आईटीबीपी-एनडीएमए के इंटीग्रेटेड सिम्पोजियम का भव्य शुभारंभ
हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों, तैयारियों और प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र पर विशेषज्ञों ने किया मंथन
पंचकूला, 17 सितंबर। हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों, तैयारियों और प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से आईटीबीपी, एनआईटीएसआरडीआर तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘इंटीग्रेटेड सिम्पोजियम ऑन डिजास्टर मैनेजमेंट’ का गुरुवार को भव्य शुभारंभ हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ पंजाब के राज्यपाल एवं यूटी चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम में एनडीएमए के सदस्य एवं एचओडी कृष्ण एस. वत्स बतौर गेस्ट ऑफ ऑनर मौजूद रहे।
कार्यक्रम का आयोजन आईटीबीपी वेस्टर्न कमांड के आईजी राजेश कुमार के नेतृत्व में किया गया। सर्वप्रथम एनआईटीएसआरडीआर के डीआईजी युद्धवीर सिंह राणा ने मुख्य अतिथि गुलाब चंद कटारिया का स्वागत किया।
सिम्पोजियम के दौरान राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीतियों, नई तकनीक एवं वैज्ञानिक सहयोग, पूर्व चेतावनी एवं पूर्वानुमान प्रणाली, राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की आपदा प्रबंधन व्यवस्था तथा पर्वतीय एवं ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आपदा से निपटने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा हुई।
कार्यक्रम में आईएमडी, सीडब्ल्यूसी, डीआरडीओ/डीजीआरई, एनसीएस, आईआईटी रोपड़, डब्ल्यूआईएचजी, डीजीडीई, बीबीएमबी और आईटीबीपी सहित विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
पहले दिन विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय आपदा जोखिम प्रोफाइल, आपदा प्रबंधन नीति और आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जुड़े विषयों पर जानकारी साझा की। विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में आपदा प्रबंधन व्यवस्था अब केवल राहत एवं प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर पूर्व तैयारी, जोखिम आकलन और जोखिम न्यूनीकरण पर अधिक जोर देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सेंडाई फ्रेमवर्क के तहत आपदा जोखिम न्यूनीकरण की चार प्राथमिकताओं तथा सतत विकास लक्ष्यों के साथ आपदा जोखिम न्यूनीकरण के समन्वय पर भी चर्चा हुई।
एनडीएमए, एनडीआरएफ, सीएपीएफ, गृह मंत्रालय, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और अन्य एजेंसियों के बीच प्रभावी समन्वय को आपदा के समय बेहतर प्रतिक्रिया के लिए महत्वपूर्ण बताया गया।
इंटीग्रेटेड कंट्रोल रूम फॉर इमरजेंसी रिस्पॉन्स (आईसीआर-ईआर) की कार्यप्रणाली पर भी प्रकाश डाला गया। बताया गया कि इसके माध्यम से वास्तविक समय में चेतावनियां प्राप्त करने, राहत एवं बचाव कार्यों की निगरानी तथा घटनाओं की रिपोर्टिंग को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
इसके अलावा एनडीईएम 5.0 पोर्टल के माध्यम से आपदा की वर्तमान स्थिति, प्रारंभिक चेतावनी और ऐतिहासिक आंकड़ों के उपयोग की जानकारी भी साझा की गई।
आपदा के दौरान त्वरित और मानकीकृत सूचना उपलब्ध कराने के लिए एसओपी, इंसिडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम तथा कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल को और मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
तकनीक के माध्यम से क्षेत्रीय एवं स्थानीय भाषाओं में ऑटो जियो-टार्गेटेड अलर्ट भेजने की व्यवस्था को प्रभावी चेतावनी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया।
साथ ही ‘आपदा मित्र’ योजना के विस्तार और समुदाय आधारित आपदा तैयारी को मजबूत करने पर भी विशेष जोर दिया गया। एनडीएमए द्वारा आयोजित मॉक एक्सरसाइज, मेगा मॉक अभ्यास तथा अंतरराज्यीय एवं अंतरराष्ट्रीय संयुक्त अभ्यासों के माध्यम से आपदा प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई।
सिम्पोजियम में अत्यधिक भारी वर्षा, एक के बाद एक होने वाली आपदाओं, राजमार्ग दुर्घटनाओं तथा ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) जैसी उभरती चुनौतियों पर भी चर्चा हुई।
सिक्किम और ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट जैसी घटनाओं से प्राप्त अनुभवों को साझा करते हुए भविष्य में आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने पर विचार-विमर्श किया गया।
विशेषज्ञों ने आपदा प्रबंधन में खंडित एजेंडा, सीमा-पार प्रभाव और मानकीकृत प्रबंधन जैसी चुनौतियों को रेखांकित किया। विभिन्न विभागों एवं एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय के लिए ‘होल ऑफ गवर्नमेंट’ दृष्टिकोण अपनाने पर भी बल दिया गया।
अपने संबोधन में पंजाब के राज्यपाल एवं यूटी चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि संगोष्ठी से प्राप्त अनुभवों और निष्कर्षों का आईटीबीपी, एनआईटीएसआरडीआर और एनडीएमए को आपसी समन्वय से उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इन अनुभवों के आधार पर आने वाले समय में बेहतर आपदा प्रबंधन की रूपरेखा तैयार करने और नई रणनीतियों को प्रभावी रूप से लागू करने की आवश्यकता है। उन्होंने आपदाओं के दौरान जनहानि को न्यूनतम करने के लिए हरसंभव प्रयास करने तथा अधिक से अधिक जनसहभागिता सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
दो दिवसीय सिम्पोजियम के आगामी सत्रों में आपदा प्रबंधन से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार और अनुभव साझा करेंगे। आयोजन का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की क्षमता को अधिक प्रभावी, आधुनिक और समन्वित बनाना है।