हस्तलिखित पांडुलिपियों में सुरक्षित है भारत की ज्ञान-परम्परा
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सैकड़ों वर्ष प्राचीन ग्रंथों का हस्तलिखित स्वरूप देखकर अभिभूत हुए विद्यार्थी
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जैन समाज आत्मीयता और श्रद्धा से सहेजे हुए है यह अमूल्य धरोहर
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ज्ञान भारतम् अभियान के अंतर्गत विद्यार्थियों ने किया ऐतिहासिक जैन मंदिर का अध्ययन, शोध और संरक्षण की संभावनाओं पर हुआ विमर्श
बड़वानी 14 जून 2026/ भारत को विश्व में यदि किसी बात ने सबसे अधिक विशिष्ट बनाया है तो वह है उसकी समृद्ध ज्ञान परम्परा। यह वह भूमि है जहाँ वेदों, उपनिषदों, आगमों, दर्शन, गणित, ज्योतिष, साहित्य, आयुर्वेद, योग और आध्यात्मिक चिंतन की महान परम्पराएँ विकसित हुईं। हजारों वर्षों तक यह ज्ञान गुरु-शिष्य परम्परा, श्रुति परम्परा और बाद में हस्तलिखित ग्रंथों के माध्यम से सुरक्षित रखा गया। आज भी भारत के अनेक मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों और निजी संग्रहों में ऐसी अमूल्य पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं जो हमारे गौरवशाली अतीत की साक्षी हैं।
इन्हीं अमूल्य धरोहरों की खोज, पहचान, सूचीकरण और संरक्षण के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा ज्ञान भारतम् अभियान संचालित किया जा रहा है। बड़वानी जिले में कलेक्टर श्रीमती जयति सिंह के नेतृत्व में इस अभियान को विशेष गति मिली है। अभियान के अंतर्गत जिले के विभिन्न क्षेत्रों में प्राचीन पांडुलिपियों की खोज और उनका दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शहीद भीमा नायक शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बड़वानी के विद्यार्थियों और समिति सदस्यों ने नगर के ऐतिहासिक श्री खंडेलवाल दिगंबर जैन मंदिर को विजिट किया, जहाँ बड़ी संख्या में प्राकृत भाषा में लिखी गई प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियाँ सुरक्षित रखी गई हैं।
जैन समाज ने सहेज रखी है ज्ञान की अमूल्य निधि
मंदिर समिति के अध्यक्ष श्री जिनेंद्र दोषी, उपाध्यक्ष श्री अशोक दोषी, मंत्री श्री नरेंद्र काला, श्री राजेश काला, श्री राजेश अजमेरा तथा श्री यश सेठी ने विद्यार्थियों को पांडुलिपियों का अवलोकन करवाया। उन्होंने बताया कि जैन धर्म में ज्ञान को सर्वाेच्च स्थान प्राप्त है। जैन परम्परा में जिनवाणी को श्रुत, श्रुतज्ञान, आगम, परमागम, दिव्यध्वनि, सरस्वती, शास्त्रजी, द्वादशांग वाणी, प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग तथा द्रव्यानुयोग जैसे अनेक विशेषणों से विभूषित किया गया है। जैन समाज ने सदैव ज्ञान को केवल पढ़ने की वस्तु ही नहीं माना, बल्कि उसे पूजा और साधना का विषय भी माना है। यही कारण है कि सदियों से ग्रंथों और पांडुलिपियों के संरक्षण की सशक्त परम्परा विकसित हुई। आज भी समाज के लोग इन ग्रंथों को अत्यंत श्रद्धा और सावधानी के साथ सुरक्षित रखे हुए हैं।
महिलाओं की भूमिका ने बचाई ज्ञान-संपदा
