आज़ादी के 80 साल, लाल किले से भाषण गूंजते हैं,विकास के दावे आसमान छूते हैं,करोड़ों की योजनाओं के विज्ञापन चमकते हैं,लेकिन ज़मीन पर एक ब"च्ची जूठे बर्तनों में बचा खाना तलाश रही है...!
सवाल किसी एक सरकार,एक दल या एक नेता का नहीं है,सवाल उस व्यवस्था का है जो चांद पर पहुंचने का जश्न मनाती है,मगर अपने ही ब"च्चों को भू"ख से नहीं बचा पाती......!
क्या हमारे वीर शहीदों ने ऐसे भारत का सपना देखा था? जहाँ एक तरफ़ अमीरी के रिकॉर्ड बनें और दूसरी तरफ़ मा,सूम पेट भरने के लिए कूड़े और जूठे बर्तनों में उम्मीद खोजें.....?
80 साल की आज़ादी पर जश्न भी ज़रूरी है,लेकिन आत्ममंथन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है,क्योंकि किसी राष्ट्र की असली तस्वीर उसके भाषणों में नहीं......!
उसके सबसे ग"रीब बच्चे की थाली में दिखाई देती है.....!