
एक सवाल जिसने बचा ली दो जिंदगिया,भारत में एनीमिया की चुनौती और किशनगंज की नई उम्मीद
प्रेस विज्ञप्ति 500,आज दिनांक 24.06.2026
किशनगंज जिला अन्तर्गत गर्भावस्था के दौरान खून की कमी केवल एक चिकित्सीय समस्या नहीं, बल्कि मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के जीवन से जुड़ा गंभीर विषय है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार देश की 52.2 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं, जबकि बिहार में यह आंकड़ा लगभग 63 प्रतिशत है। ऐसे समय में आकांक्षी जिला किशनगंज में समय पर जांच, सामुदायिक जागरूकता और एफसीएम थेरेपी जैसी सेवाएं सुरक्षित मातृत्व की दिशा में नई उम्मीद बन रही हैं।इसी बीच जिले में चल रहा DABS-I (डाइट एंड बायो मेकर सर्वे ऑफ़ इंडिया -1 ) सर्वेक्षण भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।आईसीएम् आर – एनआईएन की टीम जिले के चावल-प्रधान आहार और रक्त नमूनों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर रही है ताकि आयरन, जिंक, विटामिन बी 12 समेत सूक्ष्म पोषक तत्वों की वास्तविक कमी का आकलन किया जा सके। इस अध्ययन के आधार पर स्कूलों के मिड-डे मील, आंगनबाड़ी सेवाओं और जिला स्तरीय पोषण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।
जब कमजोरी को सामान्य समझना पड़ने लगा भारी
टेढ़ागाछ प्रखंड की गर्भवती महिला नेहा (परिवर्तित नाम) लगातार चक्कर, अत्यधिक थकान और सांस फूलने की समस्या से परेशान थीं। उन्होंने इसे गर्भावस्था की सामान्य स्थिति मानकर नजरअंदाज किया। उन्हें अंदाजा नहीं था कि उनके शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर खतरनाक रूप से घट चुका है।नियमित गृह भ्रमण के दौरान आशा कार्यकर्ता रीता देवी ने नेहा से पूछा, “क्या पहली एएनसी जांच करवाई है? नकारात्मक जवाब मिलने पर उन्होंने परिवार को प्रसवपूर्व जांच के महत्व के बारे में समझाया और स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस पर आने के लिए प्रेरित किया।निर्धारित तिथि पर नेहा आंगनबाड़ी केंद्र पहुंचीं, जहां एएनएम सूर्यलता कुमारी ने उनकी नियमित जांच की। शारीरिक स्थिति सामान्य न लगने पर उन्हें तत्काल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र टेढ़ागाछ रेफर किया गया।
समय पर पहचान और एफसीएम थेरेपी से मिली नई जिंदगी
जांच में नेहा का हीमोग्लोबिन स्तर केवल 6.1 ग्राम प्रति डेसीलीटर पाया गया। प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. प्रमोद कुमार ने इसे गंभीर आयरन की कमी से होने वाला एनीमिया बताते हुए एफसीएम थेरेपी देने का निर्णय लिया।नेहा बताती हैं की शुरुआत में डर लग रहा था, लेकिन डॉक्टर, आशा दीदी और एएनएम दीदी ने समझाया कि यह उपचार मेरे और मेरे बच्चे दोनों के लिए जरूरी है। थेरेपी के बाद मेरी कमजोरी कम होने लगी और अब मुझे काफी बेहतर महसूस होता है।
दवा के साथ पोषण और निगरानी भी बनी सफलता की कुंजी
महिला चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. शबनम यस्मिन बताती हैं कि एनीमिया का उपचार केवल दवा तक सीमित नहीं है। नेहा को नियमित आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां, संतुलित आहार, हरी पत्तेदार सब्जियां, दाल, चना, गुड़, अंकुरित अनाज और समय पर एएनसी जांच की सलाह दी गई। आशा और एएनएम द्वारा लगातार फॉलो-अप से उपचार का लाभ और अधिक प्रभावी हुआ।
समय पर जांच से टल सकती हैं गंभीर जटिलताएं
जिला एमसीएच नोडल पदाधिकारी विश्वजीत कुमार कहते हैं कि गर्भावस्था में गंभीर एनीमिया मातृ मृत्यु, समयपूर्व प्रसव, कम वजन वाले शिशु और अन्य जटिलताओं का कारण बन सकता है। इसलिए पहली तिमाही में एएनसी जांच, हीमोग्लोबिन परीक्षण और नियमित फॉलो-अप बेहद आवश्यक हैं। जरूरत पड़ने पर एफसीएम जैसी आधुनिक आयरन थेरेपी सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित हो रही है।
सामुदायिक भागीदारी से मजबूत होगा सुरक्षित मातृत्व अभियान
सिविल सर्जन डॉ. राज कुमार चौधरी ने बताया कि एनीमिया के खिलाफ लड़ाई केवल अस्पतालों की नहीं बल्कि पूरे समुदाय की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य विभाग नियमित एएनसी, आयरन-फोलिक एसिड अनुपूरण, पोषण परामर्श और आवश्यकता पड़ने पर एफसीएम थेरेपी के माध्यम से सुरक्षित मातृत्व को बढ़ावा दे रहा है। उन्होंने जानकारी दी कि किशनगंज जिले में अब तक 68 गर्भवती महिलाओं को एफसीएम थेरेपी उपलब्ध कराई जा चुकी है, जिससे गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं को समय पर उपचार मिला है।
अब नेहा खुद बन गई हैं जागरूकता की आवाज
आज नेहा अपने गांव की अन्य महिलाओं को समय पर जांच कराने के लिए प्रेरित करती हैं। वह कहती हैं की अगर उस दिन आशा दीदी मेरे घर नहीं आतीं, एएनएम जांच नहीं करतीं और डॉक्टर समय पर इलाज नहीं देते, तो शायद मुझे अपने शरीर में खून की कमी का पता ही नहीं चलता। अब मैं हर गर्भवती महिला से कहती हूं कि कमजोरी को सामान्य न समझें, एक छोटी-सी जांच मां और बच्चे दोनों की जिंदगी बचा सकती है। दरअसल, यह केवल एक महिला की कहानी नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य व्यवस्था की मिसाल है जहां आशा का गृह भ्रमण, एएनएम की सतर्कता, समय पर रेफरल, एफसीएम थेरेपी, पोषण परामर्श और सामुदायिक सहयोग मिलकर संभावित जोखिम को सुरक्षित मातृत्व में बदल देते हैं।
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