जैन समाज का महिला मंडल भी इस संरक्षण कार्य में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अध्यक्ष श्रीमती सरला गोधा और मंत्री श्रीमती सुरेखा दोषी के नेतृत्व में महिलाएँ नियमित रूप से ग्रंथों की व्यावृत्ति और देखभाल करती हैं। यही कारण है कि छह सौ वर्षों से अधिक पुराने अनेक ग्रंथ आज भी सुरक्षित अवस्था में उपलब्ध हैं। ज्ञान संरक्षण की यह परम्परा भारतीय समाज की उस चेतना को दर्शाती है जिसमें पुस्तकों को केवल वस्तु नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता का जीवंत स्वरूप माना गया है।
इतिहास और स्थापत्य का अनूठा केन्द्र
श्री राजेश अजमेरा ने विद्यार्थियों को मंदिर के इतिहास की जानकारी देते हुए बताया कि यह मंदिर लगभग 600 वर्ष प्राचीन माना जाता है। बाद में बड़वानी रियासत के दौरान श्रीमंत महाराजा रणजीत सिंह जी के राज्य काल में इसका विस्तार हुआ और 14 फरवरी 1927 को एक भव्य, विशाल एवं आकर्षक देवालय का निर्माण किया गया। बारहदरी शैली में निर्मित यह मंदिर अपने ऊँचे शिखरों और कलात्मक स्थापत्य के कारण विशेष पहचान रखता है। मंदिर के मूलनायक भगवान नेमीनाथ हैं और उनकी प्रतिमा भी लगभग छह सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है। इस प्रकार यह स्थल केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
श्रुत पंचमी ज्ञान आराधना का महापर्व
विजिट के दौरान श्री दोषी एवं श्री अजमेरा ने विद्यार्थियों को श्रुत पंचमी के महत्व से भी अवगत कराया। उन्होंने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी का दिन जैन समाज में ज्ञान और शास्त्रों की आराधना का महान पर्व माना जाता है। दिगम्बर जैन परम्परा के अनुसार आचार्य धरसेन के दो शिष्य आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबली ने अपने गुरु से प्राप्त श्रुतज्ञान को लिपिबद्ध किया और ‘षट्खण्डागम’ जैसे महान ग्रंथ की रचना की। यह ग्रंथ दिगम्बर जैन परम्परा के सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन ग्रंथों में माना जाता है। इसकी रचना से ज्ञान के संरक्षण की एक नई परम्परा प्रारम्भ हुई। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में श्रुत पंचमी मनाई जाती है। इस दिन जिनवाणी, आगम ग्रंथों, शास्त्रों और पुस्तकालयों का पूजन किया जाता है तथा अध्ययन और ज्ञानार्जन का संकल्प लिया जाता है। वस्तुतः श्रुत पंचमी केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि ज्ञान संरक्षण और ज्ञान साधना का पर्व है।
जब विद्यार्थियों ने पहली बार देखा हस्तलिखित ज्ञान का संसार
डिजिटल युग में पले-बढ़े अधिकांश विद्यार्थियों ने अब तक ज्ञान को केवल पुस्तकों, इंटरनेट या मोबाइल स्क्रीन पर ही देखा था। जब कन्हैया लाल फूलमाली, सावन पाटीदार, भोलू बामनिया, मोक्ष यादव, आरती धनगर, हंसा धनगर, अर्नी गुप्ता, दिव्या जमरे आदि विद्यार्थियों ने सैकड़ों वर्ष पुराने कागज़ों पर सुंदर हस्तलिपि में लिखित ग्रंथों को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। विद्यार्थियों ने अनुभव किया कि जिन ग्रंथों को आज हम मुद्रित पुस्तकों के रूप में पढ़ते हैं, कभी उन्हें विद्वान अपने हाथों से लिखते थे। प्रत्येक पृष्ठ पर धैर्य, साधना, अनुशासन और ज्ञान के प्रति समर्पण झलकता है। कई विद्यार्थियों ने कहा कि यह अनुभव उनके लिए किसी संग्रहालय या ऐतिहासिक स्मारक के दर्शन से भी अधिक प्रेरक था, क्योंकि यहाँ वे प्रत्यक्ष रूप से उस ज्ञान-संपदा को देख रहे थे जिसने भारतीय सभ्यता को आकार दिया।
