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रैबार पहाड़ का

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पहाड़ मैदान कुमाऊं गढ़वाल जौनसार, जोगेंद्र सिंह पुंडीर के लिए उमड़ा हजारों बहनों का प्यार 

जोगेंद्र सिंह पुंडीर जना भेजी सबूका हो:साक्षी भट्ट 
दिल छू लेने वाली गढ़वाली 

टिहरी की साक्षी भट्ट की शानदार गढ़वाली सुनेंगे तो सुनते ही रह जाएंगे पहाड़ की बोली में साक्षी ने समाजसेवी एवं भाजपा नेता जोगेंद्र सिंह पुंडीर को अपना सगा भाई बताया।
वहीं  भारती देवी ने कहा कि वह जोगेंद्र सिंह पुंडीर को भविष्य में विधायक के रूप में देखना चाहती हैं।
पहाड़ की बहनों का यह अपनापन और प्यार दिल छू लेने वाला है। 

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42 वी खतलिंग महायात्रा इस वर्ष पहाड़ के गांधी बडोनी के गांव अखोड़ी से प्रारम्भ होगी:- 
 घनसाली 25 अगस्त,
42वीं ऐतिहासिक पांचवां धाम खतलिंग हिमालय जागरण महायात्रा 2026 पर्वतीय दलोक विकास समिति , इन्द्रमणि बडोनी कला एवं साहित्य मंच घनसाली एवं भिलंगना विकास समिति के तत्वावधान में एक सितम्बर से शुरू होकर 2सितम्बर, खतलिंग महायात्रा के जनक, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रणेता एवं पहाड़ के गांधी पहाड़ श्रद्धेय इंद्रमणि बडोनी के घर गांव ग्राम अखोड़ी से प्रारम्भ होकर विभिन्न पड़ाओ से होकर खतलिंग गंगी पहुंचेगी! आप सभी सामाजिक राजनैतिक शैक्षणिक, व्यापारिक, पत्रकार, एवं पंचायत संगठनों, से अनुरोध है कि, इस महायात्रा में 2 सितम्बर को अखोड़ी पहुंच कर भव्य आयोजन शामिल होने का अनुरोध है यात्रा का उद्देश्य सम्पूर्ण भिलंगना क्षेत्र के सुन्दर धार्मिक साहसिक एवं नैसर्गिक पर्यटन विकसित किया जाना है अतः आप सभी मित्रों की उपस्थिति प्रार्थनीय है!
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उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती का बड़ा बयान 70 की 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा उत्तराखंड क्रांति दल
7-8 हजार बहनों की भीड़ से गदगद हुए CM धामी, जोगेंद्र पुंडीर की थपथपाई पीठ; गूंजा—“रक्षाबंधन केवल धागा नहीं, सुरक्षा और सम्मान का संकल्प”

देहरादून में जोगेंद्र सिंह पुंडीर के भव्य रक्षाबंधन कार्यक्रम में उमड़ा मातृशक्ति का सैलाब!

हजारों बहनों की मौजूदगी ने कार्यक्रम को बनाया यादगार। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 7 से 8 हजार बहनों की भीड़ देखकर आयोजन की भव्यता की सराहना की और जोगेंद्र सिंह पुंडीर की पीठ थपथपाई।

इस अवसर पर भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष रुची भट्ट, महानगर अध्यक्ष सिद्धार्थ अग्रवाल, राज्य मंत्री अनुराधा वालिया और कैंट बोर्ड उपाध्यक्ष विनोद पंवार सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

जोगेंद्र सिंह पुंडीर ने कहा

“रक्षाबंधन केवल कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं, बल्कि बहनों के सम्मान, सुरक्षा, स्वाभिमान और सशक्तिकरण का संकल्प है।”

उन्होंने कहा कि बहनों के सुख-दुख में साथ खड़ा होना राजनीतिक दायित्व नहीं, बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारी है

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सोशल मीडिया पर लिखने के बजाय डीजी सूचना बंशीधर तिवारी जी से मुलाकात कर हम अपनी बात रख सकते हैं 

