मनुष्य जीवन: मुक्ति का अवसर या कर्मों का बंधन?
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मनुष्य जीवन को अत्यंत दुर्लभ और ईश्वर की अनमोल देन माना गया है। मान्यता है कि जीवात्मा अनेक योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म प्राप्त करती है। यह जन्म केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं को पाने के लिए नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, सद्कर्म, सत्य, सेवा और अंततः परमात्मा की ओर लौटने का अवसर है।
गौ को भी भारतीय परंपरा में अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना गया है। लोकमान्यताओं में गौ के प्रति श्रद्धा को पवित्रता और सेवा से जोड़ा गया है। इसी आध्यात्मिक दृष्टि से कहा जाता है कि जीवात्मा विभिन्न अवस्थाओं से गुजरते हुए अंततः मनुष्य जीवन तक पहुंचती है। जैसे गंगा स्नान को भारतीय परंपरा में आत्मशुद्धि का प्रतीक माना गया है, वैसे ही गौ के प्रति श्रद्धा और सेवा को भी पवित्र भावनाओं से जोड़ा गया है।
लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस मनुष्य जीवन को मुक्ति का अवसर माना गया है, क्या आज का मनुष्य वास्तव में उस मार्ग पर चल रहा है?
मनुष्य के पास विवेक है, उसे सही और गलत में अंतर समझने की क्षमता मिली है। वह अपने कर्मों पर विचार कर सकता है, अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकता है और स्वयं को बदल सकता है। फिर भी आज अनेक लोग दूसरों को नीचा दिखाने, किसी का अधिकार छीनने, छल-कपट करने, झूठ बोलने और स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण करने में अपना जीवन लगा देते हैं।
धन और संपत्ति के पीछे भागते-भागते मनुष्य यह भूल जाता है कि जिस संपत्ति के लिए वह किसी दूसरे का हक मार रहा है, वह संपत्ति उसके साथ नहीं जाएगी; लेकिन उसके कर्मों का प्रभाव उसके जीवन और उसके आसपास के लोगों पर अवश्य पड़ेगा।
सबसे दुखद स्थिति तब होती है जब कोई व्यक्ति अपनी गलत प्रवृत्तियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने लगता है। संतान को संस्कार, सत्य, परिश्रम और मानवता सिखाने के बजाय यदि उसे छल, अहंकार, स्वार्थ और दूसरों का अधिकार छीनने की शिक्षा दी जाए, तो वह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के भविष्य का नुकसान है।
वास्तविक धर्म केवल पूजा-पाठ, मंदिर जाने या धार्मिक शब्द बोलने का नाम नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप मन, कर्म और वचन की शुद्धता में दिखाई देता है।
यदि मन में किसी के प्रति निरंतर द्वेष है, कर्मों में बेईमानी है और वाणी में झूठ है, तो केवल बाहरी धार्मिकता मनुष्य को भीतर से पवित्र नहीं कर सकती। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए बड़े-बड़े दिखावे से अधिक आवश्यक है कि मनुष्य अपने व्यवहार को देखे और स्वयं से पूछे—
क्या मैंने किसी का हक तो नहीं छीना?
क्या मेरे कारण किसी निर्दोष को पीड़ा तो नहीं मिली?
क्या मेरी वाणी से किसी का मन तो नहीं टूटा?
क्या मेरे कर्म मेरी पूजा से मेल खाते हैं?
मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी साधना यही है कि हम अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध, छल और स्वार्थ को पहचानें और धीरे-धीरे उनसे ऊपर उठने का प्रयास करें।
मुक्ति किसी एक दिन अचानक प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीवनभर के शुद्ध विचारों, अच्छे कर्मों और सच्चे आचरण की दिशा है। जो मनुष्य दूसरों के अधिकार का सम्मान करता है, कमजोर की सहायता करता है, माता-पिता का सम्मान करता है, संतान को अच्छे संस्कार देता है, सत्य का साथ देता है और अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करता है—वही वास्तव में उस आध्यात्मिक यात्रा पर आगे बढ़ता है।
इसलिए मनुष्य को अपने जीवन का मूल्य समझना चाहिए। हम यहां केवल धन कमाने, दूसरों से आगे निकलने या अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने नहीं आए हैं। यह जीवन स्वयं को बेहतर बनाने, दूसरों के जीवन में प्रकाश भरने और अपने कर्मों को निर्मल करने का अवसर भी है।
अंततः सवाल यह नहीं कि हम कितनी बार मंदिर गए, कितनी पूजा की या कितने धार्मिक शब्द बोले। असली सवाल यह है कि हमारे कारण कितने लोगों के जीवन में सुख आया और हमारे कर्मों से कितने लोगों को पीड़ा मिली।
क्योंकि यदि मनुष्य मन, कर्म और वचन से शुद्ध होने की यात्रा पर ही नहीं चला, तो मुक्ति की मंजिल की बात करना केवल कल्पना बनकर रह जाएगी।
मनुष्य जन्म अवसर है—अधिकार नहीं।
सद्कर्म उसका मार्ग है—दिखावा नहीं।
और आत्मशुद्धि ही वह यात्रा है, जो मनुष्य को परमात्मा के निकट ले जाने का सामर्थ्य रखती है Sharad Srivastava Ranjeet Bahadur Manoj Kumar Srivastav Harihar Kumar Srivastava Shyam Kumar Srivastava Chandan Ramayani #viralreelsfacebook