समय पर रोपाई से बढ़ेगी पैदावार, डिंडोरी में धान रोपाई ने पकड़ी रफ्तार
जैविक कृषि विशेषज्ञ बिहारी लाल साहू बोले— 14 से 21 दिन की नर्सरी में करें रोपाई, मिलेगा बेहतर उत्पादन
डिंडोरी मानसून की सक्रियता के साथ मध्यप्रदेश के जनजातीय बाहुल्य जिले डिंडोरी में खरीफ सीजन ने रफ्तार पकड़ ली है। बारिश के बाद जिले के गांवों में खेतों की रौनक लौट आई है और किसान धान की नर्सरी से पौधों की रोपाई में जुट गए हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस वर्ष शुरुआती बारिश में देरी हुई है, इसलिए समय पर रोपाई कर फसल की उत्पादकता बनाए रखना किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
इसी बीच भारतीय किसान संघ डिंडोरी के जिलाध्यक्ष, प्रगतिशील किसान एवं जैविक कृषि विशेषज्ञ बिहारी लाल साहू ने अपने खेत में पूरी तरह जैविक पद्धति से धान की रोपाई शुरू कर किसानों के लिए उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने बताया कि देशी धान की किस्म "तुलसी अमृत" के बीजों का बीजामृत से उपचार कर 13 जून को नर्सरी तैयार की गई थी। लगभग 21 दिन बाद तैयार पौधों की रोपाई 3 जुलाई से प्रारंभ कर दी गई है।
श्री साहू ने बताया कि खेत की मताई के बाद केंचुआ खाद का उपयोग किया गया है तथा रोपाई के लगभग 10 दिन बाद जीवामृत का छिड़काव किया जाएगा। उनके अनुसार जैविक विधि अपनाने से उकठा जैसे रोगों से बचाव होता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि धान की रोपाई 14 से 21 दिन की नर्सरी अवस्था में ही पूरी कर लें। इस अवधि में रोपाई करने से पौधों के शत-प्रतिशत जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है, जड़ें तेजी से विकसित होती हैं और फसल अधिक मजबूत बनती है।
बिहारी लाल साहू ने किसानों को सलाह दी कि ट्रैक्टर की प्रतीक्षा में खेती में अनावश्यक विलंब न करें। आवश्यकता पड़ने पर बैल, पावर वीडर अथवा अन्य उपलब्ध कृषि यंत्रों का उपयोग कर समय पर जुताई और रोपाई पूरी करें। उनका कहना है कि खरीफ फसल में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है और थोड़ी सी देरी भी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
उन्होंने यह भी बताया कि वे पिछले कई वर्षों से गोबर गैस स्लरी, केंचुआ खाद और जीवामृत के उपयोग से सफल जैविक खेती कर रहे हैं। इससे खेती की लागत कम होती है, भूमि की सेहत सुधरती है और किसानों को टिकाऊ कृषि की दिशा में बेहतर परिणाम मिलते हैं।
कृषि विभाग के अधिकारियों ने भी किसानों से अपील की है कि कम वर्षा की स्थिति को देखते हुए खेतों में उपलब्ध नमी का अधिकतम उपयोग करें तथा धान की रोपाई समय पर पूर्ण कर खरीफ उत्पादन को सुरक्षित बनाएं।
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