लोकल न्यूज़ पोर्टलों की सूचीबद्धता के लिए दरें पोर्टलों ने स्वयं की निर्धारित इसको कोई भी नकार नहीं सकता, टेंडर निकलता है उसके बाद हम ही बीट डालते हैं। सबसे कम जिसका रेट होता है उसका ही फाइनल माना जाता है, लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि हमारे ही बीच से ऐसा कौन रहता है जो यह नहीं चाहता कि रेट अच्छे हों।

लोकल न्यूज़ पोर्टलों की सूचीबद्धता के लिए सूचना विभाग द्वारा अपनाई गई निविदा प्रक्रिया को लेकर सामने आ रहे विरोध के बीच ये जानना जरूरी है कि निविदा में एल-1 एल-2 दरें सूचना विभाग द्वारा निर्धारित नहीं की गई हैं, बल्कि संबंधित न्यूज़ पोर्टलों ने निविदा प्रक्रिया के तहत अपनी दरें स्वयं प्रस्तुत की हैं।

निविदा में प्राप्त दरों को लेकर किसी प्रकार की असहमति होने की स्थिति में संबंधित पोर्टल संचालकों के पास अपनी आपत्ति अथवा असहमति लिखित रूप में दर्ज कराने का विकल्प है। केवल इस आधार पर कि कुछ दरें अपेक्षाकृत कम प्राप्त हुई हैं, पूरी प्रक्रिया स्वतः निरस्त नहीं हो सकती है। 
नियमानुसार निविदा प्रक्रिया को एक बार जारी किया जाना आवश्यक था और पोर्टलों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी दरें प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया। अब यदि संबंधित पोर्टल संचालक प्रस्तावित दरों को स्वीकार नहीं करते हैं तो वे विभाग को लिखित रूप में अपनी असहमति से अवगत करा सकते हैं।

ऐसी स्थिति में प्राप्त आपत्तियों और संबंधित नियमों के आधार पर आगे की कार्रवाई पर निर्णय लिया जा सकता है।

निविदा में किसी पोर्टल द्वारा स्वयं प्रस्तुत की गई दर को बाद में विभाग द्वारा तय की गई दर के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। दरें निविदा प्रक्रिया में संबंधित प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत की गई हैं।

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बिना नाम लिए CM धामी का गणेश गोदियाल पर बड़ा हमला

उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर बयानबाजी ने गर्मी बढ़ा दी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बिना नाम लिए कांग्रेस नेता गणेश गोदियाल पर बड़ा सवाल दाग दिया
 धामी के सवाल पर अब गोदियाल के जवाब का इंतजार
क्या यह सियासी पलटवार की शुरुआत है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में कोई बड़ा मोड़ देखने को मिलेगा?
आपको क्या लगता है—गोदियाल इस सवाल का क्या जवाब देंगे
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माँ सहजा भगवती मंदिर: जहां न्याय की गुहार कभी खाली नहीं जाती
उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के सिरवाड़ी गांव में स्थित माँ सहजा भगवती मंदिर आस्था, शक्ति और पौराणिक मान्यताओं का प्रमुख केंद्र है। सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था इस पावन धाम से जुड़ी हुई है।
स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, माँ मठियाणा देवी का मूल नाम सहजा था। कहा जाता है कि तिब्बत के राजकुमार से विवाह के बाद वह सौतेली मां के षड्यंत्र का शिकार हुईं। पति की हत्या के बाद अलकनंदा-मंदाकिनी के पावन संगम पर सती होने के दौरान उनकी दैवीय शक्तियां जागृत हुईं।
मान्यता है कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध महाशक्ति के रूप में प्रकट होकर देवी ने दुष्ट शक्तियों का संहार किया और इसके बाद सिरवाड़ी गांव को अपना स्थायी धाम बनाया।
आज माँ सहजा भगवती को क्षेत्रवासी केवल अपनी रक्षक कुलदेवी के रूप में ही नहीं, बल्कि ‘न्याय की देवी’ के रूप में भी पूजते हैं। श्रद्धालुओं की गहरी मान्यता है कि इस पावन दरबार में सच्चे मन से की गई न्याय की पुकार मां के दरबार से कभी खाली नहीं लौटती।
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पहाड़ की पीड़ा को सुरों में ढालने वाले दिगम्बर सिंह बिष्ट को मिला उफतारा सम्मान-2026 

उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोक गायक दिगम्बर सिंह बिष्ट ने अपनी गायकी के जरिए पहाड़ की संस्कृति, लोक परंपराओं और आम पहाड़ी जीवन की कहानियों को आवाज दी है। उनकी गायकी में पहाड़ की मिट्टी की खुशबू के साथ-साथ यहां के लोगों का सुख-दुख और संघर्ष भी सुनाई देता है।

चमोली जनपद से जुड़े दिगम्बर सिंह बिष्ट लंबे समय से लोकगीत, जागर और पारंपरिक लोक प्रस्तुतियों के माध्यम से उत्तराखंड की लोक संस्कृति को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। पांडव लीला और पांडव नृत्य जैसे पारंपरिक आयोजनों में भी उनकी लोकगायकी और पनवाणी प्रस्तुतियों का उल्लेख मिलता है।
उनकी आवाज में पहाड़ के गांव, यहां की परंपराएं और बदलते पहाड़ की तस्वीर दिखाई देती है। मौर्याण में बाघ का आतंक जैसे गीतों के जरिए उन्होंने पहाड़ की जमीनी समस्याओं को भी गीतों का हिस्सा बनाया है। वहीं पलायन और खाली होते गांवों का दर्द भी उनकी गायकी में महसूस किया जा सकता है।

 उफतारा सम्मान-2026 से सम्मानित

लोक संगीत और उत्तराखंड की संस्कृति के लिए उनके योगदान को देखते हुए दिगम्बर सिंह बिष्ट को उफतारा फिल्म, टेलीविजन एंड रेडियो एसोसिएशन की ओर से उफतारा सम्मान-2026 से सम्मानित किया गया। उनके सम्मान की जानकारी उफतारा से जुड़े सोशल मीडिया पोस्टों में भी सामने आई है।

यह सम्मान सिर्फ दिगम्बर सिंह बिष्ट का सम्मान नहीं, बल्कि उस पहाड़ी लोक संस्कृति का सम्मान है, जिसे कलाकार अपनी आवाज के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
आज जब पहाड़ के गांव पलायन की मार झेल रहे हैं और लोक परंपराएं धीरे-धीरे बदल रही हैं, ऐसे समय में दिगम्बर सिंह बिष्ट जैसे कलाकार अपने गीतों के माध्यम से पहाड़ की पहचान और उसकी आवाज को जिंदा रखने का काम कर रहे हैं।
दिगम्बर सिंह बिष्ट की गायकी में पहाड़ बोलता है…
पहाड़ का दर्द सुनाई देता है…
और पहाड़ की संस्कृति की गूंज महसूस होती है। 

रैबार पहाड़ का
पहाड़ की आवाज, पहाड़ के साथ
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“उत्तराखंड की राजनीति में मुझसे वरिष्ठ कोई नहीं!” हरक सिंह का बड़ा दावा—कहा, मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक कई नेता मेरे चेले रहे हैं! 

उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर हरक सिंह रावत के बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है।
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने अपने लंबे राजनीतिक सफर और सियासी अनुभव का जिक्र करते हुए दावा किया कि उत्तराखंड की राजनीति में वरिष्ठता के लिहाज से उनका कद सबसे ऊंचा है। उन्होंने यहां तक कहा कि अलग-अलग दौर में उनके साथ रहे कई नेता आज मंत्री, विधायक और यहां तक कि मुख्यमंत्री तक के पद पर पहुंच चुके हैं।
हरक सिंह ने कई नेताओं का जिक्र करते हुए उन्हें अपना राजनीतिक शिष्य यानी “चेला” बताया। उन्होंने धन सिंह रावत, राम सिंह केड़ा, भरत चौधरी समेत कई नेताओं का नाम लिया।
वहीं कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल को उन्होंने अपना छोटा भाई बताया। हरक सिंह ने कहा कि गोदियाल 2002 में राजनीति में आए और आज कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं।
इतना ही नहीं, उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को लेकर भी बड़ा दावा किया। हरक सिंह के मुताबिक, निशंक को पहली बार टिकट दिलाने और चुनाव लड़वाने में उनकी अहम भूमिका रही थी।
एनडी तिवारी सरकार के दौर से लेकर उत्तर प्रदेश में मंत्री बनने तक के अपने राजनीतिक सफर का हवाला देते हुए हरक सिंह ने कहा कि वरिष्ठता और राजनीतिक अनुभव के मामले में वह उत्तराखंड के सबसे पुराने नेताओं में शामिल हैं।
अब हरक सिंह का यह दावा सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ रहा है—
क्या वाकई उत्तराखंड की राजनीति में “गुरु” हरक सिंह रावत का सियासी कद सबसे बड़ा है
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पहाड़ की बेटी पूनम सकलानी का हुनर, गायिकी से अभिनय तक बना रही अलग पहचान

