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Agriculture Observer

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चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच सरकार के सामने अब एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है-गन्ने से चीनी बनाई जाए या एथनॉल? अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार गन्ने से एथनॉल उत्पादन को सीमित करने और एथनॉल के लिए मक्का तथा चावल जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है। अगर यह फैसला लागू होता है तो इसका असर केवल चीनी की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गन्ना किसानों, चीनी मिलों, एथनॉल उद्योग और देश की कृषि नीति पर भी पड़ेगा।

सबसे पहले उस जमीन की बात करनी जरूरी है जहां इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है। किसान महीनों तक गन्ने की फसल तैयार करता है। खेत में बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी, कीटनाशक और कटाई-ढुलाई पर खर्च करता है। इसके बाद गन्ना चीनी मिल तक पहुंचता है। किसान के लिए यह केवल एक फसल नहीं, बल्कि साल भर की आय का एक बड़ा आधार है। इसलिए जब सरकार गन्ने के उपयोग को लेकर कोई बड़ा नीतिगत बदलाव करती है तो उसका असर खेत तक पहुंचना स्वाभाविक है।

पिछले कुछ वर्षों में गन्ने से एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति को ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने के बड़े लक्ष्य से जोड़ा गया। इसका तर्क भी मजबूत था। भारत पेट्रोलियम ईंधन के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। अगर देश में उत्पादित एथनॉल को पेट्रोल में मिलाया जाए तो पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घट सकती है, विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और किसानों के लिए गन्ने तथा अन्य फसलों से अतिरिक्त बाजार तैयार हो सकता है।

लेकिन अब तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आ रहा है। अगर गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का एक हिस्सा एथनॉल की ओर जाता है तो चीनी उत्पादन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। बाजार में जब आपूर्ति घटती है और मांग बनी रहती है तो कीमत बढ़ने का दबाव बनता है। अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक महीने में चीनी की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यही बढ़ती कीमतें सरकार को अपनी नीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर रही हैं।

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चीनी की कीमत नियंत्रित करने के लिए गन्ने से एथनॉल उत्पादन को रोकना या सीमित करना ही स्थायी समाधान है? या फिर सरकार को चीनी, एथनॉल और किसान आय-तीनों के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनानी चाहिए? क्योंकि अगर आज चीनी की कीमत बढ़ रही है और हम एथनॉल कम कर देते हैं, तो इससे तत्काल बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ सकती है, लेकिन इससे एथनॉल उद्योग और ऊर्जा नीति पर क्या असर पड़ेगा, इस सवाल का जवाब भी जरूरी है।

सरकार जिस दूसरे रास्ते पर विचार कर रही है, उसमें मक्का और चावल से एथनॉल बनाने की संभावना महत्वपूर्ण है। मक्का पहले से ही एथनॉल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण फीडस्टॉक बन चुका है। अगर मक्का से बड़े पैमाने पर एथनॉल उत्पादन बढ़ता है तो किसानों के लिए मक्का का बाजार मजबूत हो सकता है। लेकिन यहां भी एक सवाल है-क्या मक्का की इतनी अतिरिक्त उपलब्धता है कि खाद्य और चारे की जरूरत पूरी करने के बाद एथनॉल उद्योग की मांग भी पूरी की जा सके?

भारत में मक्का केवल एथनॉल के लिए इस्तेमाल नहीं होता। पोल्ट्री उद्योग, पशु आहार, स्टार्च उद्योग और खाद्य प्रसंस्करण में भी इसकी बड़ी मांग है। यदि एथनॉल उद्योग अचानक मक्का की बड़ी मात्रा खरीदने लगे तो मक्का की कीमत बढ़ सकती है। इससे मक्का किसान को लाभ मिल सकता है, लेकिन पोल्ट्री और पशुपालन की लागत भी बढ़ सकती है। अंततः उसका असर अंडे, चिकन, दूध और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। यानी एक फसल को दूसरे स्रोत से बदल देना समस्या का अंत नहीं है; केवल समस्या का स्थान बदल सकता है।

चावल के मामले में स्थिति और भी संवेदनशील है। अगर बड़ी मात्रा में चावल को एथनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जाता है तो खाद्य सुरक्षा का सवाल उठ सकता है। भारत में करोड़ों लोगों के लिए चावल मुख्य खाद्यान्न है। इसलिए खाद्य उपयोग और औद्योगिक उपयोग के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। एथनॉल नीति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसमें ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने के प्रयास में खाद्य सुरक्षा पर दबाव आने लगे।

गन्ने के मामले में भी किसान को इस बहस के केंद्र में रखना जरूरी है। जब सरकार गन्ने से एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देती है तो चीनी मिलों के पास गन्ने से वैकल्पिक उत्पाद और राजस्व का एक अतिरिक्त रास्ता खुलता है। इससे मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है और किसानों के गन्ना भुगतान की क्षमता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन अगर अचानक एथनॉल उत्पादन पर प्रतिबंध या सीमा लगा दी जाती है तो चीनी मिलों की अर्थव्यवस्था पर उसका असर कितना होगा, यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान को नीतिगत अनिश्चितता का सबसे ज्यादा नुकसान होता है। किसान आज गन्ना इसलिए लगाता है क्योंकि उसे लगता है कि अगले 10 से 12 महीने बाद उसकी फसल का बाजार उपलब्ध रहेगा। अगर नीति बार-बार बदलती है-कभी चीनी उत्पादन बढ़ाने के लिए एथनॉल सीमित, कभी एथनॉल लक्ष्य पूरा करने के लिए गन्ने से एथनॉल बढ़ाना-तो किसान के लिए फसल योजना बनाना मुश्किल हो जाता है।

यहां सरकार को एक दीर्घकालीन और पारदर्शी नीति की जरूरत है। अगर चीनी की कीमतें बढ़ रही हैं तो केवल एथनॉल को जिम्मेदार मानने के बजाय चीनी के पूरे बाजार की समीक्षा होनी चाहिए। उत्पादन कितना है, मिलों के पास कितना स्टॉक है, घरेलू खपत कितनी है, निर्यात कितना हुआ है, किस स्तर पर स्टॉक उपलब्ध है और आने वाले महीनों में उत्पादन की संभावना कितनी है-इन सभी आंकड़ों के आधार पर फैसला होना चाहिए।

उपभोक्ता के लिए भी सस्ती चीनी जरूरी है। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि बहुत कम कीमत पर कृषि उत्पाद बेचने की नीति लंबे समय तक किसानों के हित में नहीं होती। अगर सरकार चीनी की कीमत कम रखने के लिए लगातार उद्योग पर दबाव डालती है और दूसरी तरफ किसान की लागत बढ़ती रहती है, तो भविष्य में किसान गन्ने से दूरी बना सकता है। इसलिए उपभोक्ता को राहत देने और किसान को उचित आय देने के बीच संतुलन जरूरी है।

एथनॉल नीति की सफलता का आकलन भी केवल पेट्रोल में मिश्रण के प्रतिशत से नहीं होना चाहिए। यह देखना होगा कि इससे किसानों को कितना लाभ मिला, चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति कितनी सुधरी, पेट्रोलियम आयात में कितनी बचत हुई, खाद्य कीमतों पर क्या प्रभाव पड़ा और देश के जल संसाधनों पर इसका कितना दबाव आया। क्योंकि गन्ना पानी की अधिक आवश्यकता वाली फसल है। अगर एथनॉल के लिए गन्ने का उत्पादन लगातार बढ़ता है तो पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में इसका प्रभाव अलग होगा और जल-संकट वाले क्षेत्रों में अलग।

इसी तरह मक्का आधारित एथनॉल को बढ़ावा देने से पहले यह देखना जरूरी है कि देश में मक्का उत्पादन को कितनी तेजी से बढ़ाया जा सकता है। केवल नीति बनाकर मांग पैदा कर देना पर्याप्त नहीं है। बीज, सिंचाई, उत्पादकता, भंडारण, मंडी, परिवहन और प्रसंस्करण की पूरी श्रृंखला तैयार करनी होगी। तभी किसान वास्तव में इसका लाभ उठा पाएगा।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सबक यही है कि कृषि नीति को एक फसल या एक उद्योग के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। गन्ना केवल चीनी नहीं है, चीनी मिल केवल चीनी नहीं बनाती और एथनॉल केवल ईंधन नहीं है। इसके पीछे किसान, मजदूर, मिल, ट्रांसपोर्टर, पेट्रोलियम कंपनियां, उपभोक्ता और सरकार-सभी जुड़े हुए हैं।

अगर सरकार गन्ने से एथनॉल उत्पादन को सीमित करने का फैसला करती है तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि एथनॉल के निर्धारित लक्ष्यों को किस तरह पूरा किया जाएगा। अगर मक्का और चावल से एथनॉल बढ़ाना है तो किसानों को कितनी अतिरिक्त मांग मिलेगी, किस कीमत पर खरीद होगी और खाद्य सुरक्षा को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा। और अगर चीनी की कीमतों को नियंत्रित करना है तो यह भी बताया जाना चाहिए कि किसानों और चीनी मिलों पर इसका बोझ कैसे नहीं डाला जाएगा।

किसानों के लिए सबसे जरूरी चीज केवल आज का भाव नहीं, बल्कि अगले कई वर्षों की नीति की स्पष्टता है। गन्ने का किसान तभी निवेश करेगा जब उसे भरोसा होगा कि सरकार की नीति अचानक नहीं बदलेगी। इसी तरह मक्का किसान भी तभी उत्पादन बढ़ाएगा जब उसे भरोसा होगा कि एथनॉल उद्योग की मांग लंबे समय तक बनी रहेगी।

इसलिए सरकार के सामने चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि चीनी सस्ती कैसे की जाए। असली चुनौती यह है कि चीनी की उपलब्धता, किसान की आय, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और उद्योग की आर्थिक स्थिरता-इन पांचों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। गन्ने से एथनॉल हटाकर मक्का और चावल की ओर जाना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मानना जल्दबाजी होगी।

किसान आज यह देख रहा है कि नीति किस दिशा में जाती है। चीनी महंगी होगी तो उपभोक्ता परेशान होगा, एथनॉल घटेगा तो ऊर्जा नीति प्रभावित होगी, मक्का की मांग अचानक बढ़ेगी तो दूसरी कृषि लागतें बढ़ सकती हैं और अगर चावल का औद्योगिक उपयोग बहुत बढ़ा तो खाद्य सुरक्षा पर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसलिए फैसला आंकड़ों, वैज्ञानिक अध्ययन और जमीन की वास्तविक परिस्थितियों को देखकर होना चाहिए, न कि केवल बाजार में आई एक महीने की तेजी देखकर।

