
"गोली चलाने वाले को फांसी, पूरी टीम को उम्रकैद" — पूर्व डीजीपी की चेतावनी से हिली सम्राट सरकार की 'खुली छूट' नीति
बिहार में 'खुली छूट' का नशा अब पुलिस महकमे पर ही भारी पड़ने वाला है — और यह चेतावनी किसी विपक्षी नेता की नहीं, बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद की है।
क्या कहा पूर्व डीजीपी ने?
सम्राट चौधरी सरकार द्वारा पुलिस को दी गई "खुली छूट" पर पूर्व डीजीपी अभयानंद ने सीधा और तीखा सवाल खड़ा किया है। उनकी चेतावनी साफ है —
- यह 'गैर-कानूनी छूट' अगर कानून से हटकर इस्तेमाल हुई, तो गलतियां तय हैं।
- कोई भी एनकाउंटर फर्जी साबित हुआ, तो ट्रायल होगा — गोली चलाने वाले को फांसी और मौके पर मौजूद पूरी टीम को उम्रकैद तक हो सकती है।
- और सबसे बड़ी बात — जब पुलिसकर्मी इस गैर-कानूनी छूट के भरोसे फंसेंगे, तो उन्हें बचाने सरकार या कोई अधिकारी आगे नहीं आएगा।
यानी मुख्यमंत्री मंच से वाहवाही लूट लेंगे, और जेल की सलाखों के पीछे जाएगा वर्दी पहनने वाला सिपाही।
यह चेतावनी हवा में नहीं है
यह कोई काल्पनिक डर नहीं — भोजपुर का ताज़ा मामला सामने है। 17 जून को शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी नामक युवक एनकाउंटर में मारा गया। पुलिस का दावा है कि उसने फायरिंग की, परिवार का आरोप है कि सरेंडर के बाद भी गोली मारी गई। मामला इतना गरमाया कि तीन-चार पुलिसकर्मी सस्पेंड करने पड़े और मुख्यमंत्री को न्यायिक जांच का एलान करना पड़ा।
और सबसे चौंकाने वाली बात — सवाल विपक्ष ने नहीं, खुद बीजेपी-एनडीए के अपने नेताओं और मंत्रियों ने उठाए हैं —
- कृषि मंत्री विजय सिन्हा ने इस घटना को खुद "दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण" बताते हुए माना कि प्रशासन की ओर से लापरवाही हुई है।
- शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का बयान तो और भी चौंकाने वाला है — उन्होंने कहा कि पुलिस को कार्रवाई से पहले आरोपी का आपराधिक इतिहास जांचना चाहिए था, और पूरा एनकाउंटर करने के बजाय "हाफ एनकाउंटर" होना चाहिए था।
- पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने इसे "लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला" बताते हुए केंद्रीय गृह मंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है।
जब भाजपा कृषि मंत्री खुद "लापरवाही" मान लें और शिक्षा मंत्री खुद कह दें कि एनकाउंटर "हाफ" होना चाहिए था था — तो समझ लीजिए, "खुली छूट" अब सरकार के अपने घर में आग लगा चुकी है।
असली सवाल यह है
- मंच से छूट देने वाले मुख्यमंत्री, क्या जिम्मेदारी लेंगे जब मामला अदालत में जाएगा?
- जब खुद मंत्री विजय सिन्हा "लापरवाही" स्वीकार कर रहे हैं, तो सज़ा सिर्फ निचले स्तर के सिपाहियों को क्यों?
- शिक्षा मंत्री "हाफ एनकाउंटर" बोल गए — तो क्या सरकार खुद मान रही है कि यह एनकाउंटर जरूरत से ज्यादा था?
- आम सिपाही, जो आदेश मानकर ट्रिगर दबाएगा, क्या वही अकेला कानून के कठघरे में खड़ा होगा?
सत्ता की सियासत और वर्दी की कुर्बानी
सम्राट चौधरी सरकार "सुशासन" का नारा देकर पुलिस को मैदान में उतार तो रही है, लेकिन कानून की किताब में कोई "खुली छूट" नाम का प्रावधान नहीं होता। संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश आज भी हर एनकाउंटर पर जांच अनिवार्य करते हैं। नतीजा — मंच पर तालियां सरकार बटोरेगी, लेकिन ट्रायल कोर्ट में अकेला खड़ा होगा वर्दीधारी सिपाही।
बिहार की जनता और पुलिसकर्मी दोनों को यह समझना होगा — "खुली छूट" का मतलब कानून से ऊपर होना नहीं है। यह एक खतरनाक राजनीतिक जुमला है, जिसकी कीमत वर्दी पहनने वाले गरीब घर के जवान चुकाएंगे, सत्ता के गलियारों में बैठे लोग नहीं।
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