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Rajanikant Prabhanjan

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ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं! चारों तरफ से घिरते नजर आ रहे हैं ज्ञानेश कुमार!

देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने अब ज्ञानेश कुमार की चुनौतियां और बढ़ा दी हैं। विरोध की आवाज लगातार तेज होती जा रही है!

और इसी बीच केरल के करीब 20 साल पुराने एक मामले में भी उनके खिलाफ जांच कमेटी गठित होने की खबर सामने आई है।उस समय ज्ञानेश कुमार PWD सचिव के पद पर कार्यरत थे।

अब सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में यह विरोध और बड़ा रूप लेगा?क्या बढ़ते दबाव के बीच ज्ञानेश कुमार कोई बड़ा फैसला लेंगे?

जिस तरह से घटनाक्रम आगे बढ़ रहा है,उसे देखकर राजनीतिक गलियारों में भी चर्चाएं तेज हैं। क्या ज्ञानेश कुमार अपने पद पर बने रहेंगे या बढ़ते विरोध के बीच इस्तीफे की नौबत आ सकती है?

आने वाले दिन बेहद अहम होने वाले हैं! 

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इमरान मसूद और ओमप्रकाश राजभर दोनों का निशाना अखिलेश यादव,लेकिन सवाल है कि आखिर अपनी राजनीति कब करेंगे?

ओम प्रकाश राजभर विपक्ष में हैं,लेकिन उनकी राजनीति का बड़ा हिस्सा अखिलेश यादव पर व्यक्तिगत हमले करने में ही निकल जाता है।जनता के मुद्दे उठाने के बजाय हर वक्त अखिलेश यादव को निशाना बनाना आखिर कैसी राजनीति है?

दूसरी तरफ इमरान मसूद जी हैं,जिन्हें देखकर लगता है कि कांग्रेस को मजबूत करने से ज्यादा उन्हें अपनी सीटों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की चिंता है।

उन्हें शायद लगता है कि कांग्रेस जितनी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी,उतनी ही ज्यादा जीत हासिल करेगी।लेकिन राजनीति इतनी आसान नहीं होती जनाब!

चुनाव सिर्फ सीटों की गिनती से नहीं,बल्कि गठबंधन की ताकत, उम्मीदवार की पकड़ और पार्टी के चुनावी समीकरण से जीते जाते हैं।

किसी सीट पर सपा का उम्मीदवार मजबूत हो सकता है,तो किसी पर कांग्रेस का।हर सीट पर अपनी जिद थोपने से गठबंधन मजबूत नहीं, कमजोर होता है।

इमरान मसूद को समझना चाहिए कि राजनीति में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर गठबंधन का भविष्य होता है। अभी भी वक्त है,अखिलेश यादव की रणनीति को समझिए, 

आपसी खींचतान छोड़िए और जीत की तरफ कदम बढ़ाइए क्योंकि चुनाव जीतने के लिए सिर्फ टिकट चाहिए होता, तो हर टिकटधारी विधायक और सांसद होता!
अखिलेश यादव जी 8अक्टूबर को अयोध्या जा रहे हैं देखना दिलचस्प होगा क्या राम मंदिर जाएंगे? मुझे नहीं लगता आपकी क्या राय है
प्रेमानंद महाराज को बदनाम करने की साजिश? प्रेमानंद महाराज के केली कुंज से लापता हुआ बच्चा बरसाना के लाड़ली आश्रम में मिलने की खबर सामने आई है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर अचानक बच्चों के गायब होने की खबरें इतनी तेजी से क्यों सामने आने लगीं?क्या सभी अभिभावकों को एक साथ अपने बच्चों के लापता होने की याद आ गई?

आखिर इस पूरे मामले की सच्चाई क्या है?अगर किसी बच्चे के साथ कुछ गलत हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए,लेकिन बिना प्रमाण किसी संत और धार्मिक संस्था को बदनाम करने का खेल भी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

प्रेमानंद जी महाराज करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। उनकी छवि पर सवाल उठाने से पहले तथ्यों की जांच जरूरी है।
आज जरूरत है भावनाओं में बहने की नहीं, बल्कि सच्चाई के साथ खड़े होने की।

समाज से अपील है कि अफवाहों से बचें,बच्चों की सुरक्षा के मामले में गंभीर रहें और प्रेमानंद महाराज के खिलाफ किसी भी बेबुनियाद आरोप पर आंख मूंदकर विश्वास न करें।

बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है और संतों का सम्मान भी जरूरी है। दोनों के लिए निष्पक्ष जांच होनी चाहिए! सवाल पूछिए,सच्चाई जानिए,लेकिन किसी की छवि को साजिश का शिकार मत बनने दीजिए।

🙏 जय श्री राधे! जय श्रीराम!