आखिर में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि गन्ने से एथनॉल बनेगा या नहीं। सवाल यह है कि भारत अपनी कृषि अर्थव्यवस्था को ऐसी दिशा में कैसे ले जाए जहां किसान को स्थिर बाजार मिले, उपभोक्ता को उचित कीमत मिले, देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी हों और खाद्य सुरक्षा भी मजबूत बनी रहे। अगर सरकार यह संतुलन बना पाती है तभी एथनॉल नीति वास्तव में सफल मानी जाएगी। वरना एक समस्या को हल करने के प्रयास में दूसरी समस्या पैदा होने का खतरा हमेशा बना रहेगा।

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धान की फसल में इस समय सबसे महत्वपूर्ण अवस्था चल रही है। जिन किसानों ने समय से धान की रोपाई या बोनी की है, उनकी फसल लगभग 20 से 21 दिन की अवस्था में पहुंच चुकी है और खेत में कल्ले यानी कंसे तेजी से निकलने शुरू हो गए हैं। जिन किसानों ने देर से रोपाई या बोनी की है, उनकी फसल अगले 7 से 10 दिनों में इसी अवस्था में पहुंच जाएगी। यही वह समय है जब किसान को सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इसी अवधि में पौधे में कल्लों का फुटाव तेजी से होता है। अगर इस समय पोषण सही मिला तो अधिक स्वस्थ कल्ले बनेंगे, उन्हीं में अधिक प्रभावी बालियां आएंगी और आगे चलकर दानों की संख्या तथा उपज बढ़ाने में मदद मिलेगी।

धान में अधिक कल्ले प्राप्त करने के लिए सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात 20 से 21 दिन की अवस्था में दी जाने वाली पहली यूरिया की खुराक है। इस समय केवल पत्तियों का रंग देखकर यूरिया नहीं डालना चाहिए, बल्कि फसल की अवस्था को ध्यान में रखना चाहिए। दिए गए स्रोत के अनुसार सामान्य धान में इस अवस्था पर लगभग 40 से 50 किलोग्राम दानेदार यूरिया प्रति एकड़ देने की बात कही गई है। यहां दानेदार यूरिया की बात है, न कि पहली खुराक के रूप में नैनो यूरिया की। इसका कारण यह बताया गया है कि 20 से 21 दिन की अवस्था में खेत में पौधों की छतरी अभी पूरी तरह नहीं बनी होती और पौधों के बीच जमीन दिखाई देती है। ऐसी स्थिति में नैनो यूरिया का छिड़काव करने पर उसका कुछ हिस्सा पौधों तक पहुंचने के बजाय जमीन पर जा सकता है। इसलिए इस अवस्था पर दानेदार यूरिया को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।

अगर आपकी फसल हाइब्रिड धान की है, जैसे स्रोत में बताए गए हाइब्रिड उदाहरणों की तरह, तो सामान्य धान की तुलना में यूरिया की मात्रा लगभग 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की सलाह दी गई है। यानी जहां सामान्य फसल में 50 किलोग्राम यूरिया दिया जा रहा है, वहां हाइब्रिड फसल में लगभग 60 किलोग्राम तक की मात्रा की बात कही गई है। इसी तरह 40 किलोग्राम वाली मात्रा को बढ़ाकर लगभग 50 किलोग्राम किया जा सकता है। लेकिन यह बात विशेष रूप से हाइब्रिड धान की फसल के संदर्भ में है। किसान को अपनी फसल की अवस्था और पहले दी गई खाद को ध्यान में रखना चाहिए। बहुत जल्दी, यानी 15 दिन के आसपास ही भारी यूरिया देने से भी अपेक्षित कल्ले नहीं बन सकते और बहुत देर करने पर भी कल्ले निकलने की महत्वपूर्ण अवस्था प्रभावित हो सकती है।

पहली यूरिया की खुराक के साथ जिंक का महत्व भी बहुत ज्यादा बताया गया है। अगर खेत में जिंक यानी जस्ता की कमी है और किसान केवल यूरिया डालता रहता है तो पौधे को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता। जिंक पौधे की वृद्धि और कई महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। इसलिए यदि रोपाई या बोनी के समय जिंक नहीं दिया गया है तो 20 से 21 दिन की इस अवस्था में जिंक सल्फेट देने की सलाह दी गई है। 33 प्रतिशत जिंक वाले दानेदार जिंक सल्फेट की मात्रा लगभग 5 किलोग्राम प्रति एकड़ और 21 प्रतिशत जिंक वाले जिंक सल्फेट की मात्रा लगभग 10 किलोग्राम प्रति एकड़ बताई गई है। इसे दानेदार यूरिया के साथ मिलाकर खेत में देने का भी उल्लेख किया गया है।

जिंक का एक दूसरा विकल्प नैनो जिंक बताया गया है। यदि किसान तत्काल पत्तियों के माध्यम से जिंक की पूर्ति करना चाहता है तो नैनो जिंक का प्रयोग किया जा सकता है। दिए गए स्रोत में 1 मिलीलीटर नैनो जिंक प्रति लीटर पानी की दर बताई गई है। यानी 15 लीटर की टंकी में 15 मिलीलीटर और 20 लीटर की टंकी में 20 मिलीलीटर नैनो जिंक लिया जा सकता है। इस हिसाब से एक एकड़ में इस्तेमाल होने वाले पानी की मात्रा और उत्पाद के लेबल निर्देश को ध्यान में रखना जरूरी है। स्प्रे करते समय फ्लैट फैन नोजल का उपयोग करने की सलाह दी गई है ताकि घोल पत्तियों पर अच्छी तरह पहुंचे और अनावश्यक रूप से जमीन पर न गिरे।

स्रोत में जिंक को केवल कल्ले निकलने से ही नहीं बल्कि आगे दाने भरने की प्रक्रिया से भी जोड़ा गया है। बताया गया है कि धान की बाद की अवस्था में जिंक की कमी रहने पर बालियों में दानों का भराव प्रभावित हो सकता है और कुछ दाने कमजोर या खाली रह सकते हैं। इसी वजह से यदि किसान पहली खुराक के समय जिंक देने से चूक गया है तो बाद की अवस्था में भी इसकी पूर्ति पर ध्यान देने की बात कही गई है।

इसके बाद 35 से 40 दिन की अवस्था आती है। इस समय तक खेत में पर्याप्त कल्ले निकल चुके होते हैं और अब उन कल्लों को आगे बढ़ाकर प्रभावी बालियां प्राप्त करने की दिशा में काम करना होता है। इस अवस्था पर दूसरी यूरिया की खुराक देने की बात कही गई है, लेकिन पहली खुराक की तुलना में यह खुराक हल्की रखने पर जोर दिया गया है। स्रोत के अनुसार इस समय अत्यधिक यूरिया देने से पौधे का रंग जरूरत से ज्यादा गहरा हरा हो सकता है, पौधे में अत्यधिक नरम बढ़वार हो सकती है और माहू, तना छेदक तथा कुछ रोगों के प्रकोप का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए 35 से 40 दिन पर नाइट्रोजन की दूसरी खुराक को नियंत्रित रखना जरूरी बताया गया है।

इसी अवस्था में नैनो यूरिया के उपयोग की बात कही गई है। स्रोत के अनुसार पहली खुराक में दानेदार यूरिया देने के बाद 35 से 40 दिन की अवस्था में नैनो यूरिया का छिड़काव किया जा सकता है, क्योंकि इस समय तक पौधों की पत्तियां और छतरी काफी विकसित हो चुकी होती हैं। इससे पत्तियों के माध्यम से पोषक तत्व पहुंचाने का उद्देश्य बताया गया है। यहां भी किसान को अपने इस्तेमाल किए जा रहे उत्पाद के लेबल पर लिखी मात्रा के अनुसार ही नैनो यूरिया का प्रयोग करना चाहिए।

अगर किसान ने 20 से 21 दिन की अवस्था में जिंक नहीं दिया था तो 35 से 40 दिन पर जिंक की कमी की तत्काल पूर्ति के लिए पत्तियों पर नैनो जिंक देने की बात स्रोत में कही गई है। इस समय दानेदार जिंक सल्फेट को दोबारा खेत में डालने के बजाय पत्तियों के माध्यम से जिंक देने पर जोर दिया गया है। नैनो जिंक उपलब्ध न होने पर चिलेटेड जिंक का भी उल्लेख किया गया है। स्रोत के अनुसार लगभग 100 ग्राम चिलेटेड जिंक एक एकड़ में छिड़काव के लिए पर्याप्त बताया गया है। चिलेटेड जिंक में जिंक को ऐसी अवस्था में रखा जाता है जिससे पौधा उसे पत्तियों के माध्यम से आसानी से ग्रहण कर सके।

अब बात आती है गोभ या घुट की अवस्था की, जिसे धान की फसल में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय पौधे के अंदर बालियों का विकास हो रहा होता है और आगे दाने बनने की प्रक्रिया के लिए पोषण की जरूरत होती है। स्रोत में बताया गया है कि यदि इस अवस्था में पोटाश, जिंक और सल्फर की कमी हो जाए तो बालियों में दाने पूरी तरह नहीं भरते। ऊपर और नीचे के हिस्से में दाने कमजोर रह सकते हैं और किसान को ऐसी बालियां दिखाई दे सकती हैं जिनमें बीच-बीच में दाने हैं लेकिन पूरी बाली अच्छी तरह भरी हुई नहीं है।

इस अवस्था पर पोटाश के उपयोग पर विशेष जोर दिया गया है। स्रोत में गोभ की अवस्था में लगभग 15 से 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ देने की सलाह दी गई है। इसका उद्देश्य दानों के भराव में मदद करना और पौधे को मजबूती देना बताया गया है। इसी समय अनावश्यक यूरिया देने से बचने की सलाह दी गई है। स्रोत के अनुसार गोभ की अवस्था में यूरिया देने से पौधे में अनावश्यक हरापन और कोमल बढ़वार बढ़ सकती है तथा ब्लास्ट जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए इस अवस्था में जरूरत के अनुसार पोटाश और जिंक पर ध्यान देने की बात कही गई है।

