
सारण शिक्षक सीट: इस बार सिर्फ चुनाव नहीं, राजनीतिक विरासत और बगावत की भी परीक्षा
बिहार विधान परिषद् के सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इस बार महज 18 उम्मीदवारों के बीच वोटों की लड़ाई नहीं है। यह राजनीतिक विरासत, बदलते दलगत समीकरण, व्यक्तिगत प्रभाव और गठबंधन के भीतर उभरी असहमति की भी परीक्षा है। कहीं दशकों पुरानी वामपंथी राजनीति की विरासत है, तो कहीं मौजूदा विधान पार्षद के सामने अपनी सीट बचाने की चुनौती। कहीं राजनीतिक पाला बदलकर नई जमीन तलाशने की कोशिश है, तो कहीं टिकट बंटवारे से उपजी नाराजगी निर्दलीय उम्मीदवारी के रूप में सामने आई है।
नामांकन पत्रों की संवीक्षा में 19 उम्मीदवारों के पर्चे वैध पाए गए थे। 09 अक्टूबर को नाम वापसी की समय-सीमा समाप्त होने के बाद जयराम राय की उम्मीदवारी वापस लेने से कुल 18 उम्मीदवार मैदान में रह गए। इसके बाद चुनावी घटनाक्रम में एक और अहम मोड़ आया, जब निर्दलीय उम्मीदवार रामपुकार सिन्हा ने एनडीए प्रत्याशी आनंद पुष्कर को समर्थन देने की घोषणा की। हालांकि, समर्थन की घोषणा और औपचारिक रूप से नाम वापस लेने के बीच अंतर है। 23 अक्टूबर को शिक्षक मतदाता अपने प्रतिनिधि का फैसला करेंगे। लेकिन इस चुनाव की असली कहानी उम्मीदवारों की संख्या से कहीं आगे है।
केदारनाथ पाण्डेय की विरासत और वामपंथ की बदलती जमीन
एक समय था, जब सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की पहचान शिक्षक आंदोलन और वामपंथी राजनीति से गहराई से जुड़ी थी। केदारनाथ पाण्डेय इस राजनीतिक परंपरा के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे। लंबे समय तक इस सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले पाण्डेय ने शिक्षक राजनीति में वामपंथ की मजबूत पहचान बनाई थी।
2023 में उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव ने इस सीट के राजनीतिक समीकरण को नया मोड़ दिया। उस चुनाव में जन सुराज के आफाक अहमद ने जीत दर्ज की। इस परिणाम के साथ ही दशकों से चली आ रही राजनीतिक परंपरा के बीच एक नया चेहरा उभरकर सामने आया।
इस बार की एक बड़ी राजनीतिक विडंबना यह है कि जिस कम्युनिस्ट राजनीति का इस सीट पर लंबे समय तक प्रभाव रहा, उसके नाम पर चुनाव मैदान में कोई आधिकारिक उम्मीदवार नहीं है।
हालांकि, वामपंथी राजनीति से जुड़े रहे चेहरे अलग-अलग रास्तों पर दिखाई दे रहे हैं। विद्या सागर विद्यार्थी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं, जबकि आनंद पुष्कर, जो पिछले उपचुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे, अब जदयू के टिकट पर एनडीए के आधिकारिक प्रत्याशी हैं। दूसरी ओर, महागठबंधन की ओर से राजद ने जयराम यादव को उम्मीदवार बनाया है।
यह बदलाव एक अहम सवाल खड़ा करता है - क्या किसी सीट की दशकों पुरानी राजनीतिक विरासत, आधिकारिक पार्टी उम्मीदवार की गैरमौजूदगी में भी अपना प्रभाव बनाए रख सकती है?
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Chapra, Saran | Oct 22, 2026