है, लेकिन अगर आप वरुण ग्रह पर पैदा हुए होते, तो शायद अभी आपका पहला जन्मदिन भी नहीं आया होता! आखिर ऐसा क्यों?

असल में, किसी ग्रह का “एक साल” उसकी उम्र नहीं, बल्कि सूर्य का एक पूरा चक्कर लगाने का समय होता है। पृथ्वी को यह चक्कर पूरा करने में करीब 365 दिन लगते हैं, इसलिए हमारा एक साल इतना लंबा है।

लेकिन सूर्य से दूरी बढ़ने के साथ ग्रहों की कक्षा भी बड़ी होती जाती है। इसलिए दूर के ग्रहों को एक चक्कर पूरा करने में बहुत ज्यादा समय लगता है।

बुध को सिर्फ 88 दिन लगते हैं, जबकि बृहस्पति को करीब 12 पृथ्वी साल। शनि का एक साल लगभग 29 साल और वरुण का करीब 165 पृथ्वी साल का होता है!

यानी वरुण पर 1 साल गुजरने तक पृथ्वी पर कई पीढ़ियाँ बदल सकती हैं।

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क्या दूसरी दुनिया के आसमान में पानी मिलना, एलियंस की तरफ पहला इशारा हो सकता है?
करीब 7 साल पहले वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की, जिसने इस सवाल को फिर जिंदा कर दिया।

13 सितंबर 2019 को हबल स्पेस टेलीस्कोप के डेटा से वैज्ञानिकों को K2-18 b नाम के एक दूर के ग्रह के वातावरण में जलवाष्प के संकेत मिले।

सबसे खास बात यह थी कि K2-18 b अपने तारे के हैबिटेबल ज़ोन में है। यानी वह इलाका जहाँ तापमान कुछ परिस्थितियों में इतना सही हो सकता है कि ग्रह की सतह पर तरल पानी मौजूद रह सके।

यह ग्रह पृथ्वी से करीब 110 प्रकाशवर्ष दूर है और इसका द्रव्यमान पृथ्वी से लगभग 8 गुना है। इसे 2015 में केपलर स्पेस टेलीस्कोप ने खोजा था।

वैज्ञानिकों ने हबल के 2016 और 2017 के पुराने डेटा को दोबारा खंगाला। जब ग्रह अपने तारे के सामने से गुजरता है, तो तारे की रोशनी उसके वातावरण से होकर आती है। इसी रोशनी में पानी के अणुओं की खास निशानी दिखाई दी।

लेकिन यहाँ सबसे जरूरी ट्विस्ट है—पानी के संकेत मिलने का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि वहाँ जीवन मिल गया है।

K2-18 b पृथ्वी जैसा ग्रह है या फिर नेप्च्यून जैसा गैसीय संसार, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है। इसके आसपास का लाल बौना तारा भी काफी सक्रिय है, जिससे वहाँ का माहौल जीवन के लिए मुश्किल हो सकता है।

फिर भी यह खोज इसलिए रोमांचक है क्योंकि बाद की जेम्स वेब टेलीस्कोप observations में इसके वातावरण में मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे molecules के संकेत भी मिले।

तो सवाल अब भी वहीं है—क्या इतनी दूर किसी दूसरी दुनिया पर जीवन के लिए सही परिस्थितियाँ मौजूद हो सकती हैं?

आपको क्या लगता है—क्या इंसान को किसी दिन पृथ्वी के बाहर जीवन का पक्का सबूत मिलेगा?

ओरिजन सोर्स: नासा और नेचर एस्ट्रोनॉमी

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गूगल का एक बड़ा डेटा सेंटर अब सिर्फ कंप्यूटर और सर्वर की वजह से चर्चा में नहीं है।
उसके विस्तार के रास्ते में आने वाली दलदली जमीन यानी वेटलैंड ने पर्यावरण को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

मामला अमेरिका के इंडियाना राज्य के फोर्ट वेन का है, जहां गूगल करीब 2 अरब डॉलर का बड़ा डेटा सेंटर कैंपस बना रहा है। इसका तीसरा चरण भी प्रस्तावित है, जिसमें तीन नए डेटा सेंटर भवन और उनसे जुड़ा ढांचा बनाया जाना है। 

इस विस्तार के लिए गूगल की ओर से काम कर रही कंपनी हैचवर्क्स एलएलसी ने लगभग 4.26 एकड़ वनयुक्त वेटलैंड के लिए अनुमति मांगी है। प्रस्ताव के मुताबिक करीब 2.13 एकड़ जमीन को भरकर इमारतों, पानी की पाइपलाइन और बिजली के ढांचे के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। 

अब सवाल यह है कि आखिर कुछ एकड़ दलदली जमीन को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है?

वेटलैंड सिर्फ पानी से भरी खाली जमीन नहीं होती। ये प्राकृतिक इलाके बारिश का पानी रोकने, बाढ़ के असर को कम करने, मिट्टी के कटाव को घटाने और कई पौधों-पक्षियों व दूसरे जीवों को रहने की जगह देने में मदद करते हैं। 

यही वजह है कि पर्यावरण को लेकर चिंता जताने वाले लोगों का कहना है कि ऐसी जमीन को पक्का कर देने से प्राकृतिक इकोसिस्टम और फ्लड कंट्रोल की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

दूसरी तरफ, गूगल का कहना है कि उसने प्रभावित वेटलैंड के बदले मिटिगेशन क्रेडिट देने की योजना बनाई है। कंपनी के अनुसार लगभग 9 एकड़ के प्रभाव के मुकाबले 18 एकड़ से ज्यादा वेटलैंड संरक्षण या बहाली के क्रेडिट दिए जा रहे हैं। 

यहां असली बहस सिर्फ गूगल की नहीं है। दुनिया भर में एआई और डेटा सेंटर तेजी से बढ़ रहे हैं और इनके लिए जमीन, बिजली और पानी की जरूरत भी बढ़ रही है।

एक तरफ डिजिटल दुनिया को चलाने के लिए नए डेटा सेंटर जरूरी हैं, तो दूसरी तरफ सवाल यह है कि इनके लिए प्राकृतिक इलाकों की कितनी कीमत चुकाई जानी चाहिए।

अगर एआई और टेक्नोलॉजी के विकास के लिए एक प्राकृतिक वेटलैंड बचाना हो, तो आप किसे ज्यादा जरूरी मानेंगे—टेक्नोलॉजी या प्रकृति?

