पत्रकारों से बदसलूकी पर बवाल: ईख पदाधिकारी की मनमानी के खिलाफ मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का मीडिया ने किया बहिष्कार
मोतिहारी। मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में समाचार संकलन करने पहुंचे पत्रकारों को प्रवेश के नाम पर कथित तौर पर परेशान किए जाने का मामला अब तूल पकड़ता नजर आ रहा है। मीडिया प्रतिनिधियों और सरकारी मान्यताप्राप्त पत्रकारों ने ईख पदाधिकारी मोतिहारी श्री राम सिंह के कथित दुर्व्यवहार और मनमानी से क्षुब्ध होकर मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के कवरेज का बहिष्कार कर दिया और कई पत्रकार एवं संपादक कार्यक्रम स्थल से वापस लौट गए।
पत्रकारों का आरोप है कि कार्यक्रम स्थल के गेट पर प्रतिनियुक्त श्री राम सिंह ने मीडिया पास और प्रेस एक्रीडेशन कार्ड होने के बावजूद आधार कार्ड दिखाने की अनिवार्यता पर जोर दिया, जबकि पत्रकारों के अनुसार जिला प्रशासन की ओर से आधार कार्ड को अनिवार्य किए जाने संबंधी कोई स्पष्ट निर्देश उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था।
सवाल यह है कि जब पत्रकार के पास विधिवत प्रेस एक्रीडेशन कार्ड और कार्यक्रम का मीडिया पास मौजूद था, तो अचानक आधार कार्ड की शर्त किस आदेश के तहत लागू की गई? अगर जिला प्रशासन का ऐसा कोई लिखित निर्देश था, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया और मीडिया को पहले से इसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई?
मामले को लेकर पत्रकारों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रवेश व्यवस्था संभाल रहे पदाधिकारी का व्यवहार सम्मानजनक नहीं था। पत्रकारों का कहना है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के प्रतिनिधियों के साथ इस तरह का व्यवहार किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि पत्रकारों की पहचान जांचने वाले अधिकारी स्वयं अपनी पहचान स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कर रहे थे या नहीं? यदि मीडिया प्रतिनिधियों से पहचान पत्र मांगा जा रहा था, तो नियमों की पारदर्शिता और समानता सभी पर लागू होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री का कार्यक्रम कोई सामान्य आयोजन नहीं था। ऐसे कार्यक्रमों में मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। पत्रकार वहां किसी व्यक्तिगत काम से नहीं, बल्कि जनता तक सरकार और मुख्यमंत्री की गतिविधियों की निष्पक्ष जानकारी पहुंचाने के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में प्रवेश व्यवस्था के नाम पर कथित मनमानी और अभद्र व्यवहार का आरोप बेहद गंभीर है।
यह सिर्फ पत्रकारों के प्रवेश का मामला नहीं है। यह सवाल है कि क्या सरकारी कार्यक्रमों में मीडिया के साथ व्यवहार करने के लिए कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल है? क्या अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार नए नियम लागू कर सकते हैं? और अगर कोई विवाद हो, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
पत्रकारों का बहिष्कार इस बात का संकेत है कि मामला केवल गेट पर रोके जाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सम्मान और अधिकार से जुड़ा मुद्दा बन गया है।
जिला प्रशासन को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि आधार कार्ड की अनिवार्यता का कोई लिखित आदेश था या नहीं। अगर आदेश था तो उसे किसने जारी किया और पत्रकारों को इसकी पूर्व सूचना क्यों नहीं दी गई? और अगर ऐसा कोई आदेश नहीं था, तो किस आधार पर पत्रकारों को प्रवेश से रोका गया?
सरकारी कार्यक्रमों में व्यवस्था जरूरी है, लेकिन व्यवस्था के नाम पर मनमानी नहीं। सुरक्षा जांच और पहचान सत्यापन अपनी जगह है, लेकिन पत्रकारों के साथ सम्मानजनक व्यवहार और नियमों की पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं कि पत्रकारों को कार्यक्रम में प्रवेश मिला या नहीं। सवाल यह है कि सरकारी व्यवस्था में नियम बड़े हैं या किसी अधिकारी की मनमानी?
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