*तिरपाल से पक्के आशियाने तक भोली देवी के सपनों का घर हुआ साकार।*
भीलवाड़ा/आकोला: (रमेश चन्द डाड) Oमंशा ग्राम पंचायत के भीलों का झोपड़ा गांव की विधवा महिला भोली देवी भील और उसके दो मासूम बच्चों के जीवन में आखिरकार खुशियों की नई सुबह आ गई। कभी बारिश, धूप और ठंड के बीच एक पतली तिरपाल के नीचे जीवन गुजारने को मजबूर यह परिवार अब अपने पक्के मकान में रहने लगा है। सामाजिक सरोकार, जनसहयोग और सकारात्मक पत्रकारिता की बदौलत भोली देवी का वर्षों का संघर्ष आखिरकार रंग लाया।
प्रमुख अख़बार की खबर "न छत, न साया, तिरपाल के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर विधवा महिला, 2 मासूम बच्चे भी बेहाल" शीर्षक से खबर प्रकाशित कर भोली देवी और उसके बच्चों की पीड़ा को प्रमुखता से उठाया था। खबर सामने आने के बाद प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, भामाशाहों और ग्रामीणों ने इस परिवार की मदद के लिए हाथ बढ़ाए।
भोली देवी के पति प्रभु भील की करीब तीन वर्ष पूर्व सिलिकोसिस बीमारी से मौत हो गई थी। पति के निधन के बाद परिवार के सामने आजीविका और आश्रय का संकट खड़ा हो गया। न घर था, न जमीन और न ही कोई स्थायी आय का साधन। ऐसे हालात में भोली देवी अपने पुत्र दुर्गेश (12) और मुकेश (11) के साथ तिरपाल के नीचे जीवन यापन करने को मजबूर थी।
खबर प्रकाशित होने के बाद कोटड़ी प्रधान करण सिंह बेलवा स्वयं गांव पहुंचे और परिवार की स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने सरकारी योजनाओं से जोड़ने के साथ ही जनसहयोग से मकान निर्माण कराने की घोषणा की व समाजसेवियों और ग्रामीणों को जोड़ा गया। किसी ने सीमेंट दी, किसी ने बजरी, पत्थर और ईंटों का सहयोग किया तो कई लोगों ने आर्थिक सहायता प्रदान की। जनसहयोग से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे एक मिसाल बन गया और कुछ ही समय में भोली देवी का मकान बनकर तैयार हो गया।
मकान निर्माण पूर्ण होने के बाद बुधवार को भामाशाहों एवं ग्रामीणों की उपस्थिति में नव निर्मित मकान का विधिवत शुभारंभ किया गया। पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच फीता काटकर मकान का लोकार्पण किया गया तथा विधवा महिला भोली देवी और उसके दोनों मासूम बच्चों का नए घर में गृह प्रवेश कराया गया। वर्षों बाद अपने सिर पर पक्की छत मिलने से भोली देवी की आंखें नम हो गईं और मौजूद लोगों ने भी इस भावुक पल को महसूस किया।
इस अवसर पर समाजसेवी दिनेश पारीक, नारायण भदाला, कैलाश जाट, राम वैष्णव, सद्दाम मंसूरी, विजय चौधरी, काना जाट, रत्न तेली, जगदीश तेली, देवराज जाट, पंडित लोकेश कुमार, रामलाल पांडे, पुष्पेंद्र शर्मा, नारायण गोस्वामी तथा शिवांश पुरोहित सहित अनेक ग्रामीण मौजूद रहे।
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का उदाहरण बन गया कि जब पत्रकारिता समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की आवाज बनती है, तो प्रशासन, जनप्रतिनिधि और समाज मिलकर किसी की जिंदगी बदल सकते हैं। तिरपाल के नीचे जीवन गुजारने वाली भोली देवी और उसके बच्चों को आज पक्की छत मिल चुकी है, जो जनसहयोग, संवेदनशीलता और मानवता की एक प्रेरणादायक मिसाल है।
भामाशाहों, ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के सहयोग से साकार हुआ सपना, वर्षों बाद विधवा महिला और उसके बच्चों को मिली अपने घर की खुशी