ओरिजन सोर्स: डब्ल्यूबीओआई और फोर्ट वेन दस्तावेज़

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क्या हम कभी दूसरी आकाशगंगा तक जा सकते हैं!?
हम रात के आसमान में सूरज को देखते हैं, तो वह बस एक चमकता हुआ गोला लगता है। लेकिन अगर पृथ्वी को उसके सामने रख दें, तो क्या होगा? हैरानी की बात है कि सूरज का व्यास पृथ्वी से करीब 109 गुना बड़ा है!

पृथ्वी का औसत व्यास लगभग 12,742 किमी है, जबकि सूरज का व्यास करीब 13,92,700 किमी है। यानी सूरज के एक किनारे से दूसरे किनारे तक लगभग 109 पृथ्वियां सीधी लाइन में रखी जा सकती हैं।

लेकिन असली हैरानी आकार से भी आगे है। सूरज का आयतन (Volume) इतना बड़ा है कि उसमें लगभग 13 लाख पृथ्वियां समा सकती हैं।

सूरज इतना विशाल इसलिए है क्योंकि उसका अधिकांश हिस्सा हाइड्रोजन और हीलियम से बना है और उसके केंद्र में परमाणु संलयन (Nuclear Fusion) लगातार ऊर्जा पैदा करता है।

आसमान में छोटा दिखने वाला सूरज असल में हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा विशाल है।

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आखिर में सबसे ज्यादा भरोसा आपको अपने ही बेहतर रूप पर करना होता है।

क्योंकि लोग आपके साथ तब तक खड़े रह सकते हैं, जब तक उनकी जरूरतें और परिस्थितियां इजाज़त दें। लेकिन आपका बेहतर रूप हमेशा आपके भीतर मौजूद रहता है—बस उसे जगाने की जरूरत होती है।

जब कोई आपको समझ न पाए, खुद को समझिए।
जब कोई आपका साथ छोड़ दे, खुद का हाथ मत छोड़िए।
जब लगे कि आप हार रहे हैं, अपने उस रूप को याद कीजिए जो हार मानने के लिए तैयार नहीं था।

आपका सबसे बड़ा सहारा कोई दूसरा इंसान नहीं, बल्कि वो इंसान है जो आप बन सकते हैं।

आज का आप शायद कमजोर हो, उलझा हुआ हो, डरा हुआ हो… लेकिन आपके अंदर एक ऐसा “आप” भी है, जो इससे ज्यादा समझदार, मजबूत और शांत है।

खुद पर भरोसा करने का मतलब यह नहीं कि आपको हमेशा पता है क्या करना है।
इसका मतलब है—भले अभी रास्ता साफ न हो, फिर भी आपको भरोसा है कि आप रास्ता खोज लेंगे।
करोड़ों साल पुरानी पेंगुइन की हड्डियां सिर्फ एक पुराने जीव की कहानी नहीं बता रहीं।
उनमें ऐसे रासायनिक सुराग मिले हैं, जो बता रहे हैं कि आज की बर्फीली अंटार्कटिका कभी गर्म और नम हुआ करती थी। 

वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक प्रायद्वीप के पास सीमोर आइलैंड से मिले प्राचीन पेंगुइन जीवाश्मों की जांच की। इनमें कुछ हड्डियां करीब 5.5 करोड़ साल पुरानी हैं, यानी उस समय की जब अंटार्कटिका आज की तरह बर्फ से ढका हुआ महाद्वीप नहीं था। 

इन जीवाश्मों को नुकसान पहुंचाए बिना वैज्ञानिकों ने माइक्रो-एक्स-रे फ्लोरेसेंस, यानी माइक्रो-एक्सआरएफ स्कैनिंग का इस्तेमाल किया। इससे हड्डियों की सतह पर मौजूद अलग-अलग रासायनिक तत्वों का नक्शा बनाया गया। 

सबसे दिलचस्प सुराग पुराने जीवाश्मों में टाइटेनियम, सिलिकॉन और पोटैशियम की ज्यादा मात्रा थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक इनका पैटर्न उस समय जमीन पर ज्यादा तेज अपक्षय और बारिश से बहकर आने वाली मिट्टी या खनिज सामग्री के संकेत से मेल खाता है। यानी उस दौर में वातावरण गर्म और ज्यादा नम रहा होगा। 

इसके मुकाबले बाद के, ठंडे दौर के जीवाश्मों में इन तत्वों के संकेत कम दिखाई दिए। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलती है कि लाखों साल के दौरान अंटार्कटिका का वातावरण धीरे-धीरे कैसे बदलता गया।

हड्डियों में लोहा, मैंगनीज और सल्फर के पैटर्न भी मिले। ये संकेत उस समुद्री तलछट की रासायनिक परिस्थितियों के बारे में जानकारी दे सकते हैं, जिसमें जीवाश्म दबे और सुरक्षित हुए। 

