
"सोफे पर बैठा 'अहंकार', सामने खड़ा 'लाचार प्रशासन'—यह कौन सा लोकतंत्र है?"
प्रशासन में नियमों और मर्यादाओं की एक तय व्यवस्था होती है, जिसे ‘प्रोटोकॉल’ कहा जाता है। संवैधानिक पदों और प्रशासनिक व्यवस्था के तहत जिले का कलेक्टर शासन का सर्वोच्च कार्यकारी अधिकारी होता है, जबकि किसी राजनीतिक दल का जिलाध्यक्ष एक संगठनात्मक पद होता है, न कि कोई संवैधानिक या शासकीय पद।
किसी सरकारी बैठक या आधिकारिक मुलाकात में यदि प्रशासनिक प्रमुख (कलेक्टर) खड़ा रहे और गैर-संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति सोफे पर आसीन हों, तो यह प्रशासनिक मर्यादा और पद गरिमा के संतुलन पर सवाल खड़े करता है।
"अंधेर नगरी चौपट राजा!
जहाँ पद की गरिमा और प्रशासनिक प्रोटोकॉल को ताक पर रख दिया जाए, वहाँ जिले के सर्वोच्च अधिकारी का खड़ा रहना और संगठनात्मक अध्यक्ष का सोफे पर बैठना यह साफ दर्शाता है कि व्यवस्था में *'चिराग तले अंधेरा'* छाया हुआ है। जिस कलेक्टर के कंधों पर पूरे जिले की जिम्मेदारी है, उनका इस तरह खड़े रहना केवल एक अधिकारी का नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था के सम्मान का अनादर है।"
जिस दफ्तर में संविधान और नियमों की तख्तियां टंगी होनी चाहिए, वहां *चापलूसी का शामियाना सजा* हुआ है। जो जिलाध्यक्ष बिना किसी संवैधानिक जनादेश के महज एक संगठन का पर्चा थामे घूमते हैं, वो सोफे पर नवाबों की तरह पैंतरा मारे बैठे हैं; और जिनके कंधों पर पूरे जिले के शासन की जिम्मेदारी है, वे कलेक्टर साहब फरमान सुनने के लिए हाथ बांधे खड़े हैं!
"ना खुदा ही मिला ना विसाले सनम, ना इधर के रहे ना उधर के रहे!"
राजनीतिक रसूख दिखाने की इस होड़ में जिलाध्यक्ष ने अपनी बची-कुची गरिमा भी गंवा दी। जनता सब देख रही है कि कैसे एक गैर-संवैधानिक पद की भूख को शांत करने के लिए प्रशासनिक मर्यादा की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यह तस्वीर जिलाध्यक्ष की पावर नहीं, बल्कि उनकी 'सत्ता की भूख और पद की कुंठा' को सरेआम बेपर्द करती है। जब प्रशासनिक प्रमुख को खड़ा रखकर कोई खुद को 'राजा' समझने की भूल करे, तो इसे सियासत का रुतबा नहीं, बल्कि 'अल्पज्ञान और घमंड का तमाशा' कहते हैं।
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