शोध और अध्ययन की नई संभावनाएँ
ज्ञान भारतम् समिति के नोडल अधिकारी डिप्टी कलेक्टर श्री शक्ति सिंह चौहान तथा प्राचार्य डॉ. वीणा सत्य के मार्गदर्शन में समिति सदस्य डॉ. अंतिम मौर्य, डॉ. मधुसूदन चौबे तथा इतिहास के विद्यार्थियों कन्हैयालाल फूलमाली, सावन पाटीदार, भोलू बामनिया, मोक्ष यादव, आरती धनगर, हंसा धनगर, अर्नी गुप्ता एवं दिव्या जमरे ने दो बार मंदिर का भ्रमण किया। डॉ. मधुसूदन चौबे ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत फील्ड स्टडी, रिसर्च प्रोजेक्ट और लघु शोध-प्रबंधों की व्यापक संभावनाएँ हैं। ऐसी पांडुलिपियाँ विद्यार्थियों के लिए अध्ययन और अनुसंधान के महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल पुस्तकों से नहीं लिखा जाता। वास्तविक स्रोतों का अध्ययन, स्थानीय इतिहास की खोज और पांडुलिपियों का विश्लेषण इतिहास लेखन की मूल आधारशिला है। ज्ञान भारतम् अभियान विद्यार्थियों को इसी दिशा में प्रेरित कर रहा है।
ज्ञान भारतम् अभियान को मिल रही उल्लेखनीय सफलता
उल्लेखनीय है कि बड़वानी जिले में संचालित ज्ञान भारतम् अभियान निरंतर सफलता प्राप्त कर रहा है। अब तक जिले के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त पांडुलिपियों में से 28 पांडुलिपियाँ स्वीकृत होकर भारत सरकार के ज्ञान भारतम् पोर्टल पर सूचीबद्ध हो चुकी हैं।
समिति के नोडल अधिकारी डिप्टी कलेक्टर श्री शक्ति सिंह चौहान, इतिहासकार डॉ. शिवनारायण यादव, डॉ. पुष्पलता खरे, डॉ. मंगला ठाकुर तथा प्राचार्य डॉ. वीणा सत्य के मार्गदर्शन में यह कार्य आगे बढ़ रहा है। विषय विशेषज्ञ के रूप में इंदौर के श्री अनिल जोशी, पुरातत्व विभाग भोपाल के श्री अमन असवाल और सुश्री पूजा शर्मा का मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है. समिति के सदस्यों में श्री शिवपाल सिंह सिसौदिया, डॉ. अनिल पाटीदार, डॉ. ज्योति जोशी उपाध्याय तथा डॉ. मनीष दासोंदी भी शामिल हैं. विशेषज्ञों करियर सेल के कार्यकर्ता इस अभियान में विशेष सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
अतीत की विरासत, भविष्य की प्रेरणा
ज्ञान भारतम् अभियान केवल पांडुलिपियों की खोज का कार्यक्रम नहीं है। यह भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा को नई पीढ़ी से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यह अभियान युवाओं को यह समझने का अवसर देता है कि भारत का इतिहास केवल राजनीतिक घटनाओं का इतिहास नहीं, बल्कि ज्ञान, दर्शन, साहित्य, अध्यात्म, विज्ञान और संस्कृति की एक विराट यात्रा है। समिति ने जिले के उन सभी धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं निजी संस्थानों तथा नागरिकों से आग्रह किया है, जिनके पास पुरानी पांडुलिपियाँ, हस्तलिखित ग्रंथ, वंशावली अभिलेख अथवा अन्य ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित हैं, वे इसकी सूचना समिति को उपलब्ध कराएं। विशेषज्ञों द्वारा उनका अवलोकन कर आवश्यकतानुसार सूचीबद्ध करने एवं भारतीय ज्ञान परंपरा की इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में कार्य किया जाएगा।
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11 views | Barwani, Madhya Pradesh | Jun 14, 2026