यानी पेंगुइन की हड्डियां यहां किसी थर्मामीटर की तरह सीधे तापमान नहीं बता रहीं। बल्कि उनमें बचे रासायनिक संकेतों को चट्टानों, तलछट और पुराने जलवायु रिकॉर्ड के साथ मिलाकर वैज्ञानिक उस समय के वातावरण की तस्वीर तैयार कर रहे हैं।

यह खोज इसलिए खास है क्योंकि अंटार्कटिका हमेशा से सफेद और जमी हुई दुनिया नहीं था। करीब 5.5 करोड़ साल पहले यहां गर्म और नम परिस्थितियां थीं, और बाद में महाद्वीप के ठंडा होने के साथ इसका वातावरण पूरी तरह बदल गया। 

एक छोटी-सी हड्डी इस तरह धरती के 5 करोड़ साल पुराने मौसम की डायरी बन सकती है।

अगर आज की कोई चीज करोड़ों साल बाद भविष्य के वैज्ञानिकों को मिले, तो आपको क्या लगता है—वह हमारे आज के मौसम के बारे में क्या कहानी बताएगी?

ओरिजन सोर्स: फॉसिल रिकॉर्ड और जलवायु शोध

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मशरूम की जड़ों से बना एक नया फैब्रिक अब चमड़े को टक्कर देने की दिशा में पहुंच गया है।
खास बात यह है कि इसे जानवरों की खाल या पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक के बिना बनाया गया है। 

असल में यहां मशरूम के ऊपर दिखने वाले हिस्से की बात नहीं हो रही। वैज्ञानिक मायसीलियम का इस्तेमाल कर रहे हैं—यह फंगस के बेहद महीन धागों जैसा जाल होता है, जो मिट्टी या दूसरी सतह के अंदर फैलता है।

पहले मायसीलियम को ट्रे में उगाकर सीधे शीट बनाने की कोशिश होती थी। समस्या यह थी कि ऐसा तरीका बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए धीमा और मुश्किल था।

नई रिसर्च में फिनलैंड के वैज्ञानिकों ने फंगस को बीयर बनाने वाले टैंक जैसे बड़े बायोरिएक्टर में पोषक तरल के अंदर उगाया। इससे मायसीलियम एक मोटी, लुगदी जैसी सामग्री में बदल गया, जिसे बाद में धोकर और दूसरे जैव-आधारित पदार्थों के साथ मिलाकर पतली शीट में बदला गया। 

इस मिश्रण में सॉर्बिटोल ने सामग्री को ज्यादा लचीला बनाने में मदद की, जबकि नैनोफाइब्रिलेटेड सेलुलोज ने इसकी मजबूती बढ़ाई। इसके बाद रोलर सिस्टम से लगातार शीट तैयार की गई।

वैज्ञानिकों ने करीब 20 सेंटीमीटर चौड़ी और 8 मीटर लंबी लगातार मायसीलियम शीट बनाने का प्रदर्शन किया। इसी सामग्री से एक प्रोटोटाइप हैंडबैग भी बनाया गया। 

लैब टेस्ट में इसकी तन्यता की ताकत कुछ पारंपरिक लेदर के स्तर के बराबर पहुंची। लेकिन इसे अभी असली चमड़े का पूरा विकल्प कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि फटने और लंबे समय तक घिसने के खिलाफ इसकी मजबूती को और बेहतर करना बाकी है। 

सबसे दिलचस्प हिस्सा इसका बायोडिग्रेडेशन है। पानी वाली परिस्थितियों में 28 दिनों के बाद करीब 77% बायोडिग्रेडेशन देखा गया। वहीं औद्योगिक कंपोस्टिंग की परिस्थितियों में शीट करीब छह हफ्तों में पूरी तरह बिखर गई। 

यानी भविष्य में बैग, जूते और फैशन प्रोडक्ट ऐसे पदार्थ से बन सकते हैं, जिसका कच्चा माल फंगस से आए और इस्तेमाल के बाद इसका पर्यावरण में टिके रहना कम हो।

फिर भी कीमत, टिकाऊपन, बड़े पैमाने पर उत्पादन और पूरी लाइफ-साइकिल का पर्यावरणीय असर अभी जांचना बाकी है।

अगर मशरूम से बना ऐसा फैब्रिक असली लेदर जितना टिकाऊ और सस्ता हो जाए, तो क्या आप इसे इस्तेमाल करना पसंद करेंगे?

ओरिजन सोर्स: एसीएस एप्लाइड बायो मैटेरियल्स

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ब्रह्मांड में कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें देखकर वैज्ञानिकों के पास जवाब से ज्यादा सवाल खड़े हो जाते हैं।
इन 6 रहस्यमयी चीजों में कुछ की गुत्थी सुलझने लगी है, लेकिन कुछ आज भी वैज्ञानिकों को उलझाए हुए हैं। 🌌

सबसे पहले है ओउमुआमुआ, जो 2017 में हमारे सौरमंडल से गुजरने वाली दूसरी जगह से आई पहली पक्की पहचानी गई वस्तु थी। इसका बेहद लंबा आकार वैज्ञानिकों के लिए हैरान करने वाला था। यह करीब 400 मीटर लंबा और अपनी चौड़ाई से लगभग 10 गुना लंबा हो सकता था। 

फिर आता है रेड रेक्टैंगल नेबुला। दूर से यह लाल आयत जैसा दिखता है, लेकिन हबल ने दिखाया कि इसकी असली बनावट एक्स जैसी है। इसके बीच एक बूढ़ा बाइनरी स्टार सिस्टम है, जिसकी गैस और धूल से यह अजीब संरचना बनी है। 