धान में केवल यूरिया बढ़ाते जाना उपज बढ़ाने का रास्ता नहीं है। अगर किसान 20 से 21 दिन पर सही समय से नाइट्रोजन देता है, जिंक की कमी को पूरा करता है, 35 से 40 दिन पर दूसरी खुराक को नियंत्रित रखता है और गोभ की अवस्था में पोटाश की जरूरत पूरी करता है तो फसल में कल्ले, बालियां और दाने के विकास को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है। साथ ही खेत में पानी का प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है। खाद देने के बाद खेत की स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि पोषक तत्व पौधे को मिल सकें और जड़ों की सक्रियता बनी रहे।

किसान भाइयों, सबसे जरूरी बात यह है कि खेत में सिर्फ कल्लों की संख्या देखकर खुश नहीं होना है। हमारा लक्ष्य अधिक से अधिक स्वस्थ और प्रभावी कल्ले बनाना है, क्योंकि हर कल्ला जरूरी नहीं कि आगे चलकर प्रभावी बाली बने। अच्छी फसल में कल्ले मजबूत हों, उनमें बालियां अच्छी निकलें और बालियों में ऊपर से नीचे तक दाने अच्छी तरह भरें, तभी उपज का वजन बढ़ेगा। इसलिए 20 से 21 दिन, 35 से 40 दिन और गोभ की अवस्था को अलग-अलग समझकर खाद और पोषक तत्वों का प्रबंधन करना बहुत जरूरी है।

इस पूरे प्रबंधन में मुख्य रूप से पहली अवस्था पर दानेदार यूरिया लगभग 40 से 50 किलोग्राम प्रति एकड़, जिंक की कमी होने पर 33 प्रतिशत जिंक सल्फेट लगभग 5 किलोग्राम या 21 प्रतिशत जिंक सल्फेट लगभग 10 किलोग्राम प्रति एकड़, नैनो जिंक के लिए स्रोत में 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर, 35 से 40 दिन पर नैनो यूरिया का छिड़काव और गोभ की अवस्था में लगभग 15 से 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ की बात कही गई है। इन मात्राओं को फसल की अवस्था, उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार लागू करना चाहिए।

धान की अच्छी उपज के लिए किसान भाई एक बात हमेशा याद रखें कि खाद की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण उसका सही समय और सही संतुलन है। शुरुआत में कल्ले निकालने के लिए नाइट्रोजन और जिंक, बीच की अवस्था में नियंत्रित पोषण और गोभ की अवस्था में दाने भरने तथा पौधे को मजबूत रखने के लिए पोटाश और आवश्यक पोषक तत्वों पर ध्यान देना चाहिए। अगर किसान इन तीनों महत्वपूर्ण अवस्थाओं को सही तरीके से संभाल लेता है तो कम खर्च में फसल की उत्पादन क्षमता को बेहतर करने की दिशा में काम किया जा सकता है।
अगर आपने कभी घर पर किसी पौधे की टहनी से नया पौधा तैयार करने की कोशिश की है और टहनी सूख गई है, जड़ नहीं बनी या पूरी मेहनत बेकार हो गई, तो इसका एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि आपने कटिंग को सिर्फ मिट्टी में लगाकर छोड़ दिया। किसी भी टहनी से सफलतापूर्वक जड़ बनवाने के लिए केवल मिट्टी पर्याप्त नहीं होती। कटिंग को नमी, उचित वातावरण, संक्रमण से सुरक्षा और जड़ बनने के लिए अनुकूल परिस्थितियों की जरूरत होती है। अच्छी बात यह है कि इसे घर पर उपलब्ध कुछ सामान्य चीजों की मदद से काफी सरल तरीके से किया जा सकता है। हालांकि यह बात ध्यान रखना जरूरी है कि हर पौधे की शाखा एक जैसी आसानी से जड़ नहीं बनाती। अनार, अंजीर, अंगूर, गुलाब, बोगनवेलिया जैसे कई पौधों में कटिंग से पौधा तैयार करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, जबकि कुछ फलदार पौधों में सफलता दर कम भी हो सकती है।

सबसे पहले ऐसी शाखा का चुनाव करें जो स्वस्थ हो और जिस पौधे से आप कटिंग ले रहे हैं वह पहले से अच्छी तरह विकसित और उत्पादन देने वाला हो। यदि संभव हो तो ऐसी शाखा चुनें जिसमें बीमारी, कीट या सूखने के लक्षण न हों। शाखा की मोटाई लगभग पेंसिल के बराबर से लेकर उंगली जितनी हो सकती है। बहुत पतली, कमजोर और बिल्कुल नई हरी शाखा कई बार पर्याप्त ऊर्जा नहीं दे पाती, जबकि बहुत मोटी और अत्यधिक पुरानी लकड़ी वाली शाखा भी आसानी से जड़ नहीं बनाती। लगभग 10 से 20 सेंटीमीटर लंबी कटिंग कई पौधों में इस्तेमाल की जा सकती है, लेकिन वास्तविक लंबाई पौधे की प्रजाति और शाखा की स्थिति के अनुसार बदल सकती है।

कटिंग तैयार करते समय सबसे महत्वपूर्ण कामों में से एक है पत्तियों को कम करना। यदि पूरी शाखा पर बहुत सारी पत्तियां छोड़ दी जाएंगी तो कटिंग अपनी उपलब्ध ऊर्जा का बड़ा हिस्सा पत्तियों को जीवित रखने में खर्च करेगी और पानी की कमी भी तेजी से हो सकती है। इसलिए नीचे के हिस्से की अधिकांश पत्तियां हटा दें और ऊपर 1 से 3 स्वस्थ पत्तियां आवश्यकता के अनुसार रखी जा सकती हैं। अगर शाखा पर फल या फूल लगे हैं तो उन्हें भी हटा देना बेहतर होता है, क्योंकि जड़ बनने से पहले फल विकसित करने में पौधे की ऊर्जा खर्च होती है। स्रोत में अनार और एसरोल जैसी फलदार शाखाओं पर फल बने रहने का उदाहरण दिया गया है, लेकिन व्यावहारिक रूप से शुरुआती कटिंग में फल हटाने से नमी और ऊर्जा का दबाव कम किया जा सकता है।

अब कटिंग के निचले हिस्से को तैयार करना है। शाखा के निचले लगभग 2 से 5 सेंटीमीटर हिस्से की बाहरी छाल को बहुत सावधानी से थोड़ा हटाया जा सकता है ताकि अंदर का हिस्सा दिखाई देने लगे। इसका उद्देश्य कटिंग के आधार पर नमी और जड़ बनने वाले माध्यम के संपर्क को बढ़ाना है। लेकिन यहां सबसे बड़ी सावधानी जरूरी है। छाल हटाते समय शाखा को गहराई तक काटकर क्षतिग्रस्त नहीं करना चाहिए। यदि आपने पूरा संवहनी ऊतक काट दिया या शाखा को गंभीर रूप से घायल कर दिया तो जड़ बनने की बजाय कटिंग सड़ सकती है। इसलिए यह काम साफ और तेज औजार से हल्के हाथ से करें।

कटिंग तैयार करने के बाद उसे तुरंत सूखने के लिए खुला न छोड़ें। घर पर उपलब्ध सामग्री से एक सरल प्रारंभिक उपचार किया जा सकता है। दिए गए स्रोत में लगभग 250 से 500 मिलीलीटर पानी में लगभग 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर कटिंग को करीब 10 मिनट रखने की विधि बताई गई है। दालचीनी में कुछ ऐसे प्राकृतिक यौगिक होते हैं जिनमें फफूंदरोधी गतिविधि पाई गई है, लेकिन इसे किसी प्रमाणित फफूंदनाशी का निश्चित विकल्प नहीं मानना चाहिए। इसका इस्तेमाल घरेलू प्रयोग के रूप में किया जा सकता है, लेकिन कटिंग की सफलता केवल दालचीनी पर निर्भर नहीं करती।

इसके बाद एलोवेरा जेल का इस्तेमाल किया जा सकता है। ताजा एलोवेरा की पत्ती काटकर उसमें से निकलने वाले पीले लेटेक्स को अलग होने दें और फिर अंदर का साफ जेल लें। कटिंग के निचले हिस्से पर हल्की परत लगाई जा सकती है। एलोवेरा नमी बनाए रखने में मदद कर सकता है, लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि इसमें मौजूद प्राकृतिक हार्मोन हर पौधे में निश्चित रूप से जड़ बना देंगे। यदि किसी पौधे की जड़ बनने की क्षमता कम है तो केवल एलोवेरा लगाने से परिणाम की गारंटी नहीं मिलती।

अब सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आता है सुघड़ और जल निकास वाला माध्यम तैयार करना। कटिंग के लिए ऐसी मिट्टी या माध्यम चाहिए जो नमी बनाए रखे लेकिन पानी जमा करके न रखे। स्रोत में जैविक पदार्थ वाली मिट्टी इस्तेमाल करने की बात कही गई है। आप अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी में कोकोपीट, रेत या अन्य उपयुक्त rooting medium मिलाकर ऐसा मिश्रण तैयार कर सकते हैं जिसमें हवा और नमी दोनों का संतुलन रहे। उदाहरण के लिए एक छोटा कंटेनर लेते समय उसमें जल निकासी के लिए नीचे कई छेद होना जरूरी है। यदि नीचे छेद नहीं होंगे और पानी जमा रहेगा तो कटिंग के आधार पर सड़न की संभावना बढ़ जाएगी।

कटिंग को लगभग 2 से 5 सेंटीमीटर तक माध्यम में लगाएं और आसपास की मिट्टी को हल्के हाथ से दबाएं ताकि शाखा हिले नहीं। कटिंग का स्थिर रहना बहुत जरूरी है। बार-बार हिलने से बनने वाली शुरुआती जड़ें टूट सकती हैं और जड़ बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। एक छोटे गमले या प्लास्टिक कप में एक से तीन कटिंग लगाई जा सकती हैं, लेकिन बहुत ज्यादा कटिंग एक ही कंटेनर में लगाने से हवा का आवागमन और नमी प्रबंधन कठिन हो सकता है।

पहली सिंचाई के समय पूरे माध्यम को समान रूप से नम करें और नीचे के छेदों से अतिरिक्त पानी निकलने दें। इसके बाद सबसे बड़ी गलती यह होती है कि लोग रोज बहुत अधिक पानी डालते रहते हैं। कटिंग को लगातार पानी में डुबोकर रखना जड़ बनने की गारंटी नहीं है। इसका उल्टा असर हो सकता है और कटिंग सड़ सकती है। इसलिए माध्यम नम रहे, लेकिन उसमें पानी खड़ा न हो। पानी देने से पहले ऊपरी सतह और कंटेनर के वजन या नमी की स्थिति देखकर निर्णय लें। गर्म और सूखे मौसम में नमी तेजी से खत्म हो सकती है, जबकि बरसात या ठंडे वातावरण में बार-बार पानी देने की जरूरत कम हो सकती है।

