एक मां की पुकार अनसुनी क्यों रही? कमेटी गठन करने से नहीं लौटेगा बच्चा, व्यवस्था से चाहिए जवाब
मेडिकल कॉलेज चंबा में मासूम की मौत पर उठे गंभीर सवाल
सुरेंद्र ठाकुर
चंबा 07 सितम्बर
मेडिकल कॉलेज चंबा में बीती रात सामने आई मासूम की मौत की घटना ने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर कर रख दिया है। सबसे बड़ा सवाल उस मां की पीड़ा का है, जो अपने बच्चे को बचाने के लिए व्यवस्था के सामने गुहार लगाती रही। लेकिन क्या उसकी आवाज समय पर उस व्यवस्था तक पहुंची, जहां से उसके बच्चे को जिंदगी मिल सकती थी?
आज सवाल सिर्फ एक परिवार के दर्द का नहीं है। सवाल है कि आखिर मेडिकल कॉलेज चंबा की स्वास्थ्य व्यवस्था में ऐसी स्थिति क्यों पैदा हुई?
अगर अस्पताल में चिकित्सकों की कमी थी तो सवाल सरकार से है—समय रहते पर्याप्त डॉक्टरों की तैनाती क्यों नहीं हो पाई?
अगर डॉक्टर उपलब्ध थे तो सवाल अस्पताल प्रशासन से है—मरीज को समय पर जरूरी चिकित्सा सुविधा क्यों नहीं मिल पाई?
और अगर व्यवस्था में कोई कमी नहीं थी, तो फिर इस दर्दनाक घटना की परिस्थितियों की जिम्मेदारी आखिर तय कौन करेगा?
मेडिकल कॉलेज के एमएस डॉ. प्रदीप सिंह की प्रशासनिक जिम्मेदारी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या इस घटना के बाद अस्पताल प्रशासन अपनी व्यवस्थाओं की गंभीर समीक्षा करेगा? क्या कमियों को चिन्हित कर उन्हें दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, या कुछ दिनों बाद यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
इस घटना पर भुवनेश और नरेश राणा ने भी कड़ी चिंता और निंदा व्यक्त करते हुए कहा कि यदि स्वास्थ्य व्यवस्था इसी तरह चलती रही तो आने वाले समय में परिस्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। उन्होंने व्यवस्था में सुधार और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत पर सवाल उठाए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ जांच कमेटी बना देने से उस मां का बच्चा वापस आ जाएगा?
क्या किसी परिवार का उजड़ा हुआ संसार फिर से बस जाएगा?
क्या सिर्फ कागजी कार्रवाई उस मां को इंसाफ का एहसास दिला पाएगी?
कमेटी बनाना अपनी जगह जरूरी हो सकता है, लेकिन उससे भी जरूरी है जवाबदेही तय करना और व्यवस्था में वास्तविक सुधार करना।
चंबा मेडिकल कॉलेज जिले की सबसे बड़ी स्वास्थ्य संस्था है। दूरदराज के क्षेत्रों से लोग उम्मीद लेकर यहां पहुंचते हैं। ऐसे में अगर किसी मरीज को समय पर उपचार नहीं मिल पाता, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर सवाल है।
अब जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर निष्पक्ष जांच, तथ्य सामने लाने और जिम्मेदारी तय करने की है।
एक मां अपना बच्चा खो चुकी है। अब सवाल यह है—क्या व्यवस्था इस दर्द से कोई सबक लेगी?
आखिर कब तक?
कब तक मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचेंगे और व्यवस्था की कमियों पर सवाल उठते रहेंगे?
कब तक डॉक्टरों की कमी, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या अगली बार किसी मां को ऐसी पीड़ा से गुजरने से रोकने के लिए आज ही व्यवस्था जागेगी?
इस मामले में वास्तविक जिम्मेदारी और घटना के कारणों का निर्धारण निष्पक्ष जांच के बाद ही होना चाहिए।
Chamba, Chamba | Sep 7, 2026