प्लैनेट नाइन तो और भी दिलचस्प है। यह अभी मिला हुआ ग्रह नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों की एक हाइपोथिसिस है। कुछ बहुत दूर की बर्फीली वस्तुओं की अजीब कक्षाओं को देखकर माना गया कि शायद नेप्च्यून के पार कोई बड़ा ग्रह छिपा है। लेकिन अभी तक उसे सीधे देखा नहीं गया है। 

गैलेक्सी एक्स का विचार भी ऐसी ही एक संभावित छिपी आकाशगंगा से जुड़ा है, जबकि एल्स्ट-पिजारो एक ऐसा क्षुद्रग्रह है जो कभी-कभी धूमकेतु जैसा व्यवहार करता है।

और फिर है टैबी का तारा, जिसकी चमक में अजीब गिरावट ने कभी एलियन मेगास्ट्रक्चर तक की चर्चा छेड़ दी थी। बाद की रिसर्च ने धूल को ज्यादा मजबूत संभावित वजह बताया।

इनमें तुम्हें सबसे ज्यादा रहस्यमयी चीज कौन-सी लगती है—ओउमुआमुआ, प्लैनेट नाइन या टैबी का तारा? 👇

ओरिजन सोर्स: नासा, जेपीएल, हबल और एस्ट्रोनॉमी

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बाहर की दुनिया को देखिए… अंतरिक्ष में एक क्षुद्रग्रह किसी ग्रह की तरफ बढ़ता है, टकराता है और अगर वह जीवन के लिए जरूरी रसायन लेकर आए, तो उस ग्रह पर जीवन की शुरुआत में मदद कर सकता है।

अब यही कहानी हमारे शरीर के अंदर भी दिखाई देती है।

हमारा शरीर भी किसी छोटी-सी दुनिया से कम नहीं। यहां एक अंडाणु को आप एक छोटे ग्रह की तरह समझ सकते हैं, जहां एक नए जीवन की संभावना मौजूद है। दूसरी तरफ लाखों शुक्राणु अपनी-अपनी यात्रा पर निकलते हैं, जैसे अंतरिक्ष में अनगिनत पिंड किसी मंज़िल की तरफ बढ़ रहे हों।

फिर एक शुक्राणु अंडाणु तक पहुंचता है और दोनों की आनुवंशिक जानकारी मिलकर एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करती है।

बाहर एक दुनिया है… और अंदर भी एक दुनिया है।

शायद प्रकृति का सबसे खूबसूरत रहस्य यही है—जो ब्रह्मांड हमारे बाहर है, उसकी एक छोटी-सी झलक हमारे अंदर भी मौजूद है।

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चाँद पर इंसान का वजन तो करीब 6 गुना कम हो जाएगा, लेकिन शरीर की परेशानी इतनी आसान नहीं होगी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इंसानी हड्डियां और मांसपेशियां कम गुरुत्व में लंबे समय तक मजबूत रह पाएंगी? 

चाँद की सतह पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का करीब एक-छठा यानी लगभग 16.5% है। इसलिए पृथ्वी पर अगर आपका वजन 60 किलो है, तो चाँद पर वही शरीर करीब 10 किलो के वजन जैसा महसूस होगा। 

लेकिन यहां एक बड़ा फर्क है—वजन कम होना और शरीर का हल्का हो जाना एक ही बात नहीं है। शरीर का द्रव्यमान वही रहता है, बस उसे नीचे खींचने वाला गुरुत्व कम हो जाता है।

पृथ्वी पर आपकी हड्डियों और मांसपेशियों को हर दिन शरीर का भार संभालना पड़ता है। यही लगातार मैकेनिकल लोड उन्हें मजबूत बनाए रखने में मदद करता है। कम गुरुत्व में यह दबाव बहुत कम हो जाएगा।

अंतरिक्ष में लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी में रहने वाले अंतरिक्ष यात्रियों में हड्डियों की खनिज घनता औसतन करीब 1 से 1.5 प्रतिशत प्रति महीने तक घट सकती है। मांसपेशियां भी कमजोर और छोटी होने लगती हैं, जिसे मसल एट्रॉफी कहा जाता है। 

हालांकि चाँद की स्थिति अंतरिक्ष स्टेशन जैसी लगभग शून्य गुरुत्व वाली नहीं है। वहां कुछ गुरुत्व मौजूद है, इसलिए शरीर पर असर माइक्रोग्रैविटी की तुलना में कम हो सकता है। लेकिन वैज्ञानिकों के पास अभी लंबे समय तक चाँद के गुरुत्व में रहने वाले इंसानों का पर्याप्त सीधा डेटा नहीं है। 

कुछ शोधों के मुताबिक 0.4 गुना पृथ्वी के गुरुत्व से कम वातावरण लंबे समय में हड्डियों, मांसपेशियों और कार्डियोवैस्कुलर फिटनेस को पृथ्वी जैसी स्थिति में बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। चाँद का गुरुत्व इससे भी काफी कम है। 

इसी वजह से भविष्य के चंद्र मिशनों में रोजाना रेजिस्टेंस ट्रेनिंग, कार्डियो एक्सरसाइज और सही डाइट बहुत जरूरी होगी। नासा पहले से ही ऐसे एक्सरसाइज सिस्टम पर काम कर रहा है, ताकि अंतरिक्ष यात्रियों की हड्डियों और मांसपेशियों को ज्यादा से ज्यादा मजबूत रखा जा सके। 

और एक बात साफ है—हड्डियां वहां “गलेंगी” नहीं, बल्कि लंबे समय तक कम भार मिलने से उनकी मजबूती और खनिज घनता घट सकती है।

अगर आपको चाँद पर रहने का मौका मिले, तो क्या आप कम गुरुत्व में महीनों बिताने का जोखिम उठाएंगे?