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अब मुस्लिम यादवों की दरी नहीं बिछाएगा! | सपा पर AIMIM प्रवक्ता का बड़ा हमला, | मुस्लिम हिस्सेदारी पर उठाए सवाल 

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ओम प्रकाश राजभर जिस दर्द के साथ अपनी बात रख रहे हैं,वह यूपी की गठबंधन राजनीति की एक बड़ी सच्चाई को फिर सामने ला रहा है।उनका कहना है कि अखिलेश यादव ने उन्हें 16 सीटों की बात कही थी!

लेकिन उन सीटों में से 12 पर सपा ने अपने उम्मीदवार उतार दिए।
यही नहीं,चंद्रशेखर रावण को भी महज 2 सीटों के लिए नेशनल टीवी पर अपनी बात रखते हुए भावुक होना पड़ा था।

सवाल यह है कि आखिर अखिलेश यादव के साथ गठबंधन करने वाले छोटे दलों को बार-बार अपनी राजनीतिक हैसियत साबित क्यों करनी पड़ती है?

जयंत चौधरी हों,पल्लवी पटेल हों,स्वामी प्रसाद मौर्य हों या फिर ओम प्रकाश राजभर,गठबंधन की राजनीति में इन नेताओं के अनुभव और बाद में बने हालात कई सवाल खड़े करते हैं।

राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों का समझौता नहीं,बल्कि सम्मान भरोसे और साझेदारी का नाम भी है।अगर बड़े दल अपने सहयोगियों को बराबरी का दर्जा नहीं देंगे,तो गठबंधन ज्यादा दिन टिकना मुश्किल है।

फिलहाल सपा और कांग्रेस के बीच भी सीटों को लेकर खींचतान की खबरें चर्चा में हैं।इस बार कांग्रेस भी अपने पुराने अंदाज में समझौता करने के मूड में नजर नहीं आ रही।

अखिलेश यादव के सामने चुनौती साफ है या तो सहयोगियों को सम्मान देकर साथ लेकर चलें,या फिर गठबंधन की राजनीति में अकेले पड़ने का जोखिम उठाएं।

क्योंकि राजनीति में ताकत सिर्फ बड़ी पार्टी होने से नहीं आती, सहयोगियों का भरोसा भी उतना ही जरूरी होता है।

सवाल सीधा है—क्या अखिलेश यादव गठबंधन को साझेदारी मानते हैं या अपनी शर्तों पर चलने वाला राजनीतिक समझौता?
यूपी के हापुड़ में आज समाजवादी पार्टी के नेताओं कार्यकर्ताओं ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर जुलूस निकाला.सपाइयों ने ज्ञानेश कुमार का पुतला फूंका...

इस दौरान पुलिस वाले सपा का झंडा थामे खड़े थे.?

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मैडम ने ऑफिस जाने के लिए Rapido बुक की, सफर पूरा किया और जब किराया देने की बारी आई तो कथित तौर पर बिना पैसे दिए जाने लगीं।

ड्राइवर ने जब अपनी मेहनत का पैसा मांगा,तो विवाद शुरू हो गया।
सवाल सीधा है—क्या महिला होने का मतलब यह है कि कोई भी कुछ भी कर सकती है?

एक Rapido ड्राइवर दिनभर मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालता है।उसके लिए ये चंद रुपये नहीं,बल्कि उसके बच्चों की रोटी और घर का खर्च हैं।

बराबरी की बात करने वालों को जिम्मेदारी भी बराबर निभानी चाहिए। किसी के शौक और सुविधा के लिए किसी गरीब की मेहनत की कमाई छीनना बिल्कुल गलत है।

नारी सम्मान अपनी जगह,लेकिन गलत को गलत कहना भी जरूरी है! 