कटिंग को सीधे तेज धूप में रखने से बचें। जड़ बनने तक ऐसी जगह बेहतर रहती है जहां पर्याप्त रोशनी हो लेकिन दोपहर की तेज सीधी धूप न पड़े। इसका कारण यह है कि बिना जड़ों वाली कटिंग पानी का अवशोषण बहुत कम कर पाती है। अगर पत्तियों से पानी तेजी से बाहर निकलता रहा तो शाखा जल्दी मुरझा सकती है। दूसरी तरफ पूरी तरह अंधेरे में रखने से भी पौधे की सामान्य जैविक गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए उजली लेकिन अप्रत्यक्ष रोशनी वाला स्थान अधिक उपयुक्त हो सकता है।

अब सवाल आता है कि जड़ कितने दिन में बनेगी? इसका कोई एक निश्चित जवाब नहीं है। कुछ पौधों में 15 से 20 दिन के आसपास शुरुआती जड़ें दिखाई दे सकती हैं, जबकि दूसरे पौधों में 30, 45, 60 दिन या उससे भी अधिक समय लग सकता है। स्रोत में 20 से 30 दिन में शुरुआती जड़ और लगभग 60 दिन में अच्छी जड़ बनने का उदाहरण दिया गया है तथा कुछ मामलों में 90 दिन तक कटिंग को मजबूत करने की बात कही गई है। लेकिन इसे हर पौधे के लिए निश्चित समय न मानें। तापमान, नमी, शाखा की उम्र, पौधे की प्रजाति, माध्यम और कटिंग लेने का मौसम सभी परिणाम को प्रभावित करते हैं।

सबसे बड़ी गलती यह होगी कि 10 या 15 दिन बाद कटिंग को निकालकर जड़ देखने लगें। इससे नई बनी जड़ें टूट सकती हैं। शुरुआत में ऊपर से पौधा बिल्कुल सामान्य दिखाई दे सकता है और कई दिनों तक कोई नई वृद्धि नहीं दिखाई देगी। धैर्य रखना जरूरी है। यदि शाखा पूरी तरह काली होकर सड़ने लगे, बदबू आए या आधार नरम हो जाए तो यह खराब संकेत है। ऐसी स्थिति में सड़न के कारण को पहचानकर उस कटिंग को अलग कर देना चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कटिंग से तैयार पौधा हमेशा मूल पौधे जैसा ही प्रदर्शन करेगा, इसकी भी गारंटी नहीं होती। यदि आप ऐसी शाखा लेते हैं जो किसी अच्छे फल देने वाले पौधे से है, तो उस पौधे के आनुवंशिक गुण उसी पौधे से जुड़े रहते हैं। यही कारण है कि कई बागवान अपनी पसंदीदा किस्मों को कटिंग या अन्य vegetative propagation methods से बढ़ाना पसंद करते हैं। लेकिन फलदार पौधों में हर प्रजाति कटिंग से समान सफलता नहीं देती। इसलिए पहले अपने पौधे की propagation क्षमता को समझना जरूरी है।

अगर कटिंग सफल हो जाती है और नई पत्तियां निकलने लगती हैं, तो उसे तुरंत तेज धूप में न रखें। धीरे-धीरे प्रकाश बढ़ाएं। जब जड़ प्रणाली कंटेनर में पर्याप्त विकसित हो जाए तभी उसे बड़े गमले, ग्रो बैग या जमीन में स्थानांतरित करें। स्थानांतरण के बाद शुरुआती कुछ दिनों तक नमी का विशेष ध्यान रखें। बहुत ज्यादा खाद, यूरिया या तेज रासायनिक उर्वरक तुरंत डालने से बचें, क्योंकि नई जड़ें संवेदनशील होती हैं।

इस पूरी प्रक्रिया से एक बात स्पष्ट होती है कि पौधे की कटिंग से नया पौधा तैयार करना कोई जादुई तरीका नहीं है। सफलता तीन चीजों के संतुलन पर बहुत निर्भर करती है—स्वस्थ कटिंग, नियंत्रित नमी और अच्छा rooting environment। दालचीनी या एलोवेरा जैसे घरेलू उपाय सहायक हो सकते हैं, लेकिन इन्हें चमत्कारी जड़ बनाने वाला समाधान समझना सही नहीं है। यदि किसी प्रजाति में प्राकृतिक रूप से rooting कम होती है, तो प्रमाणित rooting hormone जैसे IBA आधारित उत्पाद का इस्तेमाल लेबल के अनुसार किया जा सकता है। यहां भी मात्रा पौधे और उत्पाद के अनुसार अलग होती है, इसलिए बिना लेबल देखे कोई निश्चित डोज देना उचित नहीं है।

अगर आपके घर में अनार, गुलाब, बोगनवेलिया, अंगूर या कोई दूसरा पौधा है जिसे आप कटिंग से बढ़ाना चाहते हैं, तो पहले एक साथ बहुत सारी शाखाएं न लगाएं। 5 से 10 स्वस्थ कटिंग से छोटा परीक्षण करें। यदि उनमें से अच्छी संख्या में जड़ बनती है तो उसी विधि को आगे बढ़ाएं। इससे समय, मेहनत और पौधों का नुकसान कम होगा। और सबसे जरूरी बात, किसी भी एक वीडियो में बताए गए तरीके को हर पौधे पर 100 प्रतिशत सफल मानकर न चलें। खेती और बागवानी में पौधे की प्रजाति, मौसम और स्थानीय परिस्थितियां परिणाम बदल देती हैं।

अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो इसे उन लोगों तक जरूर पहुंचाएं जो घर पर बिना ज्यादा खर्च के पौधों की नई पौध तैयार करना चाहते हैं। खासकर ऐसे किसान और बागवान जो अपने अच्छे फल देने वाले पौधों की संख्या बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए कटिंग propagation एक उपयोगी तकनीक हो सकती है, बशर्ते सही पौधे का चयन, साफ कटिंग, संतुलित नमी और उचित वातावरण रखा जाए।

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खाद वितरण पर बड़ा सवाल: किसान को दो बोरी मिलेगी या चार?

मध्य प्रदेश में खाद संकट के बीच किसानों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। खाद लेने के लिए किसान सोसायटी और मंडियों के चक्कर लगा रहे हैं, लंबी कतारों में खड़े हैं और कई जगहों पर व्यवस्था को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल खाद की उपलब्धता से ज्यादा उसके वितरण को लेकर है। अगर किसी किसान को निर्धारित मात्रा में खाद चाहिए, तो उसे स्पष्ट नियम के अनुसार खाद मिलनी चाहिए। किसान को यह पता होना चाहिए कि उसे कितनी खाद मिलेगी, कहां से मिलेगी और कितनी बार मिलेगी।

अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार, अधिकारियों के बयानों को लेकर भी किसानों में असमंजस की स्थिति है। कुछ किसानों को दो बोरी और कुछ को चार बोरी खाद मिलने की बात सामने आने के बाद किसान पूछ रहे हैं कि आखिर खाद वितरण का स्पष्ट नियम क्या है?

अगर खाद की उपलब्धता सीमित है तो सरकार को पारदर्शी व्यवस्था बनानी चाहिए, ताकि किसी किसान को जुगाड़ लगाना न पड़े और न ही खाद के लिए बार-बार सोसायटी, मंडी या तहसील के चक्कर लगाने पड़ें।

खाद संकट के समय सबसे जरूरी है कि वितरण व्यवस्था साफ और समान हो। किसान को लाइन में लगने के बाद यह पता नहीं चलना चाहिए कि आज खाद मिलेगी भी या नहीं।

आपके गांव में किसानों को कितनी खाद मिल रही है?

दो बोरी या चार बोरी?

और क्या खाद लेने के लिए आपको भी जुगाड़ लगाना पड़ रहा है? अपनी जमीनी हकीकत कमेंट में बताइए।

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किसानों का गन्ना भुगतान अटका हुआ है, लेकिन चुनाव नजदीक आने के बावजूद सरकार को इसकी कोई खास चिंता दिखाई नहीं दे रही है। सवाल सिर्फ बकाया भुगतान का नहीं है, सवाल उस किसान का है जिसने महीनों पहले अपना गन्ना मिल को दे दिया, लेकिन आज भी अपनी मेहनत की कमाई के लिए इंतजार कर रहा है।

अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार, लखीमपुर खीरी जिले की तीन चीनी मिलों पर किसानों का करीब 6.47 अरब रुपये गन्ना मूल्य बकाया है। आरसी जारी होने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ है। इसका सीधा असर किसानों की अगली फसल की तैयारी पर पड़ रहा है।

किसान को खेत तैयार करना है, खाद-बीज खरीदना है, सिंचाई करनी है, बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी खर्च पूरे करने हैं। लेकिन जब गन्ने का भुगतान ही समय पर नहीं मिलेगा तो किसान अगली फसल की लागत कहां से लगाएगा?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसान अपनी फसल मिल को दे चुका है, तो उसे उसके पैसे के लिए महीनों इंतजार क्यों करना पड़े?

खबर में गन्ना भुगतान के आंकड़े भी सामने आए हैं। गोला चीनी मिल पर 499.85 करोड़ रुपये के गन्ना मूल्य में से 226.65 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ और 264.20 करोड़ रुपये बकाया बताया गया है। पलिया मिल पर 387.05 करोड़ रुपये में से 182.98 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ और 204.07 करोड़ रुपये बकाया है। वहीं खंभारखेड़ा मिल पर 387.84 करोड़ रुपये के मुकाबले 208.41 करोड़ रुपये भुगतान हुआ और 179.43 करोड़ रुपये बकाया बताया गया है।

यानी आंकड़े सिर्फ कागज पर नहीं हैं, इनके पीछे हजारों किसानों की मेहनत और उनके परिवारों की जरूरतें जुड़ी हुई हैं।

किसानों का कहना है कि आरसी जारी होने के बाद भी भुगतान अटका हुआ है। अगर किसान पर बैंक का कर्ज हो और वह समय पर किस्त न दे पाए तो ब्याज बढ़ता है, नोटिस आता है और कार्रवाई का डर रहता है। फिर किसान की फसल का भुगतान अटकने पर जिम्मेदारी किसकी होगी?