ओरिजन सोर्स: नासा मानव अंतरिक्ष शोध

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12 सितंबर 1992 को एक ऐसी उड़ान हुई, जिसने सिर्फ अंतरिक्ष का सफर नहीं बदला… बल्कि लाखों लड़कियों को यह दिखा दिया कि उनके लिए भी अंतरिक्ष के दरवाजे खुले हैं। 🚀

उस दिन डॉ. मे जेमिसन ने स्पेस शटल एंडेवर से एसटीएस-47 मिशन के लिए उड़ान भरी और अंतरिक्ष में जाने वाली पहली अफ्रीकी-अमेरिकी महिला बनीं। यह मिशन करीब 8 दिन चला और उन्होंने अंतरिक्ष में 190 घंटे से ज्यादा समय बिताया। 

लेकिन मे जेमिसन की कहानी सिर्फ इस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं थी। वह इंजीनियर होने के साथ डॉक्टर भी थीं। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से केमिकल इंजीनियरिंग पढ़ने के बाद उन्होंने कॉर्नेल से मेडिकल डिग्री ली और पीस कॉर्प्स के साथ अफ्रीका में मेडिकल ऑफिसर के तौर पर भी काम किया। 

नासा ने उन्हें 1987 में एस्ट्रोनॉट प्रोग्राम के लिए चुना। 1992 में उनकी पहली अंतरिक्ष उड़ान जापान की स्पेस एजेंसी के साथ मिलकर किए गए एक बड़े साइंस मिशन का हिस्सा थी।

इस मिशन में माइक्रोग्रैविटी के असर को समझने के लिए 44 प्रयोग किए गए। इनमें इंसानी शरीर, कोशिकाओं, पौधों, जानवरों और हड्डियों से जुड़े प्रयोग शामिल थे। जेमिसन ने खास तौर पर बोन सेल रिसर्च, स्पेस मोशन सिकनेस और अंतरिक्ष में मेंढकों के निषेचन जैसे प्रयोगों पर काम किया। 

दिलचस्प बात यह है कि वह सिर्फ डॉक्टर और एस्ट्रोनॉट नहीं थीं। बचपन से ही उन्हें अंतरिक्ष और विज्ञान में गहरी दिलचस्पी थी और टीवी सीरीज स्टार ट्रेक से भी उन्हें प्रेरणा मिली थी। 

उनकी कहानी आज भी एक सीधा संदेश देती है—किसी सपने के लिए रास्ता पहले से बना होना जरूरी नहीं, कभी-कभी तुम्हें ही पहला रास्ता बनाना पड़ता है।

ओरिजन सोर्स: नासा और नासा हिस्ट्री

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मंगल ग्रह पर इंसान कैसे रहेगा!?
हम आमतौर पर मानते हैं कि दिमाग पहले किसी चीज़ को महसूस करता है, फिर उसके बारे में सोचता है और आखिर में फैसला लेकर शरीर को काम करने का आदेश देता है। लेकिन एक नई स्टडी इस पूरी तस्वीर को चुनौती देती है।

न्यूरोसाइंटिस्ट टॉम जेम्स का कहना है कि सोचना और कोई शारीरिक काम करना शायद अलग-अलग चरण नहीं हैं। दोनों एक ही तरह की न्यूरल गतिविधि का हिस्सा हो सकते हैं। यानी दिमाग में कोई अलग “कंट्रोल रूम” बैठकर फैसला नहीं ले रहा हो सकता।

इस विचार के मुताबिक, हमारा व्यवहार कई छोटे-छोटे न्यूरल सिस्टम और उनकी आपसी बातचीत से अपने आप उभर सकता है—ठीक वैसे जैसे रोबोट कुछ सरल नियमों के आधार पर जटिल व्यवहार दिखा सकता है।

हालांकि, यह अभी एक सैद्धांतिक विचार है, कोई अंतिम वैज्ञानिक प्रमाण नहीं। आगे के प्रयोग ही बताएंगे कि हमारा दिमाग वास्तव में फैसले कैसे बनाता है।

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8 ऐसी आदतें जो आपके दिमाग को नुकसान पहुँचाती हैं!?
ब्रह्मांड जितना विशाल है, उतना ही रहस्यमय भी। इसमें ऐसी खगोलीय संरचनाएँ और घटनाएँ मौजूद हैं, जिन्हें देखकर उनकी विशालता और ताकत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है।

नीहारिका गैस और धूल के विशाल बादल होते हैं। कुछ नीहारिकाओं में नए तारों का जन्म होता है, जबकि कुछ मर चुके तारों के बचे हुए पदार्थ से बनती हैं।

ब्लैक होल अंतरिक्ष की ऐसी जगह है जहाँ गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि उसके event horizon के अंदर से प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता। इसके आसपास घूमती गर्म गैस और धूल बेहद चमकीली दिखाई दे सकती है।

जब कोई विशाल तारा अपने जीवन के अंत में पहुंचता है, तो वह सुपरनोवा के रूप में जबरदस्त विस्फोट कर सकता है। इस दौरान भारी मात्रा में ऊर्जा और पदार्थ अंतरिक्ष में फैलता है।

ऐसे विस्फोट के बाद कभी-कभी तारे का बेहद घना core बच जाता है, जिसे न्यूट्रॉन स्टार कहते हैं। इसका द्रव्यमान सूर्य के बराबर या उससे अधिक हो सकता है, लेकिन इसका आकार शहर जितना छोटा हो सकता है।

कुछ न्यूट्रॉन स्टार बहुत तेजी से घूमते हैं और radiation की नियमित किरणें भेजते हैं। इन्हें पल्सर कहा जाता है। ये अंतरिक्ष में घूमते हुए कॉस्मिक लाइटहाउस जैसे लगते हैं।