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नेतन्याहू का बड़ा ऐलान 
PM मोदी और कैप्टन स्मित मच्छार को इजराइल के स्वतंत्रता दिवस पर आमंत्रित कर सर्वोच्च सम्मान देने की इच्छा जताई।
दुबई में इलाज करा रहे पूरे विश्व के हीरो स्मित मच्छार ने सिर्फ हम भारतीयों का मान नहीं बढ़ाया है बल्कि देश के सम्मान को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचा दिया है।

आज दुबई के क्राउन प्रिंस शेख हमदान बिन मोहम्मद अल मकतूम ने हॉस्पिटल में पहुंचकर उनसे मुलाकात की और उनका माथा चूम लिया 

सराहना इतनी की कि उनके शब्द कम पड़ गए। हर देश का बड़े से बड़ा नेता उनसे मिल रहा है उनकी तारीफ कर रहा है।
कपिल शर्मा के शो में सुनील ग्रोवर अमरीश पुरी बने हुए हैं,सुनील ग्रोवर अमरीश पुरी जैसे दिख तो रहे ही हैं साथ ही आवाज और एक्टिंग हूबहू अमरीश पुरी जैसी है।

सुनील ग्रोवर की एंट्री अमरीश पुरी के अंदाज में जैसे ही होती है वहां मौजूद सभी लोग देखते ही रह जाते हैं।

यहां तक कि सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया को विश्वास ही नहीं होता है कि ये सुनील ग्रोवर ही हैं।

मुझे लगता है सुनील ग्रोवर को बॉलीवुड में अच्छा मौका नहीं दिया गया नहीं फिर उनके जैसा एक्टर कोई दूसरा न होता।
जबलपुर में पति को दूसरी महिला के साथ होटल के कमरे में कथित आपत्तिजनक हालत में देखकर पत्नी का गुस्सा फूट पड़ा,फिर होटल के अंदर जमकर हंगामा हुआ। 

पत्नी और परिजनों ने विरोध जताया,जिसके बाद मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

 जबलपुर | वीडियो वायरल
संजयन त्रिपाठी का बड़ा ऐलान! सीट जीतकर अखिलेश यादव को देंगे जीत का तोहफा, सियासी गलियारों में मची हलचल! 

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वीडियो क्रेडिट The Red ink
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में एक व्यक्ति आदित्य विज़न के शोरूम के अंदर खड़े होकर कंपनी की सर्विस और सामान को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करता दिखाई दे रहा है।

वीडियो में वह लोगों से अपील करता है कि यहां से एसी और टीवी खरीदने से पहले अच्छी तरह सोच लें। उसका दावा है कि सामान खरीदने के बाद सर्विस के नाम पर ग्राहकों को परेशानी उठानी पड़ सकती है।

सबसे बड़ी बात यह है कि व्यक्ति लोगों को बार-बार सामान नहीं खरीदने की सलाह देता नजर आ रहा है।

अब सवाल यह है कि आखिर ग्राहक अपना खून-पसीने का पैसा खर्च करके सामान खरीदे और जरूरत पड़ने पर उसे सर्विस के लिए भटकना पड़े, तो जिम्मेदारी किसकी होगी?

कंपनी का शोरूम बड़ा होने से ग्राहक का भरोसा नहीं बनता, भरोसा बनता है बिक्री के बाद मिलने वाली सर्विस से।

हालांकि, वायरल वीडियो में लगाए गए आरोपों पर कंपनी का पक्ष भी सामने आना चाहिए।

लेकिन एक बात तय है—ग्राहक को सामान बेचने के साथ उसकी शिकायत सुनना और समाधान करना भी कंपनी की जिम्मेदारी है।

आपका क्या अनुभव रहा है आदित्य विज़न के साथ? क्या खरीदारी के बाद भी ग्राहकों को वैसी ही सर्विस मिलती है, जैसे खरीदते समय वादे किए जाते हैं?

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पूर्वांचल की सियासत में अखिलेश यादव का बड़ा उलटफेर!

