बाबा केदार की धरती पर भी नहीं रुका प्लास्टिक का कहर! 14,200 फीट की ऊंचाई पर वासुकी ताल में कचरे का अंबार, आखिर कब जागेगा प्रशासन?
8 से 10 किलोमीटर की कठिन पैदल दूरी तय कर पहुंच रहे पर्यटक बिगाड़ रहे हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता; जागरूक युवक दुर्गा प्रसाद देवशाली ने खुद संभाली सफाई की जिम्मेदारी, केदारनाथ वन प्रभाग से ठोस कार्रवाई की मांग।
रुद्रप्रयाग। हिमालय की गोद में स्थित पवित्र वासुकी ताल की प्राकृतिक सुंदरता पर पर्यटकों की लापरवाही भारी पड़ने लगी है। समुद्र तल से करीब 4,135 मीटर (14,200 फीट) की ऊंचाई पर स्थित वासुकी ताल में भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा छोड़े जाने का मामला सामने आया है। केदारनाथ धाम से लगभग 8 से 10 किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित इस खूबसूरत प्राकृतिक स्थल को कुछ पर्यटक और सैलानी अपनी लापरवाही से प्रदूषित कर रहे हैं। जिस हिमालयी धरोहर को देखने के लिए लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय कर यहां पहुंचते हैं, उसी की स्वच्छता और सुंदरता को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
इस गंभीर स्थिति के बीच स्थानीय जागरूक युवक दुर्गा प्रसाद देवशाली ने सराहनीय पहल करते हुए स्वयं वासुकी ताल पहुंचकर वहां फैले प्लास्टिक कचरे की सफाई की। उन्होंने पर्यटकों द्वारा छोड़े गए कचरे को एकत्रित कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि हिमालय केवल घूमने-फिरने की जगह नहीं, बल्कि हमारी प्राकृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर है।
दुर्गा प्रसाद देवशाली ने पर्यटकों से अपील की कि वासुकी ताल की यात्रा पर आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अपने साथ लाया गया प्लास्टिक, बोतल, खाद्य पदार्थों के पैकेट और अन्य कचरा वापस लेकर जाएं। प्रकृति को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी केवल सरकार और प्रशासन की नहीं, बल्कि प्रत्येक पर्यटक की भी है।
उन्होंने वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा की भयावह त्रासदी को याद करते हुए कहा कि हिमालय की संवेदनशीलता को किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रकृति के साथ खिलवाड़ और पर्यावरण की अनदेखी के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन के साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
देवशाली ने इस मामले में केदारनाथ वन प्रभाग से भी ठोस कार्रवाई करने की मांग उठाई है। उन्होंने वासुकी ताल क्षेत्र में नियमित निगरानी, कचरा वापस लाने की व्यवस्था, प्लास्टिक प्रतिबंध का प्रभावी पालन और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई।
सवाल यह है कि आखिर 14,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित हिमालय की इस अनमोल धरोहर को प्लास्टिक के ढेर में तब्दील होने से कौन बचाएगा? अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में वासुकी ताल की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान पहुंच सकता है।
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