वहीं क्वासर किसी साधारण तारे से भी कहीं ज्यादा शक्तिशाली दिखाई दे सकता है। यह आमतौर पर galaxy के केंद्र में मौजूद supermassive black hole के आसपास पदार्थ के अत्यधिक गर्म होने से पैदा होने वाली विशाल ऊर्जा से जुड़ा होता है।

इन सभी को देखकर एक बात साफ होती है—ब्रह्मांड सिर्फ तारों से भरा खाली स्थान नहीं, बल्कि लगातार बदलती और अविश्वसनीय घटनाओं की एक विशाल दुनिया है।
डार्क मैटर सिर्फ कोई अदृश्य पदार्थ नहीं, बल्कि शायद ब्रह्मांड की ऐसी परत से जुड़ा हो जिसे हम सीधे देख ही नहीं सकते।
2026 की एक नई थ्योरी ने इसे एक छिपे हुए पांचवें डाइमेंशन से जोड़ने की संभावना सामने रखी है। 

डार्क मैटर को हम सीधे देख नहीं पाते, क्योंकि यह सामान्य पदार्थ की तरह प्रकाश के साथ आसानी से इंटरैक्ट नहीं करता। लेकिन आकाशगंगाओं की गति और ब्रह्मांड की बड़ी संरचना पर इसका गुरुत्वाकर्षण असर दिखाई देता है। इसी वजह से वैज्ञानिक मानते हैं कि ब्रह्मांड में दिखाई देने वाले पदार्थ के अलावा कुछ और भी मौजूद है।

अब सवाल आता है—अगर यह पदार्थ दिखाई नहीं देता, तो क्या इसकी वजह यह हो सकती है कि यह हमारी दुनिया के अलावा किसी अतिरिक्त डाइमेंशन में भी फैला हुआ हो?

यहीं से नई थ्योरी दिलचस्प हो जाती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड और इंडियाना यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 2026 में एक मॉडल पेश किया, जिसमें डार्क मैटर और एक काल्पनिक डार्क फोटॉन को एक छिपे हुए पांचवें spatial dimension से जोड़ा गया है। 

इस मॉडल में उस अतिरिक्त डाइमेंशन की ज्यामिति डार्क मैटर और डार्क फोटॉन के mass ratio को एक खास स्थिति में ला सकती है। इसे रेजोनेंस कहा जाता है—कुछ वैसा जैसे किसी संगीत वाद्य की दो frequencies बिल्कुल सही तालमेल में आ जाएं।

इसका असर शुरुआती ब्रह्मांड में ज्यादा मजबूत हो सकता था। उस समय डार्क मैटर के कण आपस में ज्यादा आसानी से प्रतिक्रिया कर सकते थे, जबकि आज वही इंटरैक्शन बेहद कमजोर दिखाई दे सकता है। इससे यह समझाने में मदद मिल सकती है कि डार्क मैटर आज इतना मुश्किल क्यों है। 

लेकिन यहां सबसे जरूरी बात है—यह अभी सिर्फ एक theoretical model है। किसी पांचवें डाइमेंशन का सीधा सबूत आज तक नहीं मिला है। दूसरे वैज्ञानिक मॉडल भी अतिरिक्त डाइमेंशन और डार्क मैटर को जोड़ने की कोशिश कर चुके हैं। 

अगर भविष्य में प्रयोगों या ब्रह्मांडीय observations से इसका कोई संकेत मिल गया, तो मामला बहुत बड़ा होगा। इसका मतलब सिर्फ डार्क मैटर का रहस्य सुलझना नहीं होगा, बल्कि हमें यह भी पता चल सकता है कि हमारी दिखाई देने वाली दुनिया के पीछे स्पेस की और कितनी परतें छिपी हैं।

अगर सच में ब्रह्मांड में कोई पांचवां डाइमेंशन मौजूद हो, तो क्या आपको लगता है कि हम कभी उसे सीधे महसूस या देख पाएंगे?

ओरिजन सोर्स: यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड शोध

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14 फरवरी 1990 को Voyager 1 ने पृथ्वी की ओर अपना कैमरा घुमाकर एक ऐतिहासिक तस्वीर खींची। करीब 6.4 अरब किलोमीटर दूर से हमारी पूरी पृथ्वी सिर्फ एक बेहद छोटे, लगभग 0.12 पिक्सल के नीले बिंदु जैसी दिखाई दी। इसी तस्वीर को बाद में “Pale Blue Dot” कहा गया।

इस तस्वीर ने वैज्ञानिक कार्ल सेगन को इंसानियत पर सोचने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि हमारी सारी खुशियाँ, दुख, रिश्ते, उपलब्धियाँ और संघर्ष इसी छोटे-से ग्रह पर होते हैं।

आज दशकों बाद भी यह तस्वीर एक गहरी बात याद दिलाती है ब्रह्मांड की विशालता के सामने हमारी धरती कितनी छोटी है। फिर भी यही छोटा-सा नीला बिंदु हमारा घर है।

शायद इसलिए इसकी सबसे बड़ी सीख है: धरती छोटी है, लेकिन हमारे लिए इससे ज्यादा कीमती जगह कोई नहीं।

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मंगल की एक साधारण-सी चट्टान में ऐसा खनिज मिला है, जिसे देखकर वैज्ञानिक भी चौंक गए।
क्योंकि इसी खनिज से धरती पर रूबी और नीलम जैसे कीमती रत्न बनते हैं। 

नासा के पर्सीवरेंस रोवर ने मंगल के जेज़ेरो क्रेटर के किनारे कुछ हल्के रंग की चट्टानों की जांच की। पहली नजर में ये चट्टानें बिल्कुल सामान्य लग रही थीं, लेकिन रोवर के सुपरकैम ने इनके अंदर कोरंडम नाम के खनिज के संकेत पकड़ लिए। 

