
आज पूरा बिहार भरत भूषण तिवारी के लिए रो रहा है,ये चाचा जी पासवान हैं इनके आँखों से आँसू रुक नहीं रहे,क्योंकि उनके लिए भरत भूषण तिवारी कोई “जाति” नहीं थे सहारा थे, उम्मीद थे,आवाज़ थे......!
जिस इंसान के लिए आज दलित, पिछड़ा, गरीब और वंचित समाज फूट-फूट कर रो रहा है,उसने कभी लोगों का सरनेम नहीं देखा, दर्द देखा था,किसी के घर अंधेरा था......!
तो बिजली के लिए लड़ गए,किसी की राह टूटी थी तो सड़क के लिए भिड़ गए, किसी का गांव गंगा कटाव और कीचड़ में डूब रहा था तो SDM के दफ्तर तक जा पहुंचे.......!
और कहते हैं,बस यही “गुनाह” भारी पड़ गया,मिट्टी डलवाने की मांग को सत्ता के अहंकार ने अपनी तौहीन समझ लिया,फिर सिस्टम ने मिलकर उस आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया…..!
ज़रा उन घरों में जाकर देखो जहां चूल्हा जलने लगा,जहां पहली बार सड़क पहुंची,जहां बिजली का बल्ब जला,वहां रोने वाले सबसे ज्यादा दलित हैं,पिछड़े हैं,गरीब हैं,वंचित हैं.....!
क्योंकि भरत तिवारी उनके लिए नेता नहीं थे, उनके हिस्से का इंसाफ थे,और सच यही है जाति पर राजनीति करने वाले बहुत मिल जाएंगे,
लेकिन दूसरों के हक़ के लिए......!
जान देने वाले लोग सदियों में पैदा होते हैं.......!