1933 में दमोह आए थे महात्मा गांधी, वाल्मीकि गुरुद्वारे की रखी थी नींव; आज भी मौजूद है शिलालेख
शेवरोले कार से गढ़ाकोटा से दमोह पहुंचे थे बापू, मोरगंज गल्ला मंडी में करीब 10 हजार लोगों को किया था संबोधित
बाल्मिकी समाज ने 3 पीढ़ियों से संभाल रखी है, गुरुद्वारे के संरक्षण और सुरक्षा को बागडोर
दमोह। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर देशभर में उनकी स्मृतियों और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को याद किया जा रहा है। दमोह का भी महात्मा गांधी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंग है। वर्ष 1933 में गांधीजी पहली बार दमोह पहुंचे थे। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने शहर के गडरयाऊ मोहल्ले की तत्कालीन मलिन बस्ती में पहुंचकर वाल्मीकि गुरुद्वारे की नींव रखी थी। आज करीब 93 वर्ष बाद भी इस ऐतिहासिक स्थल पर गांधीजी की स्मृतियां जीवित हैं।
गुरुद्वारे में गांधीजी की प्रतिमा स्थापित है, जबकि उनके आगमन और गुरुद्वारे की नींव रखे जाने से जुड़ा शिलालेख भी यहां मौजूद है। वर्तमान में इस गुरुद्वारे की देखरेख वाल्मीकि समाज द्वारा की जाती है। गांधी जयंती के अवसर पर यहां समाज के लोगों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी और उनके बताए अहिंसा व शांति के मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया।
गढ़ाकोटा से शेवरोले कार में दमोह आए थे गांधीजी
बताया जाता है कि वर्ष 1933 में जब महात्मा गांधी दमोह पहुंचे थे, तब उन्हें गढ़ाकोटा से दमोह तक एक शेवरोले कार से लाया गया था। यह कार शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सक डॉ. बीडी दुआ की थी। उस समय कार चलाने की जिम्मेदारी जगन्नाथ पटेरिया ने निभाई थी।
गांधीजी के दमोह आगमन से पहले कार के चमड़े के सीट कवर हटाकर खादी के कपड़े के कवर लगाए गए थे। इसके बाद इसी कार से गांधीजी को गढ़ाकोटा से दमोह लाया गया और शहर में उनका भ्रमण कराया गया।
डॉ. दुआ के परिवार से जुड़े चिकित्सक डॉ. तरुण दुआ के अनुसार, उनके दादा डॉ. बीडी दुआ उस समय जेल डॉक्टर थे। गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। परिवार में पीढ़ियों से गांधीजी के दमोह आगमन और उनके दादा के योगदान से जुड़ी बातें बताई जाती रही हैं।
मोरगंज गल्ला मंडी में हुई थी बड़ी सभा
दमोह पहुंचने के बाद महात्मा गांधी ने मोरगंज गल्ला मंडी में सभा को संबोधित किया था। स्थानीय जानकारी के अनुसार इस सभा में करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। गांधीजी को देखने और सुनने के लिए शहर के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचे थे।
सभा के बाद गांधीजी गडरयाऊ मोहल्ले की उस बस्ती में पहुंचे, जहां उन्होंने गुरुद्वारे की नींव रखी। यह स्थान उस समय समाज के वंचित और पिछड़े वर्ग के लोगों की बस्ती के रूप में जाना जाता था।
गांधीजी के हाथों रखी गई नींव, आज भी कायम है स्मृति
गांधीजी ने जिस गुरुद्वारे की नींव रखी थी, वह आज वाल्मीकि गुरुद्वारे के नाम से जाना जाता है। गुरुद्वारे में उनकी प्रतिमा भी स्थापित है। श्रद्धालु यहां गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष मत्था टेकने के साथ महात्मा गांधी को भी नमन करते हैं।
