90 किलो गांजा तस्करी का 24 घंटे में खुलासा, सप्लाई नेटवर्क के दो और तस्कर गिरफ्तार
एंबुलेंस में गांजा पहुंचाने वाले नेटवर्क की खुली पूरी कहानी, रुद्रप्रयाग से गांजा खरीदकर श्रीनगर में महंगे दाम पर बेचने की थी तैयारी
श्रीनगर। एंबुलेंस में 90 किलो गांजा बरामदगी के मामले में पौड़ी पुलिस ने महज 24 घंटे के भीतर पूरे सप्लाई नेटवर्क का खुलासा करते हुए दो और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने गांजा बेचने वाले मुख्य सप्लायर और तस्करी में शामिल सह अभियुक्त को दबोचकर न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया। इस कार्रवाई के साथ ही पुलिस ने रुद्रप्रयाग से श्रीनगर तक फैले गांजा तस्करी के नेटवर्क की अहम कड़ी को ध्वस्त कर दिया है।
गौरतलब है कि 23 अगस्त को श्रीनगर पुलिस ने आवास विकास ग्राउंड के समीप चेकिंग के दौरान इको एंबुलेंस संख्या UK14-PA-0539 से नौ कट्टों में रखा 90 किलोग्राम अवैध गांजा बरामद किया था। बरामद गांजे की कीमत करीब 45 लाख रुपये बताई गई थी। पुलिस ने एंबुलेंस चालक रविन्द्र सिंह को गिरफ्तार कर वाहन सीज करते हुए कोतवाली श्रीनगर में धारा 8/20/60 एनडीपीएस एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया था।
मामले को गंभीरता से लेते हुए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पौड़ी सर्वेश पंवार ने तस्करी की सप्लाई चेन से जुड़े अन्य लोगों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए। क्षेत्राधिकारी श्रीनगर तपेश कुमार के पर्यवेक्षण और प्रभारी निरीक्षक कोतवाली श्रीनगर कुलदीप सिंह के नेतृत्व में विशेष पुलिस टीम गठित कर सूचना एवं साक्ष्यों को जुटाया गया।
पूछताछ और जांच में सामने आया कि गिरफ्तार एंबुलेंस चालक रविन्द्र सिंह के साथ रविन्द्र कठैत उर्फ बिट्टू ने रुद्रप्रयाग निवासी विनोद रावत से कम कीमत पर थोक मात्रा में गांजा खरीदा था। इसके बाद गांजे को एंबुलेंस के जरिए श्रीनगर लाकर अधिक कीमत पर बेचने की योजना थी।
पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए रविन्द्र कठैत उर्फ बिट्टू (38), निवासी बड्यारगढ़, टिहरी गढ़वाल, हाल भक्तियाना श्रीनगर को श्रीनगर से तथा विनोद रावत (47), निवासी बणसू, रुद्रप्रयाग को रुद्रप्रयाग से गिरफ्तार कर लिया। दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया।
एंबुलेंस को इसलिए चुना, ताकि जांच से बच सकें : पूछताछ में रविन्द्र कठैत उर्फ बिट्टू ने पुलिस को बताया कि तस्करी के लिए एंबुलेंस का इस्तेमाल इसलिए किया जाता था क्योंकि ऐसे वाहनों पर सामान्य तौर पर कम संदेह होता है और मानवीय संवेदनाओं के चलते उनकी जांच भी अपेक्षाकृत कम होने की उम्मीद रहती थी।