उत्तराखंड की उभरती गायिका और नायिका पूनम सकलानी ने महज पांच साल के सफर में अपनी मेहनत और प्रतिभा से मनोरंजन जगत में खास पहचान बनाई है। कई एल्बमों और फिल्मों में काम कर चुकी पूनम ने मां सुरकंडा, युद्धवीर, भाग्यान जैसी फिल्मों के साथ हिंदी फिल्म संत रविदास में भी अपने अभिनय और कला का हुनर दिखाया है।
पहाड़ की मिट्टी से निकली यह प्रतिभा आज गायिकी और अभिनय—दोनों क्षेत्रों में लगातार आगे बढ़ रही है। संघर्ष, मेहनत और सपनों के दम पर पूनम सकलानी उत्तराखंड की नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए एक प्रेरणादायक नाम बनकर उभर रही हैं
खोजी रिपोर्ट में जानिए—पूनम सकलानी के अब तक के सफर की पूरी कहानी, संघर्ष से सफलता तक का सफर और उनके आने वाले प्रोजेक्ट्स की खास बातें

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पहली बार राखी पर बहनों के लिए उमड़ा CM धामी का प्यार, 2 दिन की बस यात्रा निशुल्क

रक्षाबंधन के पावन पर्व पर धामी सरकार ने उत्तराखंड की बहनों और महिलाओं को खास तोहफा दिया है। प्रदेशभर में 2 दिनों तक उत्तराखंड परिवहन निगम की सरकारी बसों में महिलाओं को निशुल्क यात्रा की सुविधा दी गई है।

भाजपा प्रदेश प्रवक्ता हनी पाठक ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का आभार जताते हुए कहा कि धामी सरकार लगातार महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता के लिए काम कर रही है। लखपति दीदी योजना, सरकारी नौकरियों में 33% क्षैतिज आरक्षण और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की पहल इसी प्रतिबद्धता का प्रमाण हैं।

राखी के इस खास मौके पर बहनों के लिए सरकार का यह उपहार—सिर्फ सुविधा नहीं, सम्मान और अपनत्व का संदेश भी है। 

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धामी की अफसरों को दो टूक—जनता की समस्या का तुरंत समाधान करो, चांद-तारे तोड़कर लाने को नहीं कहा!

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों की जमकर क्लास लगाते हुए साफ कहा कि जनता की समस्याओं के समाधान में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। सीएम ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि शिकायतों को गंभीरता से लें और उनका तत्काल समाधान सुनिश्चित करें।
सीएम का संदेश बिल्कुल साफ—जनता की समस्या हल करने के लिए चांद-तारे तोड़कर लाने को नहीं कहा है, बस जिम्मेदारी से अपना काम करें। 

अब देखना होगा कि सीएम के सख्त निर्देशों का असर अफसरशाही के कामकाज पर कितना दिखाई देता है।
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युगद्रष्टा जनकवि ‘गिर्दा’: पहाड़ के संघर्षों की अमर आवाज़

पुण्यतिथि विशेष | 22 अगस्त

उत्तराखंड के जनजीवन, लोकसंस्कृति और जनआंदोलनों की बात गिर्दा के बिना अधूरी है। जब पहाड़ में जंगल, जमीन, पानी, रोजगार और पहचान के सवालों पर जनता सड़कों पर उतरी, तब एक कवि केवल कविता लिखने तक सीमित नहीं रहा। वह खुद जनता के बीच खड़ा हुआ, हुड़के की थाप पर गीत गाता रहा और अपनी आवाज को संघर्ष की आवाज बना दिया।

वह थे गिरीश चंद्र तिवाड़ी ‘गिर्दा’—कुमाऊं के वह जनकवि, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी और आंदोलनकारी, जिनके गीत उत्तराखंड के अनेक जनसंघर्षों की सांस्कृतिक पहचान बन गए।

