जरूरत पड़े तो आरक्षण छोड़ने को भी तैयार, सबसे वंचितों के लिए अलग कोटा की मांग : संतोष सुमन।
देश में में आरक्षण पर फिर बड़ी बहस छिड़ गई है। हम (से) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री डॉ. संतोष सुमन ने कहा है कि अगर सबसे वंचित तबकों को न्याय दिलाने के लिए जरूरत पड़ी तो हम जैसे लोग आरक्षण छोड़ने को भी तैयार हैं।
संतोष सुमन ने SC-ST आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण और समीक्षा की मांग उठाई है। उन्होंने कहा - "आरक्षण की समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं है। इसका मतलब है कि 79 साल बाद ये देखना कि आरक्षण का लाभ किसे मिला और कौन आज भी वंचित है।"*
*उनके 3 बड़े तर्क:*
1. दलित समाज एक जैसा नहीं: कुछ जातियां लगातार आरक्षण का ज्यादा लाभ लेकर आगे निकल गईं, जबकि कई जातियां आज भी बेहद पीछे हैं। इसलिए सबसे पीछे वालों तक मौका पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण क्यों नहीं?
2. पहले भी उदाहरण है: सामान्य वर्ग में EWS कोटा और पिछड़ों में पिछड़ा-अतिपिछड़ा का अलग बंटवारा पहले से है। उसी तरह दलितों में भी सबसे वंचित के लिए अलग व्यवस्था होनी चाहिए।
3. चिराग से अलग स्टैंड: उन्होंने चिराग पासवान से भी अपील की कि वो आगे बढ़ गए हैं, अब पीछे वालों को मौका दिलाने पर अपना स्पष्ट रुख रखें। चिराग ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि उन्हें आरक्षण की समीक्षा भी मंजूर नहीं।
संतोष सुमन ने कहा कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट के SC-ST में कोटा के अंदर कोटा (उप-वर्गीकरण) वाले फैसले का पहले भी समर्थन करती थी और आज भी करती है। असली सामाजिक न्याय तभी है जब आरक्षण रहे और उसका लाभ सबसे वंचित तक पहुंचे।
इस बयान को बिहार की सियासत में बड़ा माना जा रहा है क्योंकि संतोष खुद दलित समाज से आते हैं और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बेटे हैं।