डॉ. संजयन त्रिपाठी ने भाजपा को छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है। इतना ही नहीं,अखिलेश यादव  ने उन पर भरोसा जताते हुए MLC का प्रत्याशी भी बना दिया है।

खास बात यह है कि डॉ. संजयन त्रिपाठी पूर्वांचल, खासकर गोरखपुर की राजनीति में एक जाना-पहचाना चेहरा हैं। गोरखपुर, जिसे योगी आदित्यनाथ का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता है, वहां उनकी पहचान सियासी मायने रखती है।

कभी भाजपा के साथ रहे डॉ. त्रिपाठी को अब अखिलेश यादव ने ऐसा मौका दिया है,जब भाजपा में उनकी अनदेखी की चर्चा हो रही थी।

अब देखना दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव का यह भरोसा पूर्वांचल की राजनीति में कितना असर दिखाता है और डॉ. संजयन त्रिपाठी सपा की उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं।

भाजपा ने नजरअंदाज किया,अखिलेश ने भरोसा जताया… अब पूर्वांचल की सियासत में क्या नया समीकरण बनेगा?
सैदपुर गंगा पुल पर खराब हुई मदरसे की बोलेरो, 14 बच्चे थे सवार।

गाड़ी खराब होने के बाद गर्मी से परेशान बच्चों को तिरगांव के रोरी यादव ने पानी और बिस्किट उपलब्ध कराए। सूचना पर 112 की मदद से बच्चों को सुरक्षित पहुंचाया गया।

मदरसे में ₹500 मासिक फीस लिए जाने की बात भी सामने आई है। घटना के बाद बच्चों के सुरक्षित आवागमन और वाहन की देखरेख को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

मामले में मदरसा प्रबंधन का पक्ष और पूरी जानकारी सामने आना जरूरी है।

वीडियो देखिए और अपनी राय दीजिए।

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एक दल से अचानक दूसरे दल में पलटी मारकर टिकट हासिल कर लेना और फिर चुनाव जीत जाना इतना आसान नहीं होता। क्योंकि राजनीति में सिर्फ पार्टी बदलने से जनता का भरोसा ट्रांसफर नहीं होता!

सबसे बड़ी बात यह है कि जिस नेता का टिकट काटकर बाहर से आए हुए नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है,वह भी उसी पार्टी का पुराना कार्यकर्ता होता है। उसके समर्थक, उसकी मेहनत और उसका अपना जनाधार होता है।

ऐसे में नए नेता को सिर्फ विपक्ष से नहीं,बल्कि कई बार अपनी ही पार्टी के नाराज कार्यकर्ताओं और टिकट से वंचित नेताओं के समर्थकों से भी मुकाबला करना पड़ता है।

स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़कर सपा में आए और फाजिलनगर से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।

धर्म सिंह सैनी भाजपा छोड़कर सपा में आए और नकुड़ से चुनाव लड़े,लेकिन हार गए।

अवतार सिंह भड़ाना भाजपा छोड़कर रालोद में गए और जेवर से चुनाव लड़े,लेकिन जीत नहीं पाए।

रोशन लाल वर्मा भाजपा छोड़कर सपा में आए और तिलहर से चुनाव लड़े,लेकिन हार गए।

बृजेश प्रजापति भाजपा छोड़कर सपा में आए और तिंदवारी से चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके।

भगवती प्रसाद सागर भाजपा छोड़कर सपा में आए और घाटमपुर से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।

हरिओम यादव सपा छोड़कर भाजपा में गए और सिरसागंज से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।

शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए और 2019 में पटना साहिब से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।

कीर्ति आजाद भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए और 2019 में धनबाद से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।

ज्योति मिर्धा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं और 2024 में नागौर से चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं।

कृपाशंकर सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए और 2024 में जौनपुर से चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं पाए।

रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए और 2024 में लुधियाना से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।

गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं और 2024 में सिंहभूम से चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं।

प्रणीत कौर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं और 2024 में पटियाला से चुनाव लड़ीं,लेकिन जीत नहीं सकीं।

हालांकि,यह भी सच है कि हर दल-बदलू नेता चुनाव नहीं हारता। लेकिन इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि पार्टी बदलने के बाद पुराने समर्थकों का भरोसा और नए संगठन का साथ मिलना अपने आप में बड़ी चुनौती होती है।