कोरंडम असल में एल्युमिनियम और ऑक्सीजन से बना खनिज है। धरती पर अगर इसमें थोड़ी मात्रा में क्रोमियम मिल जाए, तो यही खनिज लाल या गुलाबी रंग का रूबी बना सकता है। दूसरी अशुद्धियों की वजह से इसी परिवार से अलग-अलग रंगों के नीलम भी बनते हैं। 

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि रोवर को मंगल पर चमकते हुए बड़े-बड़े रूबी और नीलम के पत्थर मिल गए हैं। वैज्ञानिकों ने बेहद छोटे खनिज कणों के संकेत पकड़े हैं, जिनमें क्रोमियम की मौजूदगी भी दिखाई देती है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस खोज से मंगल के पुराने इतिहास का एक नया सुराग मिल सकता है। कोरंडम आम चट्टानों में आसानी से नहीं बनता। इसके लिए एल्युमिनियम से भरपूर और सिलिका से कम परिस्थितियां चाहिए होती हैं। 

वैज्ञानिकों का मानना है कि जेज़ेरो क्रेटर में कभी बड़े उल्कापिंडों के टकराने से पैदा हुई जबरदस्त गर्मी और दबाव ने इन चट्टानों को बदलने में भूमिका निभाई होगी। किसी समय मौजूद द्रव ने भी इस प्रक्रिया में मदद की हो सकती है। 

और जिस “लेजर” की वजह से यह खोज हुई, वह भी कमाल है। सुपरकैम दूर से चट्टान पर लेजर डालकर उसके बेहद छोटे हिस्से को गर्म करता है और निकलने वाली रोशनी का विश्लेषण करता है। इससे वैज्ञानिक चट्टान की रासायनिक और खनिज संरचना जान सकते हैं। 

यानी मंगल पर मिला यह “रत्न” सिर्फ खूबसूरत खनिज की कहानी नहीं है। यह अरबों साल पहले मंगल पर हुई भयंकर भूगर्भीय घटनाओं का रिकॉर्ड भी हो सकता है।

अगर मंगल पर सच में बड़े रूबी और नीलम के भंडार मिल जाएं, तो क्या इंसान वहां खनन करने पहुंचेगा?

ओरिजन सोर्स: यूएसजीएस मंगल खनिज शोध

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ब्रह्मांड में ब्लैक होल सबसे रहस्यमय और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित खगोलीय घटनाओं में से एक है। इसके आसपास का गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि एक सीमा के बाद प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता।

इसके विपरीत, व्हाइट होल को ब्लैक होल का उल्टा माना जाता है। सैद्धांतिक रूप से इसमें चीजें बाहर निकल सकती हैं, लेकिन बाहर से अंदर नहीं जा सकतीं। अभी तक किसी वास्तविक व्हाइट होल का प्रमाण नहीं मिला है।

वहीं वर्महोल को अंतरिक्ष और समय के दो अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाली एक काल्पनिक सुरंग माना जाता है। अगर ऐसा रास्ता वास्तव में मौजूद हो और स्थिर रह सके, तो यह ब्रह्मांड के बेहद दूर क्षेत्रों के बीच छोटा रास्ता बन सकता है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि कुछ सिद्धांतों में ब्लैक होल, वर्महोल और व्हाइट होल के बीच संभावित संबंधों पर भी विचार किया गया है। हालांकि, इनमें से कई विचार अभी सिर्फ सैद्धांतिक हैं।

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NASA के Curiosity रोवर की एक तस्वीर ने लोगों को हैरान कर दिया। मंगल की सतह के ऊपर एक अजीब-सी आकृति दिखाई दी, जो देखने में बिल्कुल तैरती हुई जेलीफ़िश जैसी लगती है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह के दावे भी होने लगे।

लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह कोई एलियन जीव नहीं है। सबसे संभावित वजह कॉस्मिक रे है। अंतरिक्ष से आने वाला बेहद ऊर्जावान कण जब रोवर के कैमरा सेंसर से टकराता है, तो तस्वीर में ऐसी अजीब चमकदार या धुंधली आकृति बन सकती है।

इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि इसी जगह की कुछ सेकंड पहले और बाद की तस्वीरों में यह आकृति दिखाई नहीं देती।

यानी मंगल पर कोई जेलीफ़िश तैरती नहीं मिली—यह संभवतः कैमरे में दर्ज हुआ एक कॉस्मिक-रे आर्टिफैक्ट है।

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सोते समय आपका दिमाग बंद नहीं होता

जब हम सोते हैं, तो हमारा दिमाग पूरी तरह बंद नहीं होता। नींद के दौरान दिमाग अलग-अलग चरणों से गुजरता है, जिनमें एनआरईएम और आरईएम नींद शामिल हैं। हर चरण में दिमाग की गतिविधि अलग होती है। 

खासकर आरईएम नींद में दिमाग काफी सक्रिय रहता है और इस दौरान सपने अक्सर ज्यादा साफ और जीवंत होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि सपने सिर्फ आरईएम में ही नहीं, बल्कि एनआरईएम नींद में भी आ सकते हैं। 

सपने देखते समय हमें कई बार लगता है कि हम सच में किसी जगह मौजूद हैं, क्योंकि दिमाग अंदर से दृश्य, आवाज़ और भावनाओं जैसे अनुभव बना सकता है। हालांकि वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं जानते कि सपने आखिर क्यों आते हैं। 

इसलिए यह कहना ज्यादा सही है कि नींद में दिमाग बंद नहीं होता, बल्कि उसका काम करने का तरीका बदल जाता है।