गुरुद्वारा समिति से जुड़े संरक्षक सुरेंद्र सिंह परोचे के अनुसार, उनके परिवार की तीन पीढ़ियां इस स्थल के संरक्षण और देखरेख से जुड़ी रही हैं। उन्होंने बताया कि शासन की ओर से गुरुद्वारे को पुरातत्व संरक्षण के अंतर्गत संरक्षित किया गया है, लेकिन भवन की पुरानी दीवारों और जीर्ण-शीर्ण हिस्सों के संरक्षण एवं मरम्मत की जरूरत बनी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि समय-समय पर समाज के लोग अपने स्तर पर यहां मरम्मत और रखरखाव का काम कराते हैं। उनका कहना है कि गांधीजी से जुड़ा यह ऐतिहासिक स्थल दमोह की महत्वपूर्ण धरोहर है, इसलिए इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
दमोह से जुड़ा है 'एक चवन्नी चांदी की...' नारे का प्रसंग
महात्मा गांधी के दमोह प्रवास से जुड़ा एक और चर्चित प्रसंग 'एक चवन्नी चांदी की, जय बोल महात्मा गांधी की' नारे को लेकर बताया जाता है। स्थानीय स्मृतियों के अनुसार यह नारा गांधीजी के दमोह आगमन के दौरान यहां गूंजा था और बाद में देशभर में लोकप्रिय हुआ।
पूर्व विधायक स्वर्गीय आनंद श्रीवास्तव भी इस प्रसंग का उल्लेख किया करते थे। बताया जाता है कि वे बचपन में गांधीजी को घंटाघर के पास देखने वालों में शामिल थे। उनके अनुसार उस समय चांदी की चवन्नी प्रचलन में थी और इसी को आधार बनाकर यह नारा लगाया गया था।
तीन पीढ़ियों से गुरुद्वारे की देखरेख
वाल्मीकि गुरुद्वारा समिति के संरक्षक सुरेंद्र सिंह परोचे ने बताया कि गांधीजी के आगमन के बाद से यह स्थल लोगों की आस्था और ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ा हुआ है। उनके अनुसार करीब 93 वर्ष पुराने इस गुरुद्वारे में आज भी गांधीजी की प्रतिमा और उनके आगमन से संबंधित शिलालेख मौजूद है।
यहां सुबह प्रभात फेरी के साथ दोनों समय अरदास की जाती है। अलग-अलग अवसरों पर समाज के लोग और श्रद्धालु गुरुद्वारे में पहुंचते हैं।
उन्होंने बताया कि गांधीजी दमोह प्रवास के दौरान लट्ठांक मोहल्ले से होते हुए वाल्मीकि मोहल्ले पहुंचे थे। गांधीजी हमेशा समाज के शोषित, वंचित और कमजोर वर्गों के अधिकारों की बात करते थे। ऐसे में उनका इस बस्ती में पहुंचना और यहां गुरुद्वारे की नींव रखना आज भी लोगों के लिए महत्वपूर्ण स्मृति है।
गांधी जयंती पर प्रतिमा पर अर्पित किए पुष्प
2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर वाल्मीकि गुरुद्वारे में भी कार्यक्रम आयोजित किया गया। समिति से जुड़े महेश खरारे, सुरेंद्र सिंह परोचे, कल्याण सिंह परोचे, परशु परोचे और मानक चौहान सहित अन्य लोगों ने गुरुद्वारे में स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
समिति सदस्यों ने कहा कि गांधीजी ने अहिंसा, शांति और सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया था। दमोह में उनकी यात्रा से जुड़ा यह स्थल आज भी विभिन्न समाजों और धर्मों के बीच सद्भाव की भावना को मजबूत करने वाली ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद है।
समिति की ओर से आम लोगों से भी इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में पहुंचने और गांधीजी की स्मृतियों से जुड़े इस स्थल को जानने की अपील की गई है।
Damoh, Damoh | Oct 2, 2026