सियासत में टिकट मिलना किसी नेता की व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है,लेकिन जीत सिर्फ टिकट से नहीं मिलती। जिस कार्यकर्ता का टिकट काटकर बाहर से आए नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है, उसकी नाराजगी भी चुनावी समीकरण बदल सकती है।

आखिरकार, चुनाव में नेता का नाम ही नहीं, संगठन की जमीन, कार्यकर्ताओं की मेहनत और जनता का भरोसा भी मायने रखता है।
लगता है इस वीडियो ने एल्गोरिदम की नींद उड़ा दी है! 🔥😂

हर जगह बस यही वीडियो छाया हुआ है। लोग धड़ाधड़ शेयर कर रहे हैं, और अब तो हर कोई अपने फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए इसी वीडियो को पोस्ट कर रहा है।

ये वीडियो पहले मेरे ही चैनल से वायरल हुआ था,जहां इसने 5 MILLION VIEWS का आंकड़ा पार किया था।

अब वही वीडियो दोबारा ट्रेंड में है और हर तरफ इसकी धूम मची है।
जिसे फॉलोअर्स बढ़ाने हैं,वो भी यही वीडियो डाल रहा है!

भाई, कंटेंट हमारा वायरल होने का फायदा सब उठा रहे हैं! 😎
फिर मत कहिएगा कि बताया नहीं था! 😂

अभी तो दो तीन अकाउंट्स के ss हैं हजारो id से यह वीडियो पोस्ट हो चुका है और सबके फालोअर बढ़ रहे हैं आप भी बढ़ा सकते हैं इस वीडियो को अपलोड करते ही वायरल ......

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भाई का कॉन्फिडेंस देखिए! सेल्फी लेने आए थे या गाल पकड़ने का सपना पूरा करने?

कन्नड़ अभिनेत्री रचिता एक इवेंट में थीं! एक फैन सेल्फी लेने पहुंचा, लेकिन सेल्फी के बाद उसने सीधे अभिनेत्री का गाल पकड़ लिया!

भाई,फैन होना अच्छी बात है,लेकिन किसी की मर्जी के बिना उसे छूना कौन-सी फैनगिरी है? 

हैरानी की बात ये है कि रचिता ने भी इस असहज स्थिति को काफी सहजता से संभाला। सेल्फी तक ठीक था भाई,आगे बढ़ने की परमिशन किसने दी? 

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एक पिता को अपने ही बेटे की पहचान साबित करने के लिए महीनों संघर्ष करना पड़ा!

उत्तर प्रदेश के बलिया के अखिलेश मिश्रा का 12 वर्षीय बेटा रजत 13 मई 2025 को लापता हो गया था। दो दिन बाद घाघरा नदी किनारे मिले एक अज्ञात शव को पिता ने अपने बेटे का बताया, लेकिन पुलिस ने उसे रजत का मानने से इनकार कर दिया और लावारिस मानकर अंतिम संस्कार कर दिया।

पिता ने हार नहीं मानी। महीनों तक अधिकारियों के चक्कर काटे और DNA जांच की मांग करते रहे। आखिरकार DNA रिपोर्ट में शव की पहचान रजत के रूप में होने की बात सामने आई।

अब एक बेबस पिता ने बेटे के कपड़ों से पुतला बनाकर उसका अंतिम संस्कार किया और अंतिम विदाई दी। सोचिए,जिस पिता ने अपने बेटे को खोया,उसे उसकी पहचान साबित करने के लिए भी महीनों संघर्ष करना पड़ा।

सबसे बड़ा सवाल—जब परिवार शुरुआत से पहचान का दावा कर रहा था, तो आखिर जांच में इतनी देर क्यों हुई? इस पूरे मामले में जिम्मेदारी किसकी है?