मूल जानकारी: एनआईएच, एनआईसीएचडी, एनआईएनडीएस

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आपकी जीभ… एक जादू की छड़ी जैसी है

हम जो बोलते हैं, उसका असर सिर्फ सामने वाले पर नहीं पड़ता, बल्कि हमारी अपनी सोच पर भी पड़ सकता है।

शब्द अपने आप हमारी किस्मत नहीं बदल देते, लेकिन वे हमारे सोचने, महसूस करने और काम करने के तरीके को जरूर प्रभावित कर सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति बार-बार खुद से कहता है, “मैं कुछ नहीं कर सकता”, तो धीरे-धीरे उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ सकता है। वहीं अगर वह कहता है, “मैं कोशिश कर सकता हूँ”, तो उसके अंदर कोशिश करने की इच्छा मजबूत हो सकती है।

इसलिए जीभ को जादू की छड़ी कहना एक खूबसूरत रूपक है। हम अपने शब्दों से दुनिया को जादुई तरीके से नहीं बदलते, लेकिन शब्द हमारे विचारों को दिशा दे सकते हैं और विचार हमारे फैसलों और व्यवहार को।

इसलिए बोलने से पहले सोचिए—क्योंकि हर शब्द किसी न किसी सोच को मजबूत करता है।

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ऊपर आसमान में घूम रहे सैटेलाइट्स पर नजर रखने के लिए अब एक नया “निगरानी सिस्टम” अंतरिक्ष में जाने वाला है।
खास बात यह है कि ये सैटेलाइट जमीन को नहीं, बल्कि दूसरे सैटेलाइट्स को देखने के लिए बनाए जा रहे हैं।

अमेरिकी कंपनी एस्ट्रानिस ने “परसेप्टर” नाम के नए अंतरिक्ष यान पेश किए हैं। इनका काम खास तौर पर जियोस्टेशनरी ऑर्बिट यानी पृथ्वी से करीब 35,786 किलोमीटर ऊपर मौजूद सैटेलाइट्स की गतिविधियों पर नजर रखना है। 

इस ऊंचाई पर संचार, मौसम और सुरक्षा से जुड़े कई बेहद जरूरी सैटेलाइट काम करते हैं। लेकिन इतनी दूर मौजूद किसी दूसरे सैटेलाइट को लगातार ट्रैक करना आसान नहीं है।

यहीं परसेप्टर की असली भूमिका शुरू होती है। इसमें खास सेंसर लगाए जाएंगे, जिनसे यह दूसरे अंतरिक्ष यानों को देखकर उनकी स्थिति और गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटा सकेगा। यह सिर्फ दूर से देखने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अलग-अलग कोणों से फ्लाई-बाय करके किसी सैटेलाइट का ज्यादा करीब से निरीक्षण भी कर सकेगा। 

सबसे दिलचस्प हिस्सा इसकी मूवमेंट क्षमता है। परसेप्टर में इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन होगा, जिसकी मदद से यह जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के बड़े हिस्से में अपनी जगह बदल सकेगा और मिशन के दौरान कई बार दोबारा पोजीशन ले सकेगा। 

इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी सैटेलाइट के पास अचानक कोई अनजान वस्तु पहुंचती है, तो परसेप्टर वहां जाकर स्थिति को समझने में मदद कर सकता है।

एक से ज्यादा परसेप्टर साथ काम करें तो किसी सैटेलाइट को कई दिशाओं से देखने की क्षमता भी बढ़ सकती है। इससे अंतरिक्ष में क्या हो रहा है, इसकी बेहतर तस्वीर मिल सकती है। 

फिलहाल परसेप्टर विकास के चरण में है और इसकी लॉन्च तारीख घोषित नहीं हुई है। लेकिन यह साफ संकेत है कि भविष्य में अंतरिक्ष सुरक्षा का मतलब सिर्फ अपने सैटेलाइट भेजना नहीं होगा, बल्कि यह जानना भी होगा कि उनके आसपास कौन मौजूद है।

क्या आने वाले समय में अंतरिक्ष में निगरानी सैटेलाइट्स की संख्या खुद सैटेलाइट्स जितनी जरूरी हो जाएगी?

ओरिजन सोर्स: एस्ट्रानिस की आधिकारिक घोषणा

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11 सितंबर 1952 को अमेरिकी सर्जन डॉ. चार्ल्स हफनागेल ने मेडिकल इतिहास में एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने वॉशिंगटन डी.सी. के जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में 30 साल की एक महिला के शरीर में एक कृत्रिम वाल्व लगाया। उसका प्राकृतिक महाधमनी वाल्व रूमेटिक फीवर के कारण खराब हो गया था, जिससे खून दिल की तरफ वापस जाने लगा था।

हफनागेल का बनाया वाल्व आज के कृत्रिम हार्ट वाल्व जैसा नहीं था। यह एक छोटी पारदर्शी प्लास्टिक ट्यूब थी, जिसके अंदर एक छोटी गेंद लगी थी। खून आगे जाता तो गेंद रास्ता खोल देती और वापस आने पर रास्ता बंद कर देती।

उस समय हार्ट-लंग बायपास मशीन उपलब्ध नहीं थी, इसलिए इसे सीधे दिल के वाल्व की जगह नहीं लगाया गया, बल्कि डिसेंडिंग एओर्टा में लगाया गया।

यह सफल प्रयोग आगे चलकर आधुनिक कृत्रिम हार्ट वाल्व सर्जरी के विकास की नींव बना।

मूल जानकारी: जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी, एनआईएच, नेशनल म्यूज़ियम ऑफ अमेरिकन हिस्ट्री

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