किसानों की मांग बिल्कुल स्पष्ट है। न्यायपालिका के आदेशों के अनुसार बकाया मूलधन के साथ ब्याज का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आगामी गन्ना सत्र में किसानों को निर्धारित समय के भीतर भुगतान मिले और भुगतान व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए।

किसान सिर्फ यह नहीं मांग रहा कि उसका पैसा आज दे दिया जाए। किसान चाहता है कि आगे से उसे अपनी फसल का पैसा समय पर मिले, ताकि वह कर्ज के चक्र में फंसने से बच सके।

गन्ना किसान महीनों तक फसल तैयार करता है। खेत में लागत लगाता है, मजदूरी करता है, सिंचाई करता है और फिर अपनी उपज चीनी मिल को देता है। अगर फसल देने के बाद भुगतान के लिए भी महीनों संघर्ष करना पड़े तो आखिर खेती को लाभकारी बनाने की बात कैसे पूरी होगी?

चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन किसान की मेहनत का पैसा किसी राजनीतिक समय-सारणी का इंतजार नहीं कर सकता।

किसान को उसकी फसल का भुगतान समय पर चाहिए।
बकाया भुगतान चाहिए।
ब्याज सहित भुगतान चाहिए।
और आने वाले सत्र में समयबद्ध भुगतान की गारंटी चाहिए।

अगर किसानों का पैसा अटका रहेगा तो इसका असर सिर्फ किसान पर नहीं पड़ेगा। इसका असर गांव की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसान जब भुगतान पाता है तो वही पैसा खाद, बीज, डीजल, मजदूरी, बच्चों की पढ़ाई और स्थानीय बाजार में खर्च होता है। इसलिए समय पर गन्ना भुगतान ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है।

अब सवाल सरकार और प्रशासन से है-

6.47 अरब रुपये से अधिक के बकाये का भुगतान कब होगा?
आरसी जारी होने के बाद भी किसानों को भुगतान के लिए इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?
क्या किसानों को उनके बकाये पर नियमानुसार ब्याज मिलेगा?
और आगामी गन्ना सत्र में क्या किसान को निर्धारित समय सीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा?

किसान किसी पर एहसान नहीं मांग रहा। वह अपनी मेहनत की कमाई मांग रहा है।

अन्नदाता की फसल का पैसा अटकना सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।

आपके क्षेत्र में गन्ने का भुगतान समय पर हो रहा है या अभी भी किसानों का पैसा मिलों पर अटका हुआ है? अपनी बात कमेंट में जरूर बताइए।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन जिंदाबाद।
किसान की आवाज बुलंद हो।

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किसान भाइयों, धान की फसल में तना छेदक, पत्ती लपेटक और प्लांट हॉपर जैसे कीटों का प्रकोप अगर शुरुआती अवस्था में बढ़ जाए तो इसका सीधा असर फसल की बढ़वार, कल्लों की संख्या और आगे चलकर उत्पादन पर पड़ सकता है। ऐसे में किसानों के बीच Bayer Bicota जैसे दानेदार कीटनाशी का इस्तेमाल भी किया जाता है।

Bicota में Tetraniliprole 0.4% + Fipronil 0.6% GR सक्रिय तत्वों का संयोजन बताया गया है। यह एक ग्रेन्यूल यानी दानेदार formulation है, जिसे विशेष रूप से रोपाई वाली धान की फसल में खड़े पानी के माध्यम से खेत में broadcast करने के लिए दिया गया है।

इस उत्पाद की खास बात यह है कि इसमें दो अलग-अलग रासायनिक समूहों के सक्रिय तत्वों का संयोजन है। दिए गए विवरण के अनुसार Tetraniliprole IRAC Group 28 और Fipronil IRAC Group 2B से संबंधित हैं। इसलिए यह कीटों पर अलग-अलग प्रकार से प्रभाव डालने वाला संयोजन है।

अब सवाल आता है कि धान में Bicota किन-किन कीटों के लिए इस्तेमाल किया जाता है?

दिए गए स्रोत के अनुसार रोपाई वाली धान की फसल में इसका उपयोग मुख्य रूप से Yellow Stem Borer यानी पीला तना छेदक, Leaf Folder यानी पत्ती लपेटक, Brown Plant Hopper यानी BPH, White-Backed Plant Hopper यानी WBPH, Gall Midge और Green Leafhopper जैसे कीटों के प्रबंधन के लिए बताया गया है।

पीला तना छेदक धान के पौधे के तने के अंदर जाकर नुकसान करता है। शुरुआती अवस्था में इसका प्रकोप बढ़ने पर पौधे की बढ़वार प्रभावित हो सकती है और बाद की अवस्था में dead heart जैसी समस्या दिखाई दे सकती है।

दूसरी तरफ Leaf Folder यानी पत्ती लपेटक धान की पत्तियों को लपेटकर उनके अंदर से हरे हिस्से को खाता है। इससे पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित होती है और अधिक प्रकोप होने पर फसल की बढ़वार पर असर पड़ सकता है।

BPH और WBPH जैसे प्लांट हॉपर भी धान के लिए महत्वपूर्ण कीट हैं। ये पौधे के रस को चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं। अधिक प्रकोप होने पर पौधे कमजोर पड़ सकते हैं और hopper burn जैसी स्थिति भी बन सकती है।

अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण चीज यानी डोज और इस्तेमाल के तरीके की।

दिए गए विवरण के अनुसार transplanted paddy में Bicota की मात्रा 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ बताई गई है। इसे पानी में घोलकर स्प्रे नहीं करना है, बल्कि यह ग्रेन्यूल के रूप में सीधे खेत में broadcast किया जाता है।

इसके लिए खेत में करीब 2 से 5 सेंटीमीटर खड़ा पानी होना चाहिए। ग्रेन्यूल को पूरे खेत में समान रूप से फैलाना जरूरी है। किसी एक स्थान पर दाने इकट्ठे नहीं करने चाहिए, क्योंकि इससे उस जगह पर जरूरत से ज्यादा मात्रा पहुंच सकती है।

मान लीजिए किसान के पास 1 एकड़ धान है और उत्पाद के लेबल पर 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की सिफारिश लागू है, तो उसी क्षेत्र के लिए निर्धारित मात्रा में ही उत्पाद का इस्तेमाल करना चाहिए। खेत का क्षेत्रफल बढ़ने पर मात्रा भी उसी अनुपात में निर्धारित होगी।

यहां एक जरूरी बात समझना बहुत महत्वपूर्ण है। इंटरनेट पर कई जगह 5 किलोग्राम, 8 किलोग्राम या 10 किलोग्राम प्रति एकड़ जैसी अलग-अलग मात्रा दिखाई दे सकती है। इसलिए किसान को केवल किसी दुकानदार, वीडियो या दूसरे किसान की बताई हुई मात्रा देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। आपके पास मौजूद उत्पाद के आधिकारिक लेबल और लीफलेट पर आपकी फसल और कीट के लिए जो मात्रा दर्ज है, वही अंतिम आधार होना चाहिए।

दिए गए विवरण में इसके इस्तेमाल का समय रोपाई के 15 से 25 दिन बाद यानी 15–25 DAT बताया गया है। इस समय धान की फसल स्थापित हो चुकी होती है और कल्ले निकलने की शुरुआत हो रही होती है। इसी अवधि में शुरुआती कीट गतिविधि दिखाई देने पर इसका इस्तेमाल करने की जानकारी दी गई है।

आवेदन के समय खेत में 2 से 5 सेंटीमीटर पानी रखना बताया गया है। ग्रेन्यूल डालने के बाद पानी को तुरंत बाहर नहीं निकालना चाहिए। दिए गए विवरण में 3 से 5 दिन तक पानी नहीं निकालने की सलाह दी गई है, ताकि दाने धीरे-धीरे घुलें और सक्रिय तत्व पौधे के आसपास प्रभावी रूप से पहुंच सके।

किसान भाइयों, दवा डालते समय एक गलती बिल्कुल नहीं करनी चाहिए और वह है पूरे खेत में समान वितरण न करना। अगर ग्रेन्यूल एक जगह ज्यादा और दूसरी जगह कम गिर गया तो पूरे खेत में समान प्रभाव नहीं मिलेगा। इसलिए खेत में चलते हुए समान रूप से broadcast करना जरूरी है। जरूरत हो तो उचित granule applicator या spreader का उपयोग किया जा सकता है।

Bicota के बारे में दिए गए विवरण में लंबे समय तक residual protection की बात भी कही गई है। इसी वजह से इसे एक बार इस्तेमाल करने वाला उत्पाद बताया गया है। लेकिन यहां भी किसान भाइयों को सावधान रहना चाहिए। किसी भी कीटनाशी को केवल इसलिए दोबारा नहीं डालना चाहिए कि कुछ दिनों बाद खेत में कोई दूसरा कीट दिखाई दे गया है। पहले कीट की पहचान करें, प्रकोप की स्थिति देखें और फिर लेबल की सिफारिश के अनुसार निर्णय लें।

कीटनाशक के इस्तेमाल में एक और महत्वपूर्ण विषय है resistance management। अगर किसान हर बार एक ही रासायनिक समूह की दवा लगातार इस्तेमाल करता रहेगा तो समय के साथ कीटों में resistance विकसित होने का खतरा हो सकता है। Bicota में दो अलग-अलग समूहों के सक्रिय तत्व हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसे आवश्यकता से अधिक या बार-बार इस्तेमाल किया जाए।

किसान भाइयों को Integrated Pest Management यानी IPM को भी ध्यान में रखना चाहिए। खेत की नियमित निगरानी करें, कीट की पहचान करें, जरूरत के अनुसार ही कीटनाशी का इस्तेमाल करें और अनावश्यक छिड़काव या दवा का प्रयोग न करें।

अब बात करते हैं सुरक्षा की।

ग्रेन्यूल को हाथ से broadcast करते समय भी किसान को सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए। दिए गए विवरण के अनुसार दस्ताने, मास्क और सुरक्षात्मक eyewear का इस्तेमाल करना चाहिए। दवा डालते समय खाना, पीना या धूम्रपान नहीं करना चाहिए। काम पूरा होने के बाद हाथ और शरीर के खुले हिस्सों को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए।

बच्चों और पशुओं को उपचारित खेत से दूर रखना चाहिए। उत्पाद को खाद्य सामग्री, पशु आहार और पीने के पानी से अलग रखना चाहिए। इसे मूल पैकिंग में, ठंडी, सूखी और हवादार जगह पर तथा सीधी धूप से दूर रखने की जानकारी दी गई है।

अब सबसे जरूरी बात आती है PHI यानी Pre-Harvest Interval की। दिए गए विवरण में धान के लिए PHI 30 दिन बताया गया है। यानी अंतिम उपयोग और फसल की कटाई के बीच निर्धारित अंतराल का पालन करना जरूरी है। किसान को अपने उत्पाद के पैक पर लिखे आधिकारिक निर्देश को प्राथमिकता देनी चाहिए।

