भगवान श्रीचंद्र जयंती 18 से 20 सितंबर तक चंबा में, देश-विदेश से पहुंचेंगे संत-महंत व श्रद्धालु
श्री श्रीचंद्र शिला मंदिर चौगान मोहल्ला में होगा तीन दिवसीय धार्मिक आयोजन
सुरेंद्र ठाकुर
चंबा 03 सितम्बर
प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी 18 से 20 सितंबर 2026 तक उदासीनाचार्य श्री श्रीचंद्र शिला मंदिर, चौगान मोहल्ला चंबा में उदासीन संप्रदाय के आचार्य भगवान श्रीचंद्र जी की जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी।
श्रीचंद्र भगवान के प्रकटोत्सव के अवसर पर देश-विदेश से संत-महंतों सहित हजारों श्रद्धालुओं के चंबा पहुंचने की संभावना है। इस दौरान भजन-कीर्तन, अखंड रामायण पाठ तथा भंडारे का आयोजन किया जाएगा। वहीं, पवित्र श्री मणिमहेश यात्रा में आने वाले श्रद्धालु भी इस धार्मिक आयोजन में शामिल होते हैं।
भगवान श्रीचंद्र जी का चंबा से जुड़ा है धार्मिक इतिहास
आयोजकों के अनुसार भगवान श्रीचंद्र जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष में सुल्तानपुर लोधी, जिला कपूरथला, पंजाब में हुआ था। वे श्री गुरु नानक देव जी और माता सुलक्खनी के ज्येष्ठ पुत्र माने जाते हैं। उदासीन परंपरा में उन्हें शिव स्वरूप माना जाता है।
मान्यता के अनुसार भगवान श्रीचंद्र जी ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर जनमानस को आध्यात्मिक एवं धार्मिक संदेश दिया। उन्होंने पठानकोट के निकट बारठ साहिब में लंबे समय तक तपस्या की। पंजाब के टाहली साहिब, गुरदासपुर और नानक चक्क सहित अनेक स्थानों से भी उनकी धार्मिक परंपरा जुड़ी हुई बताई जाती है।
चट्टान पर बैठकर रावी पार करने की मान्यता
भगवान श्रीचंद्र जी के चंबा आगमन को लेकर धार्मिक मान्यता है कि वे भाई कमलिया के साथ पठानकोट क्षेत्र से होते हुए चंबा पहुंचे थे। उस समय चंबा में राजा पृथ्वी सिंह का शासन था।
मान्यता के अनुसार जब रावी नदी पार करने के लिए नाविक ने राजा की अनुमति न होने का हवाला देते हुए उन्हें नदी पार करवाने से इनकार कर दिया, तो भगवान श्रीचंद्र जी नदी किनारे एक शिला पर बैठ गए। इसके बाद उन्होंने शिला को रावी पार करवाने का आदेश दिया और वह शिला तैरते हुए उन्हें चंबा की ओर ले गई।
कहा जाता है कि भगवान श्रीचंद्र जी ने इसी शिला के माध्यम से चंबा नगर का भ्रमण किया। इस अद्भुत घटना को देखकर चंबा के लोग आश्चर्यचकित रह गए। बाद में राजा पृथ्वी सिंह ने उनके चरणों में पहुंचकर क्षमा मांगी और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
राजा पृथ्वी सिंह को दिया दो पुत्रों का आशीर्वाद
धार्मिक मान्यता के अनुसार राजा पृथ्वी सिंह ने भगवान श्रीचंद्र जी से पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मांगा। बाबा जी ने राजा को एक नहीं बल्कि दो पुत्र होने का आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद राजा के दो पुत्र हुए।
बताया जाता है कि इसके बाद राजा ने भगवान श्रीचंद्र जी के धूने के लिए भूमि समर्पित की और मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर में भगवान श्रीचंद्र जी से जुड़ी शिला, चिमटा, झोली और खड़ाऊं आज भी श्रद्धा का केंद्र हैं।
5 मई 1998 को मंदिर में भगवान श्रीचंद्र जी की सुंदर प्रतिमा स्थापित की गई।
मणिमहेश की ओर प्रस्थान से जुड़ी मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीचंद्र जी लगभग 150 वर्ष की आयु में भरमौर से आगे मणिमहेश की पहाड़ियों की ओर गए। इस यात्रा में राजा और संगत भी उनके साथ चली। कुछ दूरी के बाद बाबा जी ने राजा और संगत को वापस लौटने के लिए कहा और स्वयं मणिमहेश कैलाश पर्वत की ओर प्रस्थान किया।
मान्यता है कि उन्होंने श्रद्धालुओं को वचन दिया कि जो भी व्यक्ति उन्हें श्रद्धा और प्रेम से याद करेगा, वे उसके कल्याण के लिए सदैव उपस्थित रहेंगे। इसके बाद वे अंतर्ध्यान हो गए।
20 सितंबर को श्रद्धालुओं से पहुंचने का आग्रह
श्रीचंद्र शिला मंदिर ट्रस्ट ने चंबा की प्रबुद्ध जनता से आग्रह किया है कि 20 सितंबर को अधिक से अधिक संख्या में मंदिर पहुंचकर भगवान श्रीचंद्र जी का आशीर्वाद प्राप्त करें।
ट्रस्ट के अनुसार देश-विदेश से श्रद्धालु इस प्रकटोत्सव में शामिल होने के लिए चंबा पहुंच रहे हैं। आयोजन को सफल बनाने में सहयोग के लिए ट्रस्ट ने स्थानीय विधायक, प्रशासन, नगर परिषद तथा प्रेस बंधुओं का आभार व्यक्त किया है।
Chamba, Chamba | Sep 3, 2026