जीवन में पहली बार मां सुरकंडा के चरणों में नमन करने का अवसर मिला
पहली बार परिवार के साथ मां सुरकंडा के दरबार में… आस्था, संस्कार और देवभूमि की संस्कृति से जुड़ा एक यादगार सफर
आज अष्टमी के पावन अवसर पर परिवार के साथ टिहरी गढ़वाल के कद्दूखाल स्थित मां सुरकंडा देवी के दिव्य एवं भव्य दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मां के चरणों में शीश नवाया, अपने परिवार की सुख-समृद्धि, शुभचिंतकों की खुशहाली, जीवन में उन्नति और विकास की कामना की। मां से प्रार्थना की कि जीवन में सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की शक्ति मिले, ईर्ष्या-द्वेष रखने वालों की
नकारात्मकता दूर हो और सभी को सद्बुद्धि प्राप्त हो।
बांज-बुरांश के वृक्षों से सजे पहाड़, प्रकृति की अनुपम सुंदरता और पर्वत की गोद में विराजमान मां सुरकंडा का पावन धाम…
यहां पहुंचकर मन को जो शांति और आत्मा को जो सुकून मिला, उसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है। चारों ओर पहाड़ों की खूबसूरती, ठंडी हवाएं, मां के जयकारे और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था ने इस यात्रा को जीवन की खूबसूरत यादों में शामिल कर दिया।
मां सुरकंडा देवी का पौराणिक इतिहास और धार्मिक मान्यता
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में समुद्र तल से लगभग 2,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मां सुरकंडा देवी का मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह मंदिर देवी के 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर शोक में विचरण करने लगे। सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। मान्यता है कि जहां-जहां माता सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए।
सुरकंडा देवी मंदिर को भी इसी पौराणिक परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। यहां मां जगदंबा की पूजा सुरकंडा देवी के रूप में की जाती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मां के दरबार में मांगी गई मनोकामनाओं को मां सुनती हैं और भक्तों को सुख, शांति तथा शक्ति प्रदान करती हैं।
कद्दूखाल से मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग दो किलोमीटर की चढ़ाई तय करनी पड़ती है। रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार यात्रा कर सकते हैं।
आज अष्टमी पर मां के दरबार में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
आज अष्टमी के अवसर पर देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु मां के चरणों में शीश नवाने और अपनी मनोकामनाओं के साथ दरबार में पहुंचे थे। हर चेहरे पर आस्था, हर जुबान पर मां का नाम और हर हृदय में अपनी आराध्य देवी के प्रति अटूट विश्वास दिखाई दे रहा था।
लेकिन आज की इस यात्रा ने मुझे केवल मां के दर्शन ही नहीं कराए, बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश भी दिया।
बच्चों ने की ट्रॉली में जाने की जिद, लेकिन मैंने पैदल चढ़ाई का महत्व समझाया
हम सुबह साढ़े आठ बजे देहरादून से परिवार के साथ मां के दर्शन के लिए निकले और दोपहर करीब एक बजे कद्दूखाल पहुंचे। इसके बाद बच्चों के साथ पैदल चढ़ाई शुरू की। मां के दरबार तक पहुंचने में लगभग डेढ़ घंटे का समय लगा।
रास्ते में रोपवे की सुविधा थी। बच्चे भी ट्रॉली देखकर उत्साहित हो गए। उन्होंने जिद की, "पापा, हमें भी ट्रॉली में जाना है!"
लेकिन मैंने उन्हें समझाया कि बेटा, हम यहां पिकनिक मनाने नहीं, मां के दर्शन करने आए हैं।
यह यात्रा केवल मंदिर तक पहुंचने की नहीं, बल्कि आस्था, धैर्य और समर्पण को महसूस करने की यात्रा है। इसलिए हमने पैदल चढ़ाई करने का निर्णय लिया।
बच्चों के साथ कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए मां के दरबार तक पहुंचना अपने आप में एक यादगार अनुभव रहा।
मेरे बेटे की तबीयत भी ठीक नहीं थी, इसके बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी और मां के दर्शन किए। एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी क्या होगी कि बच्चे भी आस्था और संस्कारों के इस सफर का हिस्सा बनें।
आज लगा कि बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा और सुविधाएं देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति, परंपराओं और आस्था से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है।
मां के दरबार में न कोई बड़ा, न कोई छोटा… सब मां के भक्त!