सितंबर 1945 में जन्मे, संघर्षों के बीच बने ‘गिर्दा’

गिर्दा का जन्म सितंबर 1945 में अल्मोड़ा जिले के हवालबाग क्षेत्र के ज्योली गांव में हुआ था। उपलब्ध प्रमुख जीवनी स्रोतों में उनकी जन्मतिथि 9 सितंबर 1945 दर्ज है, जबकि कुछ अन्य स्रोत 10 सितंबर बताते हैं। उनके पिता हंसादत्त तिवाड़ी और माता जीवंती तिवाड़ी थीं।

उनका जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। आजीविका के लिए उन्होंने अलग-अलग काम किए। लखनऊ, अलीगढ़, पीलीभीत और पूरनपुर में रिक्शा चलाने से लेकर सरकारी विभागों में काम करने तक का अनुभव उनके जीवन का हिस्सा रहा। बाद में 1967 में वह भारत सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग से जुड़े। रंगमंच, लोकसंगीत और सामाजिक सरोकारों ने उनके व्यक्तित्व को वह दिशा दी, जिसने उन्हें आगे चलकर जनकवि ‘गिर्दा’ बना दिया।

हुड़के की थाप बनी प्रतिरोध की आवाज

गिर्दा की सबसे अलग पहचान थी—उनका हुड़का।

उच्चकुलीन ब्राह्मण परिवार से आने के बावजूद उन्होंने हुड़का हाथ में लेकर लोकमंच और आंदोलनों में उसका इस्तेमाल किया। उस समय हुड़का बजाने की परंपरा सामाजिक रूप से एक विशेष समुदाय से जोड़ी जाती थी। गिर्दा ने इस सामाजिक विभाजन को चुनौती देते हुए लोकवाद्य को जनजागरण का माध्यम बनाया।

उनके लिए लोककला केवल मनोरंजन नहीं थी। वह समाज को जगाने और सवाल पूछने का माध्यम थी।

चिपको से उत्तराखंड आंदोलन तक

गिर्दा का जुड़ाव केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा। वन आंदोलन और चिपको आंदोलन के दौर में उन्होंने गीतों के माध्यम से जंगल और हिमालय के सवालों को जनता तक पहुंचाया। 1977 के वन आंदोलन के दौरान उनका गीत “आज हिमाल तुमन कैं धत्यूंछ, जागो जागो हो मेरा लाल” व्यापक रूप से चर्चित हुआ।

इसके बाद ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन, नदी बचाओ जैसे जनसंघर्षों और बाद में उत्तराखंड राज्य आंदोलन में भी उनकी सक्रिय सांस्कृतिक भूमिका रही। 1984 के नशा विरोधी आंदोलन में जनगीत, नुक्कड़ नाटक और सांस्कृतिक यात्राओं के माध्यम से जनजागरण का काम हुआ, जिसमें गिर्दा की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

‘जैंता एक दिन तो आलो...’ ने भरी आंदोलन में ऊर्जा

उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर में गिर्दा का गीत—

“ओ जैंता एक दिन तो आलो, उ दिन यो दुनी में...”

आंदोलनकारियों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। उनके गीतों में केवल राज्य की मांग नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और जनपक्षीय समाज की कल्पना भी दिखाई देती थी।

यही वजह थी कि गिर्दा के गीत आंदोलन की सभाओं, जुलूसों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अभिन्न हिस्सा बन गए।

‘बोल व्यापारी’ में विकास के मॉडल पर सवाल

गिर्दा की रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी दूरदृष्टि थी। उनके चर्चित गीत ‘बोल व्यापारी’ में प्रकृति के अंधाधुंध दोहन और विकास की उस सोच पर सवाल उठाया गया, जिसमें पहाड़ की नदियों, जंगलों और जमीन को केवल संसाधन समझा जाता है।

उनकी रचनाओं में आने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों की चेतावनी आज भी पहाड़ के मौजूदा संकटों के संदर्भ में प्रासंगिक महसूस होती है। हालांकि यह कहना कि गिर्दा ने किसी खास भविष्य की आपदा की “भविष्यवाणी” कर दी थी, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। बेहतर यह है कि उनकी रचनाओं को पर्यावरणीय चेतना और विकास के मॉडल पर सवाल उठाने वाली दूरदर्शी रचनाएं कहा जाए।

