
प्रेस वार्ता या एकतरफा संवाद? सवालों से इतना डर क्यों?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की मौजूदगी में प्रेस वार्ता बुलाई गई। मंच पर बातें हुईं, दावे हुए, लेकिन जब पत्रकारों के सवालों की बारी आई तो मुख्यमंत्री उठकर चले गए।
एक महिला पत्रकार ने सवाल पूछने की हिम्मत की—लेकिन सवाल का जवाब देने के बजाय मुख्यमंत्री का वहां से चले जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सिर्फ तारीफ करना नहीं, सवाल पूछना भी है।
अगर सत्ता से सवाल पूछना अपराध है, तो फिर प्रेस वार्ता किसलिए?
और सबसे गंभीर सवाल तो इसके बाद उठता है—क्या उस महिला पत्रकार को सवाल पूछने की कीमत अपनी नौकरी और कथित धमकियों के रूप में चुकानी पड़ रही है? अगर ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ एक पत्रकार का मामला नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की आवाज पर बड़ा सवाल है।
मुख्यमंत्री जी से सवाल है—
अगर सवालों का सामना नहीं करना था, तो प्रेस वार्ता बुलाई ही क्यों?
और अगर पत्रकार सवाल नहीं पूछ सकता, तो फिर उसे प्रेस वार्ता में बुलाया क्यों गया?
सत्ता को सवालों से डर नहीं, सवालों का जवाब देने का साहस दिखाना चाहिए।
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