मंदिर पहुंचने पर दर्शन के लिए लंबी कतार लगी थी। कुछ लोग सिफारिश के सहारे जल्दी दर्शन करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन हमने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। हम लगभग एक घंटे तक लाइन में खड़े रहे और अपनी बारी आने पर मां के दर्शन किए।
आखिरकार, मां के दरबार में पहुंचने की खुशी ही अलग थी।
क्योंकि मां के दरबार में हम कोई कवि नहीं हैं, कोई पत्रकार नहीं हैं और न ही कोई वीआईपी हैं। हम केवल मां के साधारण भक्त हैं।
पत्रकारिता हमारा पेशा हो सकता है, कविता हमारी पहचान हो सकती है और समाज में हमारी अपनी भूमिका हो सकती है, लेकिन ईश्वर के दरबार में सबसे बड़ी पहचान हमारी श्रद्धा और भक्ति है।
मेरा मानना है कि किसी भी मंदिर, तीर्थ या देवस्थल पर वीआईपी बनकर नहीं, बल्कि एक साधारण भक्त बनकर जाना चाहिए।
जब सैकड़ों लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे हों, तब केवल अपनी पहचान या पहुंच के बल पर आगे निकलने की कोशिश करना उचित नहीं लगता। जिस मां के सामने राजा और रंक सभी शीश झुकाते हैं, वहां बराबरी और धैर्य के साथ दर्शन करने का आनंद ही कुछ और है।
मां के दरबार में पहुंचने की खुशी से कहीं अधिक सुख इस बात में है कि हम मां के सामने किस भाव से पहुंचे।
हमने भी एक सामान्य श्रद्धालु की तरह लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार किया। न किसी से सिफारिश करवाई और न ही अपनी पहचान का सहारा लिया।
क्योंकि मेरी नजर में सच्ची भक्ति वही है, जिसमें अहंकार नहीं, बल्कि समर्पण हो।
पारंपरिक वेशभूषा में परिवार के साथ संजोईं यादगार तस्वीरें
मां के दिव्य दर्शन के बाद परिवार के साथ वहां की खूबसूरत पारंपरिक वेशभूषा में यादगार तस्वीरें भी खिंचवाईं।
पहाड़ की संस्कृति, पारंपरिक पहनावे और प्रकृति की अनुपम सुंदरता के बीच बिताए ये पल हमेशा दिल के करीब रहेंगे।
उत्तराखंड की पारंपरिक वेशभूषा केवल कपड़े नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति, परंपरा और गौरव की पहचान है। परिवार के साथ इन खूबसूरत पलों को तस्वीरों में कैद करना अपने आप में एक अलग अनुभव रहा।
मां के दरबार से आशीर्वाद के साथ देवभूमि की संस्कृति की कुछ अनमोल यादें भी अपने साथ लेकर लौटे।
कुछ तस्वीरें केवल चेहरे को खूबसूरत नहीं बनातीं, बल्कि अपने भीतर एक पूरी कहानी समेटे होती हैं। आज की ये तस्वीरें भी हमारे परिवार की आस्था, प्रेम, संस्कार और पहाड़ से जुड़ाव की कहानी कहती रहेंगी।
कुछ यात्राएं केवल मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं होतीं, बल्कि ऐसी यादें देने के लिए होती हैं, जो जीवनभर चेहरे पर मुस्कान लाती रहें।
सुबह देहरादून से निकले, रात को लौटे… लेकिन यादें हमेशा साथ रहेंगी!
सुबह साढ़े आठ बजे देहरादून से शुरू हुआ हमारा सफर रात करीब साढ़े आठ बजे वापस देहरादून पहुंचने के साथ पूरा हुआ।
बीच में पहाड़ों की सुंदरता, बच्चों के साथ चढ़ाई, दर्शन की प्रतीक्षा, मां के दिव्य दर्शन, पारंपरिक वेशभूषा में तस्वीरें और परिवार के साथ बिताए अनमोल पल… सब कुछ जीवन की खूबसूरत यादों में शामिल हो गया।
थकान जरूर हुई, लेकिन मन में संतोष और चेहरे पर खुशी थी। मां के दर्शन की लालसा पूरी हुई और परिवार के साथ एक ऐसा दिन बिताने का अवसर मिला, जिसे लंबे समय तक याद रखेंगे।
आज महसूस हुआ कि तीर्थयात्रा केवल अपनी मनोकामना मांगने का नाम नहीं है। यह अपने बच्चों को संस्कार देने, धैर्य का महत्व समझने, प्रकृति के करीब जाने और स्वयं को भीतर से शांत करने का भी माध्यम है।
हम अक्सर जीवन की भागदौड़ में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि परिवार के साथ सुकून के कुछ पल बिताना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मां के दरबार की यह यात्रा हमें परिवार, आस्था और जीवन की वास्तविक खुशियों का महत्व समझा गई।
मां से यही प्रार्थना है…
हे मां सुरकंडा! अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। मेरे परिवार को सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करना। मेरे शुभचिंतकों को जीवन में उन्नति, सफलता और खुशियां देना।
जो लोग हमारे लिए अच्छा सोचते हैं, उनका सदैव कल्याण करना। जो ईर्ष्या-द्वेष रखते हैं, उनके मन से भी नकारात्मकता दूर करके उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करना।
हमारे कर्मों को सही दिशा देना, हमारे कदमों को शक्ति देना और हमें हमेशा सत्य एवं न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना।
जीवन में कितनी भी सफलता मिले, कितना भी सम्मान मिले, लेकिन अपने संस्कार, अपनी संस्कृति और अपनी आस्था को कभी न भूलें।
क्योंकि पहचान चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, ईश्वर के सामने इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका समर्पण और उसका कर्म ही होता है।
आज पहली बार मां सुरकंडा के दरबार में परिवार सहित शीश नवाया। मन में अपार श्रद्धा है और हृदय में एक ही भाव है—
"मां, बस अपना आशीर्वाद बनाए रखना। हमारे सिर पर आपका हाथ रहे, परिवार में खुशहाली रहे और जीवन का हर कदम आपके आशीर्वाद से आगे बढ़े।"
दीपक कैंतुरा की कलम से