
प्रेस विज्ञप्ति 419, दिनांक 02.06.2026 किशनगंज सदर अस्पताल में उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष निगरानी और उपचार की व्यवस्था
किशनगंज, 02 जून।
गर्भावस्था के दौरान मां और गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए नियमित जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई बार कुछ गंभीर बीमारियां बिना स्पष्ट लक्षणों के धीरे-धीरे विकसित होती हैं और प्रसव के समय जानलेवा स्थिति पैदा कर देती हैं। ऐसी ही एक गंभीर समस्या है प्री-एक्लेंपसिया, जिसे विशेषज्ञ गर्भावस्था का "साइलेंट किलर" मानते हैं। समय पर पहचान और उपचार नहीं मिलने पर यह बीमारी मां और शिशु दोनों के जीवन को खतरे में डाल सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नियमित प्रसव पूर्व जांच के माध्यम से इसकी पहचान कर सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित किया जा सकता है।
मातृ मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण है प्री-एक्लेंपसिया
सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने बताया कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में प्री-एक्लेंपसिया एक गंभीर चुनौती है। विभिन्न चिकित्सा अध्ययनों के अनुसार अत्यधिक रक्तस्राव और संक्रमण के बाद मातृ मृत्यु का तीसरा बड़ा कारण प्री-एक्लेंपसिया है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भवती महिला का रक्तचाप असामान्य रूप से बढ़ जाता है और शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि समय पर पहचान और उपचार से अधिकांश मामलों में गंभीर जटिलताओं को रोका जा सकता है।
प्रेग्नेंसी में ‘साइलेंट किलर’ की तरह करता है हमला
सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. अनवर हुसैन ने कहा कि प्री-एक्लेंपसिया की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण स्पष्ट नहीं होते। कई गर्भवती महिलाओं को तब तक इसकी जानकारी नहीं मिलती जब तक नियमित जांच में रक्तचाप बढ़ा हुआ नहीं पाया जाता। यही कारण है कि इसे "साइलेंट किलर" कहा जाता है। उन्होंने बताया कि प्रत्येक गर्भवती महिला को कम से कम चार प्रसव पूर्व जांच अवश्य करानी चाहिए, ताकि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था की पहचान समय रहते हो सके।
20 सप्ताह के बाद दिख सकते हैं चेतावनी संकेत
महिला चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. रिजवाना तबस्सुम ने बताया कि गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद यदि रक्तचाप बढ़ जाए और पेशाब में प्रोटीन की मात्रा मिलने लगे तो यह प्री-एक्लेंपसिया का संकेत हो सकता है। इसके अलावा हाथ, पैर और चेहरे पर अत्यधिक सूजन, लगातार सिरदर्द, आंखों के सामने धुंधलापन, चमक दिखाई देना, बेचैनी और पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि इन संकेतों को सामान्य गर्भावस्था की समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
प्री-एक्लेंपसिया से एक्लेंपसिया और कोमा तक का खतरा
डॉ. रिजवाना तबस्सुम ने बताया कि यदि प्री-एक्लेंपसिया का समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो यह एक्लेंपसिया में बदल सकता है। इस अवस्था में गर्भवती महिला को दौरे पड़ने लगते हैं, मस्तिष्क, किडनी और लीवर प्रभावित हो सकते हैं तथा कोमा जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कई मामलों में समय पर उपचार नहीं मिलने पर मां और गर्भस्थ शिशु दोनों की मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि किसी भी चेतावनी संकेत के दिखते ही तुरंत अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए।
सदर अस्पताल में उपलब्ध हैं विशेष जांच और उपचार सुविधाएं
सदर अस्पताल उपाधीक्षक डॉ अनवर हुसैन ने बताया कि सदर अस्पताल में गर्भवती महिलाओं के लिए नियमित रक्तचाप जांच, हीमोग्लोबिन, शुगर, थायरॉयड, एचआईवी, हेपेटाइटिस सहित अन्य आवश्यक जांचों की सुविधा उपलब्ध है। उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं की विशेष पहचान कर उनकी लगातार निगरानी की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ चिकित्सकों की देखरेख में भर्ती कर उपचार और सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था भी की जाती है। अस्पताल में आपातकालीन प्रसूति सेवाएं भी चौबीसों घंटे उपलब्ध हैं।
नियमित जांच और संतुलित जीवनशैली है सबसे बड़ा बचाव
महिला चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. रिजवाना तबस्सुम ने गर्भवती महिलाओं को संतुलित एवं पौष्टिक आहार लेने, नमक का सीमित सेवन करने, तनाव से दूर रहने, पर्याप्त आराम करने और चिकित्सक द्वारा बताई गई दवाओं का नियमित सेवन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि गर्भावस्था के दौरान कम से कम चार प्रसव पूर्व जांच कराना प्रत्येक महिला के लिए आवश्यक है। नियमित जांच और समय पर उपचार ही प्री-एक्लेंपसिया जैसी गंभीर समस्या से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है तथा सुरक्षित मातृत्व की मजबूत आधारशिला भी। #viralpost #viralreelschallenge #viralchallenge #newyork #2026Goals #Kishanganj #DM #allflowers
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