किसान भाइयों, यह भी समझना जरूरी है कि Bicota कोई खाद नहीं है। इसका उद्देश्य कीट नियंत्रण है। खेत में कल्ले कम हैं, पौधे पीले हैं या फसल कमजोर है तो हर समस्या का समाधान कीटनाशी नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में पोषण, पानी, जड़ क्षेत्र, रोग और कीट—सभी कारणों की जांच करनी चाहिए।

इसी तरह अगर धान में Leaf Folder या Stem Borer का प्रकोप नहीं है तो केवल दूसरे किसान को देखकर दवा डालने की जरूरत नहीं है। कीटनाशी का इस्तेमाल कीट की वास्तविक स्थिति और अनुशंसित उपयोग के आधार पर होना चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण बात-किसान भाइयों, डोज बढ़ाने से दवा ज्यादा प्रभावी नहीं हो जाती। सही मात्रा, सही समय, सही पानी की स्थिति और पूरे खेत में समान वितरण ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर आप Bicota का इस्तेमाल करने जा रहे हैं तो अपने पैक पर दिए गए लेबल को जरूर पढ़ें। उत्पाद की formulation, फसल, कीट, मात्रा, पानी की स्थिति, PHI और अन्य सुरक्षा निर्देशों में कोई अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग की सलाह लेना भी बेहतर रहेगा।

धान की फसल में अभी आपके खेत में कौन-सा कीट सबसे ज्यादा परेशानी दे रहा है?

तना छेदक, Leaf Folder, BPH, WBPH या कोई दूसरा कीट?

कमेंट में अपनी फसल की उम्र और कीट का नाम जरूर बताइए। इससे दूसरे किसानों को भी अपने खेत में कीट की पहचान करने में मदद मिलेगी।

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महराजगंज में खाद दुकानों पर बड़ी कार्रवाई, एक लाइसेंस निलंबित और तीन दुकानदारों को नोटिस!

किसानों को खाद के लिए लाइन लगानी पड़े, दुकानों के चक्कर लगाने पड़ें और दूसरी तरफ दुकानों में स्टॉक कुछ और मिले तथा बिक्री का हिसाब कुछ और-तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर खाद वितरण की व्यवस्था में गड़बड़ी कहां हो रही है?

महराजगंज जिले में खाद की कालाबाजारी और अनियमितता पर प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की है। जिलाधिकारी के निर्देश पर जिले की 31 उर्वरक दुकानों पर छापेमारी और जांच की गई। इस कार्रवाई का उद्देश्य खाद के स्टॉक, बिक्री और निर्धारित नियमों के पालन की वास्तविक स्थिति की जांच करना था।

जांच के दौरान अधिकारियों को एक दुकान के स्टॉक और बिक्री के रिकॉर्ड में अंतर मिला। मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित दुकान का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया। इसके अलावा तीन अन्य उर्वरक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद की उपलब्धता को लेकर हर सीजन में किसानों की परेशानी सामने आती है। किसान को खेत में समय पर खाद चाहिए। अगर खाद समय पर नहीं मिली तो फसल की बढ़वार और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में खाद की आपूर्ति और वितरण व्यवस्था में किसी भी तरह की गड़बड़ी का सीधा असर किसान की जेब और फसल पर पड़ता है।

मिली जानकारी के अनुसार, जिलाधिकारी के निर्देश पर जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में उर्वरक प्रतिष्ठानों की जांच की गई। अधिकारियों ने दुकानों में उपलब्ध खाद के स्टॉक, बिक्री से संबंधित रिकॉर्ड, रेट बोर्ड और अन्य जरूरी मानकों की जांच की। जहां भी रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में अंतर पाया गया, वहां कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की गई।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर किसी दुकान के रिकॉर्ड में जितनी खाद दिखाई जा रही है, वास्तविक स्टॉक उससे अलग है, तो यह अंतर कैसे पैदा हुआ? क्या रिकॉर्ड में सही तरीके से बिक्री दर्ज नहीं की गई? क्या स्टॉक की निगरानी कमजोर रही? या फिर कहीं खाद की बिक्री में नियमों का उल्लंघन हुआ? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।

लेकिन किसानों के नजरिए से देखें तो यह कार्रवाई केवल एक जिले की खबर नहीं है। यह पूरे कृषि तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि उर्वरक जैसी आवश्यक कृषि सामग्री के वितरण में पारदर्शिता जरूरी है।

किसान पहले से ही महंगे डीजल, मजदूरी, बीज, सिंचाई, कीटनाशक और अन्य कृषि लागत से परेशान है। ऐसे में अगर खाद भी निर्धारित व्यवस्था के अनुसार नहीं मिलती या किसान को खाद के लिए अतिरिक्त पैसा देना पड़ता है, तो खेती की लागत और बढ़ जाती है।

खाद की कालाबाजारी का सबसे बड़ा नुकसान उस किसान को होता है जिसके पास सीमित पूंजी होती है। बड़े किसान किसी तरह महंगे दाम पर खाद खरीद भी लें, लेकिन छोटे और सीमांत किसान के लिए अतिरिक्त ₹50, ₹100 या ₹200 भी महत्वपूर्ण राशि होती है।

इसलिए केवल छापेमारी करना ही पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि जांच के बाद दोषी पाए जाने वाले लोगों पर नियमानुसार प्रभावी कार्रवाई भी हो और पूरी व्यवस्था में ऐसी निगरानी हो कि अनियमितता दोबारा न हो।

प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन दुकानों पर खाद उपलब्ध है, वहां किसानों को स्पष्ट रूप से निर्धारित बिक्री मूल्य की जानकारी दी जाए। रेट बोर्ड स्पष्ट रूप से प्रदर्शित हो और किसान को खरीद के बाद बिल या रसीद उपलब्ध कराई जाए।

दूसरी तरफ किसानों की भी जिम्मेदारी है। खाद खरीदते समय जल्दबाजी में बिना रसीद के भुगतान करने से बचें। दुकानदार से बिल मांगें और खाद की बोरी पर अंकित जानकारी को ध्यान से देखें। अगर किसी विक्रेता द्वारा निर्धारित मूल्य से अधिक राशि मांगी जाती है या खाद के साथ जबरन कोई दूसरा उत्पाद लेने के लिए कहा जाता है, तो किसान संबंधित विभाग में शिकायत कर सकता है।

किसानों को यह समझना भी जरूरी है कि किसी एक दुकान या व्यक्ति पर आरोप लगाना और जांच के बाद दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए किसी भी मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और आधिकारिक कार्रवाई के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

महराजगंज की इस कार्रवाई में 31 दुकानों की जांच, एक लाइसेंस का निलंबन और तीन दुकानदारों को कारण बताओ नोटिस यह बताता है कि उर्वरक बिक्री की निगरानी कितनी जरूरी है।

अब सवाल यह है कि क्या ऐसी जांच केवल शिकायत मिलने के बाद होनी चाहिए या खाद की मांग बढ़ने वाले सीजन में नियमित रूप से पहले से ही निगरानी की जानी चाहिए?

मेरी राय में खाद की उपलब्धता और बिक्री व्यवस्था की नियमित जांच होनी चाहिए। प्रत्येक जिले में स्टॉक का डिजिटल रिकॉर्ड, बिक्री का रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक का मिलान किया जाए। जिन दुकानों में बार-बार अंतर मिले, वहां विशेष निगरानी हो। इससे किसानों को खाद के लिए भटकने की समस्या कम हो सकती है।

साथ ही प्रशासन को यह भी देखना चाहिए कि कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित न रहे। अगर किसी बड़े स्तर की सप्लाई चेन में गड़बड़ी सामने आती है तो वहां भी समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए। किसान को यह भरोसा होना चाहिए कि नियम सभी के लिए एक समान हैं।

किसान खाद मांगने वाला कोई अपराधी नहीं है। वह अपनी फसल के लिए समय पर जरूरी इनपुट मांग रहा है। इसलिए खाद वितरण व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसान को सम्मान के साथ निर्धारित दर पर खाद मिले और उसे किसी तरह के दबाव, अतिरिक्त भुगतान या अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

महराजगंज में हुई कार्रवाई से एक बात स्पष्ट है-स्टॉक और बिक्री में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। अगर खाद का स्टॉक रिकॉर्ड कुछ और बताता है और जमीन पर स्थिति कुछ और निकलती है, तो सवाल उठेंगे और जांच भी होनी चाहिए।

अब किसानों की भी नजर इस बात पर रहेगी कि जिन दुकानों पर कार्रवाई हुई है, वहां जांच का परिणाम क्या निकलता है और दोष साबित होने पर आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

किसानों के लिए खाद केवल एक उत्पाद नहीं है, बल्कि उनकी पूरी फसल की उत्पादन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए खाद की उपलब्धता, सही कीमत और पारदर्शी वितरण व्यवस्था सुनिश्चित करना कृषि प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

आपके जिले में खाद की स्थिति कैसी है? क्या आपको खाद निर्धारित दर पर आसानी से मिल रही है या फिर अभी भी स्टॉक, रेट और उपलब्धता को लेकर परेशानी हो रही है?

क्या आपके इलाके में भी खाद दुकानों की ऐसी जांच होनी चाहिए?

अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए। अगर आपके क्षेत्र में भी खाद की कालाबाजारी या ओवररेटिंग की समस्या है, तो तथ्य और प्रमाण के साथ अपनी बात सामने रखें, ताकि जमीनी स्थिति पर चर्चा हो सके।

इस खबर को ज्यादा से ज्यादा किसान भाइयों तक पहुंचाइए, क्योंकि सही कीमत पर खाद मिलना किसान का हक है और खाद वितरण में पारदर्शिता पूरे कृषि तंत्र की जिम्मेदारी है।

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क्या उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज माफ होना चाहिए?

यह सवाल सिर्फ कर्ज की रकम का नहीं, बल्कि उस किसान की जिंदगी का सवाल है जो मौसम की मार, बढ़ती लागत और फसल के सही दाम न मिलने के बीच खेती करने को मजबूर है।

किसान खेती शुरू करने के लिए कर्ज लेता है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, सिंचाई, मजदूरी और मशीनरी का खर्च बढ़ता जाता है। किसान मेहनत करके फसल तैयार करता है, लेकिन अगर मौसम खराब हो जाए या मंडी में भाव गिर जाए तो उसकी पूरी गणित बिगड़ जाती है। ऐसी स्थिति में किसान के सामने कर्ज चुकाना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।

ऐसे किसानों के लिए कर्ज राहत या कर्जमाफी पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। खासकर छोटे और सीमांत किसान, जिनकी आमदनी खेती पर ही निर्भर है और जिनके पास नुकसान सहने की आर्थिक क्षमता बहुत कम है, उन्हें लक्षित राहत मिलनी चाहिए।

लेकिन क्या केवल कर्ज माफ कर देना स्थायी समाधान है?