एक पिता को अब सिर्फ बेटे का दुख नहीं, बल्कि जवाब का भी इंतजार है।

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ये भिखारीस्तानी हमारे सामने हमेशा बुरी तरह हारते हैं,इनका रिकॉर्ड इतना गंदा है कि इन्हें शर्म आनी चाहिए लेकिन ये इतने बेशर्म और ढीठ हैं कि इन्हें शर्म नहीं आती।

आज के मैच में वैभव सूर्यवंशी को आउट करने के बाद भिखरिस्तानी का Saim Ayub बच्चा झुलाने वाला घटिया सेलिब्रेशन करता नजर आया😡

बाप के सामने खड़े होने की औकात नहीं है और चले हैं हमारे 15 साल के बच्चे को चिढ़ाने।😀

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आराधना मिश्रा के नाम से वायरल इस बयान में दावा किया जा रहा है कि भारत माता की जय के नारे लगाने वालों पर कार्रवाई की जाएगी और कांग्रेस की जय के नारे लगाने को कहा गया।

सवाल है कि जिस पार्टी के लिए देशभक्ति के नारे भी अनुशासन का मुद्दा बन जाएं, उसकी सोच पर सवाल उठना लाजिमी है।

भारत माता किसी एक पार्टी, परिवार या संगठन की जागीर नहीं है। देश सबसे ऊपर है, राजनीति उसके बाद! भारत माता की जय बोलना अपराध नहीं, करोड़ों भारतीयों की भावना है।

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वायरल वीडियो में एक व्यक्ति अपनी TV तोड़ते हुए दुकानदार के खिलाफ शिकायत करता नजर आ रहा है।

ग्राहक और दुकानदार का रिश्ता भरोसे पर चलता है। लेकिन जब यही भरोसा टूटता है,तो सवाल दोनों तरफ उठते हैं।

आदित्य विज़न की ओर से कोई आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है,इसलिए किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

लेकिन एक बात सोचने वाली है अगर किसी ग्राहक को अपनी शिकायत के समाधान के बजाय निराशा हाथ लगे,तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? 

और अगर ग्राहक गुस्से में आकर नुकसान करने लगे,तो क्या उसे सही ठहराया जा सकता है?

आखिर गलती की शुरुआत कहां से हुई और जिम्मेदारी किसकी बनती है? फैसला तथ्यों के आधार पर होना चाहिए,भावनाओं के आधार पर नहीं।

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Facebook ज्यादा पैसा देता है या YouTube? 💰🔥

आज दोनों प्लेटफॉर्म की कमाई का फर्क समझ लीजिए!

सबसे पहले बात करते हैं Facebook की।

👉 Facebook पर 1 लाख Long Video Views आने पर लगभग ₹40 से ₹45 मिलते हैं। कभी इससे थोड़ा ज्यादा तो कभी कम।

👉 वहीं Facebook Reels पर 1 लाख Views के बदले सिर्फ ₹10 से ₹15 तक की कमाई होती है।

अब आइए YouTube की कमाई पर! 👇

👉 YouTube पर 1 लाख Long Video Views आने पर लगभग $10 से $15 यानी भारतीय रुपये में करीब ₹850 से ₹1,300 तक मिल सकते हैं। कभी-कभी इससे ज्यादा भी।

👉 वहीं YouTube Shorts पर 1 लाख Views के बदले लगभग ₹80 से ₹85 मिलते हैं। कभी $1 यानी करीब ₹85, तो कभी ₹60–₹70 भी।

अब आप खुद हिसाब लगाइए! 🤔

एक तरफ Facebook की कमाई और दूसरी तरफ YouTube की कमाई!

लेकिन सवाल सिर्फ Views का नहीं, बल्कि Revenue का है।

आपके हिसाब से Content Creator के लिए कौन-सा प्लेटफॉर्म ज्यादा फायदेमंद है—Facebook या YouTube?

अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए! 🔥

ये मेरे खुद के SS हैं मेरा मानना है नाम फ्रेम जल्दी फेमस होना है तो फेसबुक पर काम कीजिए ज्यादा कमाई चाहिए तो यूट्यूब पर काम कीजिए 

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ये भिखारीस्तानी खिलाड़ी भी ना, अपनी जाहिलियत दिखाने से पीछे नहीं हटते..😀

देखिए, वैभव सूर्यवंशी को आउट करके कैसे जश्न मना रहे हैं अयूब साहब! लेकिन बेटा, जिस बच्चे को आउट करके इतना उछल रहे हो, वही बच्चा तुम्हारी गेंदों पर छक्के बरसा रहा था! 🔥

बेटा अयूब, जश्न थोड़ा संभलकर मनाना… मैदान में दोबारा वैभव से मुलाकात हो गई ना, तो ये जश्न याद रह जाएगा!

अगली भिड़ंत का इंतजार रहेगा! 

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