साहित्य और रंगमंच में भी बड़ा योगदान

गिर्दा केवल आंदोलनकारी कवि नहीं थे। वह रंगकर्मी और लेखक भी थे। उन्होंने ‘नगाड़े खामोश हैं’ और ‘धनुष यज्ञ’ जैसे नाटकों पर काम किया। ‘शिखरों के स्वर’, ‘हमारी कविता के आखर’, ‘रंग डारि दियो हो अलबेलिन में’ और ‘उत्तराखंड काव्य’ जैसी कृतियों से भी उनका साहित्यिक योगदान जुड़ा है।

उनका साहित्य पहाड़ के आम आदमी, उसकी पीड़ा, संघर्ष, संस्कृति और सामाजिक विसंगतियों से गहराई से जुड़ा रहा।

सादगी, फक्कड़पन और जनता से सीधा रिश्ता

गिर्दा के व्यक्तित्व की एक खास पहचान उनका फक्कड़पन था। वह बड़े मंचों के कवि होने के बावजूद आम लोगों के बीच सहजता से घुल-मिल जाते थे। उनके बारे में लिखने वाले कई लोगों ने उनके इसी सरल और बेबाक व्यक्तित्व को रेखांकित किया है।

उनके लिए कविता किताब के पन्नों तक सीमित नहीं थी। कविता तब सार्थक थी जब वह जनता की आवाज बन सके।

22 अगस्त 2010 को थम गई आवाज, लेकिन गीत आज भी जिंदा

गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ का निधन 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में हुआ। उनके निधन के बाद उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आंदोलनकारी दुनिया में एक बड़ा खालीपन महसूस किया गया।

उनके योगदान को उत्तराखंड सरकार ने भी सम्मान दिया। 2022 में उन्हें मरणोपरांत ‘उत्तराखंड गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इसलिए पुराने लेखों में मिलने वाला “निधन के 11 साल बाद” वाला उल्लेख सही नहीं है; 2010 से 2022 तक लगभग 12 वर्ष का अंतर है।

गिर्दा को याद करना, सवालों को जिंदा रखना है

गिर्दा की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं है। यह उस चेतना को याद करने का दिन है, जिसने पहाड़ के जंगल, नदी, जमीन, संस्कृति, रोजगार और आम आदमी के सवालों को कविता का विषय बनाया।

आज जब उत्तराखंड विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन, पलायन, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदाओं और सांस्कृतिक पहचान जैसे सवालों से जूझ रहा है, तब गिर्दा के गीत हमें फिर वही सवाल पूछने के लिए प्रेरित करते हैं—

विकास किसके लिए?
किस कीमत पर?
और पहाड़ के भविष्य का फैसला कौन करेगा?

शायद यही गिर्दा की सबसे बड़ी विरासत है—उन्होंने हमें केवल गीत नहीं दिए, बल्कि सवाल पूछने की हिम्मत भी दी।

शरीर से गिर्दा भले ही 22 अगस्त 2010 को विदा हो गए, लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ों में जब तक जनगीत गूंजते रहेंगे, जब तक जंगल और नदियों के लिए आवाज उठती रहेगी और जब तक कोई युवा अन्याय के खिलाफ खड़ा होगा—गिर्दा की आवाज जीवित रहेगी।

जनकवि, लोकसंस्कृति के प्रहरी और जनसंघर्षों की अमर आवाज गिरीश चंद्र तिवाड़ी ‘गिर्दा’ को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। 🙏
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पानी पिलाया, वोट नहीं दिया तो… पेट में कीड़े

 लक्सर के पूर्व विधायक संजय गुप्ता का बयान वायरल!
अपने जन्मदिन कार्यक्रम में पूर्व विधायक संजय गुप्ता ने अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि उन्होंने क्षेत्र में साफ पेयजल उपलब्ध कराया। इसी दौरान मजाकिया अंदाज में उन्होंने कहा—“मेरा लाया साफ पानी पीकर भी मुझे वोट नहीं देगा, उसके पेट में कीड़े पड़ेंगे और पेट फट जाएगा
अब संजय गुप्ता का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है

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