सोचिए, अगर भरत भूषण तिवारी की जगह कोई और उपनाम होता पासवान,पटेल,कुशवाहा,मांझी या ख़ान तो क्या अब तक राजनीति खामोश रहती......?
क्या तब नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं होती?क्या तब न्याय की माँग में बयानबाज़ी नहीं होती?क्या तब टीवी डिबेट्स और सोशल मीडिया पर तूफ़ान नहीं उठता....?
लेकिन यहाँ एक गरीब,समाजसेवी और अपने लोगों की लड़ाई लड़ने वाले युवक की मौत हुई,और सन्नाटा पसरा है,अगर भरत कोई दुर्दांत अपराधी होते,हिस्ट्रीशीटर होते,निर्दोषों के हत्यारे होते......!
तो शायद इतना दर्द और आक्रोश नहीं होता,लेकिन सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि जिस व्यक्ति को मानसिक रूप से परेशान बताया गया, जिसने आत्मसमर्पण कर दिया था......!
उसी का “एनकाउंटर” कर दिया गया,मुद्दा सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है,मुद्दा यह है कि क्या इस देश में इंसाफ भी जाति,पहचान और राजनीतिक लाभ देखकर तय होगा.......?