श्रीनाथजी में पवित्रा एकादशी उत्सव, प्रभु को धराए गए 360 तारों के रेशमी पवित्रा ।
पुष्टिमार्गीया प्रधान पीठ नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी की हवेली में सोमवार, श्रावण शुक्ल द्वादशी के पावन अवसर पर पवित्रा एकादशी का पावन उत्सव अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया गया।
इस अवसर पर प्रभु श्रीनाथजी को प्रातः श्रृंगार के दर्शनों में 360 तारों के सूत के विशेष पवित्रा, सादे व फोंदनेदार रेशमी पवित्रा तथा सुनहरी-रुपहली तारों से निर्मित विविध सुंदर पवित्रा धराए गए। इस दौरान पूरे मंदिर परिसर में उत्सव का माहौल रहा।
उत्सव के भाव से प्रातःकाल मंदिर के सभी मुख्य द्वारों की देहरी को हल्दी से लीपा गया तथा आशापाल व सूत की डोरी की वंदनमाल बांधी गई। दिनभर झारीजी में यमुनाजल भरा गया एवं चारों समां आरती थाली में उतारी गई। मंगला दर्शन के पश्चात प्रभु को चंदन, आंवला और सुगंधित तेल फुलेल से अभ्यंग कराया गया। प्रभु को सफेद मलमल का केसरिया कोर का पिछोड़ा एवं मस्तक पर तीन मोरपंख की चंद्रिका की जोड़ से सुसज्जित श्वेत कुल्हे का श्रृंगार धराया गया।
पवित्रा धराए जाने के उपरांत प्रभु को उत्सव का विशेष भोग आरोगाया गया। गोपीवल्लभ भोग में मनमनोहर (केसर-इलायची बूंदी), मेवाबाटी, केसर युक्त बासोंदी तथा मावे के पेड़ा-बरफी अर्पित किए गए। आज के दिन विशेष रूप से सभी सात गृहों से पधारी मिश्री भी प्रभु को आरोगाई गई। राजभोग में दाख का रायता और मीठी सेव का भोग लगा।
आज ही के दिन विक्रम संवत 2023 (वर्ष 1966) में नित्यलीलास्थ गोस्वामी तिलकायत श्री गोविंदलालजी महाराज ने सात स्वरूपों को पधराकर पवित्रा धराए थे। मंदिर में आज इस ऐतिहासिक उत्सव को भी स्मृत कर हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
पुष्टिप्रभु के चरणों में पवित्रा समर्पण: श्री विशाल बावा ।
युवाचार्य गोस्वामी 105 श्री विशाल बावा साहब ने समस्त पुष्टि सृष्टि को पवित्र एकादशी की बधाई व आशीर्वाद देते हुए इस उत्सव के भाव को विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि श्री गोपीनाथप्रभुचरण के अनुसार पवित्रा वैष्णवों द्वारा वर्षभर की गई मानसी सेवा का प्रतीक है। 360 सूत के तार वर्ष के 360 दिनों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो प्रभु की पूर्ण कृपा और सेवाफल प्रदान करते हैं।
शास्त्रों में पवित्रा बनाने के अनेक विधान और मत बताए गए हैं। 360 तारों का पवित्रा उत्तम, 270 तारों का मध्यम और 180 तारों का कनिष्ठ माना गया है। इसी प्रकार कुछ आचार्यों के अनुसार इसमें लगाई जाने वाली ग्रंथियाँ (गाँठें) क्रम से 24 (उत्तम), 12 (मध्यम) और 8 (कनिष्ठ)