शायद नहीं।

अगर किसान का कर्ज आज माफ कर दिया जाए और अगले सीजन में फिर वही किसान महंगे बीज, खाद, डीजल, सिंचाई और मजदूरी के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो जाए, तो समस्या फिर वहीं खड़ी हो जाएगी।

इसलिए सरकार को कर्जमाफी के साथ खेती की पूरी व्यवस्था पर काम करना होगा।

किसान को समय पर और निर्धारित कीमत पर खाद मिले। प्रमाणित बीज उचित कीमत पर मिले। फसल खराब होने पर बीमा का भुगतान समय पर मिले। किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिले। मंडी और खरीद व्यवस्था पारदर्शी हो। सिंचाई की लागत कम हो और संस्थागत कृषि ऋण आसानी से उपलब्ध हो।

किसान को ऐसी खेती चाहिए जिससे वह कर्ज लेकर उसे चुका सके, न कि ऐसी व्यवस्था जिसमें हर कुछ साल बाद उसे कर्जमाफी की जरूरत पड़े।

साथ ही यह भी जरूरी है कि कर्जमाफी का लाभ वास्तव में जरूरतमंद किसानों तक पहुंचे। बड़े बकायेदारों और वास्तविक रूप से संकट में फंसे छोटे किसानों के बीच अंतर किया जाना चाहिए। राहत की व्यवस्था पारदर्शी और किसान-केंद्रित होनी चाहिए।

आखिर सवाल यह है कि अगर उद्योगों और दूसरे क्षेत्रों के लिए सरकार अलग-अलग प्रकार की वित्तीय सहायता और राहत की व्यवस्था कर सकती है, तो देश का अन्न पैदा करने वाला किसान संकट में हो तो उसके लिए स्थायी समाधान क्यों नहीं बनाया जा सकता?

कर्जमाफी किसान की समस्या का अंतिम समाधान नहीं है, लेकिन गंभीर संकट में फंसे किसान के लिए यह राहत का जरूरी कदम हो सकता है। असली समाधान है-कम लागत, उचित दाम, आसान कृषि ऋण और मजबूत बाजार व्यवस्था।

अब सवाल आपसे है-क्या उत्तर प्रदेश में किसानों का कर्ज माफ होना चाहिए? या सरकार को कर्जमाफी के बजाय खेती की लागत घटाकर और फसल का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करके किसानों को कर्ज के चक्र से बाहर निकालना चाहिए?

अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।

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तमिलनाडु में धान पर बोनस की घोषणा हो गई है, लेकिन सवाल सिर्फ बोनस का नहीं है। असली सवाल यह है कि किसान की पूरी उपज कितनी मात्रा में सरकारी MSP पर खरीदी जा रही है?

तमिलनाडु सरकार ने धान की उन्नत किस्म पर 286 रुपये और हाइब्रिड धान पर 159 रुपये प्रति क्विंटल बोनस की घोषणा की है। इसके बाद उन्नत किस्म के लिए कुल खरीद मूल्य लगभग 2,750 रुपये और हाइब्रिड के लिए लगभग 2,600 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित होने की बात सामने आई है।

बोनस की घोषणा सुनकर निश्चित रूप से किसानों को राहत की उम्मीद होती है। लेकिन अगर किसान की पूरी उपज MSP और बोनस पर खरीदी ही न जाए, तो सिर्फ कागज पर घोषित ज्यादा कीमत का वास्तविक फायदा किसान तक कितना पहुंचेगा, यह बड़ा सवाल है।

इसे हरियाणा और तमिलनाडु के उदाहरण से समझिए।

हरियाणा में लगभग 100 प्रतिशत धान की खरीद MSP पर होने का दावा किया गया है। यहां किसान की उपज सरकारी खरीद व्यवस्था में पहुंचती है, भले ही कुछ मामलों में किसान को प्रति क्विंटल 100 से 400 रुपये तक कट का सामना करना पड़े।

दूसरी तरफ तमिलनाडु में औसतन 55 से 60 प्रतिशत धान की ही MSP पर खरीद होने की बात कही गई है। यानी किसान के सामने सिर्फ MSP की दर महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि उसकी कुल उपज में से कितनी मात्रा सरकार खरीद रही है।

अब एक उदाहरण लेते हैं।

मान लीजिए तमिलनाडु के एक किसान को एक एकड़ में 30 क्विंटल धान की पैदावार हुई। अगर इसमें से 18 क्विंटल धान सरकारी खरीद में चला गया और बाकी 12 क्विंटल किसान को खुले बाजार में बेचना पड़ा, तो सरकारी खरीद से मिलने वाली रकम और खुले बाजार की कीमत के बीच बड़ा अंतर पैदा हो सकता है।

दिए गए उदाहरण के अनुसार 18 क्विंटल सरकारी खरीद से लगभग 45,000 रुपये और 12 क्विंटल खुले बाजार से लगभग 18,000 रुपये मिले। यानी कुल आमदनी करीब 63,000 रुपये प्रति एकड़ बैठती है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। पिछले वर्ष सरकारी खरीद में लगभग 2,500 रुपये की दर बताई गई थी, जबकि खुले बाजार में हाइब्रिड धान का भाव लगभग 1,500 से 1,600 रुपये प्रति क्विंटल बताया गया। इसका मतलब है कि जिस धान को किसान MSP पर नहीं बेच पाता, उसे खुले बाजार में काफी कम कीमत मिल सकती है।

अब इसी उत्पादन को हरियाणा के उदाहरण से समझिए।

मान लीजिए हरियाणा के किसान को भी 30 क्विंटल धान की पैदावार हुई। अगर पूरी 30 क्विंटल सरकारी खरीद में चली गई और MSP 2,389 रुपये प्रति क्विंटल रहा, तो 30 क्विंटल की कुल कीमत 71,670 रुपये बनती है। यदि इसमें 200 रुपये प्रति क्विंटल की कटौती का उदाहरण लिया जाए, तो किसान को लगभग 65,670 रुपये प्रति एकड़ मिलने की बात कही गई है।

लेकिन यहां भी एक सवाल है।

क्या 30 क्विंटल प्रति एकड़ वास्तव में हर किसान की औसत पैदावार है या यह अधिकतम/उच्च पैदावार का उदाहरण है? क्योंकि किसान की वास्तविक आय का हिसाब लगाते समय औसत उत्पादन, लागत, कटौती और वास्तविक बिक्री मात्रा को साथ में देखना जरूरी है।

दूसरी तरफ यह भी दावा किया गया है कि हरियाणा में कुल पैदावार की तुलना में 20 से 25 प्रतिशत ज्यादा धान सरकारी खरीद में दर्ज हो जाता है। अगर इस अतिरिक्त खरीद को अलग कर दिया जाए, तो किसान पर लगने वाली कथित 200 रुपये प्रति क्विंटल की कटौती का सवाल भी अलग तरीके से देखा जा सकता है।

अब तमिलनाडु के आंकड़े पर आइए।

तमिलनाडु में लगभग 74 से 80 लाख टन धान उत्पादन होने की बात कही गई है, जबकि पिछले पांच वर्षों में औसतन लगभग 42.5 लाख टन की सरकारी खरीद का आंकड़ा बताया गया है।

अगर उत्पादन और सरकारी खरीद के इन आंकड़ों को एक साथ देखें, तो साफ है कि किसान की पूरी उपज सरकारी खरीद व्यवस्था में नहीं पहुंचती। इसलिए सिर्फ यह कहना कि सरकार ने MSP के ऊपर 159 या 286 रुपये बोनस दे दिया, किसान की वास्तविक आय की पूरी तस्वीर नहीं बताता।

किसान के लिए असली सवाल यह होना चाहिए कि उसे अपनी कुल उपज का कितना हिस्सा MSP या बोनस सहित सरकारी निर्धारित कीमत पर बेचने का अवसर मिलता है।

मान लीजिए सरकार ने कीमत 2,750 रुपये प्रति क्विंटल तय कर दी, लेकिन किसान की 30 क्विंटल उपज में से केवल 18 क्विंटल ही सरकारी खरीद में गई और बाकी 12 क्विंटल उसे खुले बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ी, तो कागज पर दिखाई देने वाली 2,750 रुपये की कीमत पूरी 30 क्विंटल उपज पर लागू नहीं होगी।

यही वजह है कि किसान नीति की चर्चा सिर्फ MSP की घोषणा तक सीमित नहीं होनी चाहिए।

MSP कितनी है?
बोनस कितना है?
सरकारी खरीद कितनी है?
कुल उत्पादन कितना है?
खुले बाजार में किसान को कितनी कीमत मिल रही है?
और सबसे महत्वपूर्ण, किसान की पूरी उपज खरीदने की व्यवस्था कितनी मजबूत है?

इन सभी सवालों को एक साथ देखने की जरूरत है।

किसान के लिए 100 रुपये अधिक MSP की घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण कई बार यह होता है कि उसकी पूरी उपज निर्धारित कीमत पर खरीदी जाए। अगर सरकारी खरीद सीमित है और बाकी उपज खुले बाजार में औने-पौने दाम पर बिकती है, तो घोषित MSP या बोनस का वास्तविक लाभ सीमित रह सकता है।

इसलिए तमिलनाडु में बोनस की घोषणा का स्वागत करते हुए भी यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या सरकार खरीद का दायरा भी बढ़ाएगी?

अगर किसान को वास्तव में राहत देनी है तो सिर्फ बोनस घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा। खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ानी होगी, समय पर खरीद करनी होगी, भुगतान समय पर करना होगा और किसानों को खुले बाजार में मजबूरी में कम कीमत पर धान बेचने से बचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी होगी।

क्योंकि किसान की कमाई सिर्फ उत्पादन से तय नहीं होती। किसान की कमाई इस बात से तय होती है कि वह अपनी पूरी उपज किस कीमत पर बेच पाता है।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि तमिलनाडु ने कितना बोनस दिया और हरियाणा में MSP कितनी है। असली बहस यह होनी चाहिए कि दोनों राज्यों में किसान की कुल उपज में से कितनी मात्रा सरकारी खरीद में जाती है और किसान को वास्तविक रूप से प्रति क्विंटल कितना मिलता है।

अन्नदाता को सिर्फ घोषणा नहीं चाहिए।

उसे अपनी पूरी उपज के लिए भरोसेमंद बाजार, पारदर्शी खरीद, उचित मूल्य और समय पर भुगतान चाहिए।

आपके हिसाब से किसान के लिए क्या ज्यादा जरूरी है-MSP पर बड़ा बोनस या पूरी उपज की MSP पर खरीद?

अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए और इस पोस्ट को उन किसानों तक पहुंचाइए, जिनके लिए धान की कीमत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं बल्कि पूरे साल की मेहनत और परिवार की आय है।

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क्या यह यूरिया की बिक्री है या किसान की मजबूरी का फायदा उठाने का खेल?

जौनपुर के सुजानगंज से सामने आए एक कथित वीडियो ने खाद की बिक्री और किसानों से वसूली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में एक दुकानदार से यूरिया की कीमत पूछी जाती है और बातचीत के दौरान 370 से 380 रुपये प्रति बोरी तक कीमत बताए जाने का दावा किया गया है। वहीं, वीडियो में यह भी कहा गया है कि निर्धारित दर इससे काफी कम है। अगर यह दावा सही है, तो सवाल सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि पूरे खाद वितरण तंत्र की निगरानी का है।

किसान जब खाद खरीदने दुकान पर जाता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि उसे खाद निर्धारित कीमत पर मिलेगी या नहीं। किसान अपनी फसल बचाने के लिए मजबूर है। धान, गेहूं या दूसरी फसलों में समय पर यूरिया की जरूरत होती है। अगर खाद की जरूरत के समय किसान को यह कह दिया जाए कि निर्धारित कीमत पर खाद उपलब्ध नहीं है और ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे, तो किसान आखिर जाए कहां?

सामने आए वीडियो में बातचीत के दौरान दुकानदार से यूरिया की कीमत पूछी जाती है। जवाब में 370 से 380 रुपये तक की कीमत बताए जाने का दावा किया गया है। बातचीत में यह भी कहा गया कि निर्धारित कीमत पर यूरिया नहीं दी जा रही है और किसान को सरकारी गोदाम से लेने की सलाह दी जा रही है। यह पूरा घटनाक्रम वीडियो में रिकॉर्ड होने का दावा किया गया है।

अब यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि अगर किसी उर्वरक की बोरी पर MRP निर्धारित है, तो उससे अधिक कीमत वसूलने का आधार क्या है? किसान को खाद खरीदते समय स्पष्ट बिल मिलना चाहिए, निर्धारित मूल्य की जानकारी होनी चाहिए और यदि किसी अतिरिक्त शुल्क का प्रावधान है तो उसकी वैधता भी स्पष्ट होनी चाहिए। केवल किसान की मजबूरी का फायदा उठाकर मनमानी कीमत वसूलना किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता।

इस मामले में एक और गंभीर सवाल सरकारी दुकानों और समितियों को लेकर भी उठाया गया है। वीडियो में आरोप लगाया गया है कि कुछ सरकारी केंद्रों पर भी निर्धारित दर से अधिक रकम लिए जाने की शिकायतें हैं। यदि ऐसी शिकायतें वास्तव में सामने आ रही हैं, तो संबंधित विभाग को केवल दुकानदारों पर नजर रखने के बजाय सरकारी वितरण केंद्रों की भी जांच करनी चाहिए।

किसान पहले ही डीजल, मजदूरी, बीज, कीटनाशक, सिंचाई और मशीनरी की बढ़ती लागत से परेशान है। ऐसे में अगर एक बोरी यूरिया पर भी अतिरिक्त रकम देनी पड़े तो इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है। छोटी जोत वाले किसान के लिए 100 या 150 रुपये की अतिरिक्त वसूली भी मामूली रकम नहीं होती। अगर किसान को कई बोरी यूरिया खरीदनी पड़े, तो यह अतिरिक्त खर्च सैकड़ों से हजारों रुपये तक पहुंच सकता है।

लेकिन इस पूरे मामले में केवल दुकानदार को दोषी मानकर बात खत्म कर देना भी पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह है कि खाद की बिक्री की निगरानी कौन कर रहा है? दुकानों पर स्टॉक कितना आया, कितने किसानों को दिया गया, किस दर पर दिया गया और किसके नाम पर बिक्री हुई, इसकी जांच व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

अगर किसी दुकान पर निर्धारित दर से अधिक कीमत वसूली जा रही है, तो किसान के पास शिकायत करने का आसान और प्रभावी रास्ता होना चाहिए। शिकायत के बाद सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि मौके पर जांच और दोष साबित होने पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।

और अगर वीडियो में लगाए गए आरोप गलत हैं, तो संबंधित दुकानदार को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। प्रशासन को निष्पक्ष जांच करके यह स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तव में खाद किस कीमत पर बेची जा रही थी, बोरी पर क्या MRP अंकित थी, बिक्री का बिल क्या था और स्टॉक का रिकॉर्ड क्या कहता है।

यही वजह है कि इस मामले में सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है निष्पक्ष जांच।

जौनपुर प्रशासन और कृषि विभाग को सुजानगंज सहित जिले के उन सभी स्थानों पर जांच करनी चाहिए जहां से किसानों द्वारा अधिक कीमत पर यूरिया बेचने की शिकायतें सामने आ रही हैं। दुकानों के स्टॉक रजिस्टर, बिक्री रजिस्टर, POS रिकॉर्ड, बिल और उपलब्ध खाद के बैच की जांच की जानी चाहिए। अगर निर्धारित दर से अधिक वसूली प्रमाणित होती है तो नियमों के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

साथ ही किसानों को भी खाद खरीदते समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए। खाद खरीदते समय बोरी पर अंकित MRP जरूर देखें। संभव हो तो बिक्री की रसीद या बिल जरूर लें। बिना बिल के खाद लेने से बाद में शिकायत साबित करना मुश्किल हो सकता है। यदि कोई दुकानदार निर्धारित कीमत से अधिक पैसे मांगता है, तो किसान संबंधित कृषि विभाग या प्रशासन के समक्ष शिकायत कर सकता है।

सबसे जरूरी बात यह है कि किसान को खाद के लिए किसी दुकानदार के सामने मजबूर होकर अतिरिक्त पैसे देने की स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। सरकार किसानों को सब्सिडी के माध्यम से उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था करती है। ऐसे में वितरण व्यवस्था का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वास्तविक किसान तक खाद पारदर्शी तरीके से और निर्धारित शर्तों के अनुसार पहुंचे।

यह मामला सिर्फ यूरिया की एक बोरी का नहीं है। यह किसान के अधिकार, खाद की उपलब्धता और सरकारी निगरानी की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।

अगर सुजानगंज में वास्तव में निर्धारित दर से 100 रुपये या उससे अधिक अतिरिक्त वसूले जाने की बात सही साबित होती है, तो यह बेहद गंभीर मामला है। और अगर आरोप गलत हैं, तो जांच के बाद सच्चाई भी जनता के सामने आनी चाहिए।

किसान को न तो खाद के लिए दर-दर भटकना चाहिए और न ही अपनी फसल बचाने के लिए किसी भी कीमत पर खाद खरीदने को मजबूर होना चाहिए।

अब सवाल जौनपुर प्रशासन से है-क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या सुजानगंज में खाद की दुकानों और सरकारी केंद्रों के स्टॉक एवं बिक्री रिकॉर्ड की जांच की जाएगी? क्या किसानों से निर्धारित कीमत से अधिक वसूली की शिकायतों पर कार्रवाई होगी?

और किसान भाइयों से भी सवाल है-आपके गांव में यूरिया किस कीमत पर मिल रही है? क्या आपको निर्धारित दर पर खाद मिल रही है या अतिरिक्त पैसे देने पड़ रहे हैं? क्या आपको बिल या रसीद मिलती है?

अपना अनुभव कमेंट में जरूर बताइए। लेकिन किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय अपनी शिकायत के साथ बिल, रसीद या अन्य उपलब्ध प्रमाण साझा करें, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

किसान की मजबूरी किसी की कमाई का जरिया नहीं बननी चाहिए। खाद की कालाबाजारी या ओवररेटिंग जहां भी प्रमाणित हो, वहां नियम के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

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गाय पालने वाले किसानों के लिए कमाई का एक नया रास्ता खुल सकता है। उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर के गोमूत्र डेयरी मॉडल को पूरे प्रदेश में लागू करने की तैयारी की जा रही है।

बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव से शुरू हुए पायलट प्रोजेक्ट में आसपास के 15 गांवों को जोड़ा गया है। गांवों में गोमूत्र संग्रह केंद्र बनाए गए हैं, जहां करीब 200 लीटर क्षमता के टैंक लगाए गए हैं। फिलहाल इन केंद्रों के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है।

इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि गोमूत्र को बेकार समझने के बजाय पशुपालकों के लिए आय का साधन बनाने की कोशिश की जा रही है। एफपीओ द्वारा गोमूत्र लगभग 10 रुपये प्रति लीटर की दर से खरीदा जा रहा है। गांवों में संग्रहण में सहयोग करने वाली महिलाओं को प्रति लीटर 2 रुपये कमीशन भी दिया जा रहा है।

इस पहल में लगभग 300 महिलाओं को जोड़े जाने की बात सामने आई है। यानी यह सिर्फ पशुपालन से जुड़ी योजना नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए भी आय का अवसर पैदा करने का प्रयास है।

एकत्र किए गए गोमूत्र में जड़ी-बूटियां आदि मिलाकर कृषि उपयोग के लिए कीट नियंत्रक और अन्य उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन्हें समितियों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाने की योजना है।

सरकार आगे चलकर गोमूत्र की खरीद कीमत को 20 रुपये प्रति लीटर तक ले जाने की कोशिश कर रही है। अगर ऐसा होता है तो नियमित रूप से गाय पालने वाले किसानों और पशुपालकों के लिए अतिरिक्त आमदनी का एक नया स्रोत बन सकता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। गोमूत्र से बनने वाले किसी भी कृषि उत्पाद को किसान सीधे खेत में इस्तेमाल करने से पहले उसके उपयोग, मात्रा, फसल और सुरक्षा संबंधी वैज्ञानिक अनुशंसाओं को जरूर देखें। केवल यह सोचकर कि उत्पाद प्राकृतिक है, उसकी मात्रा बढ़ा देना सही नहीं होगा।

अगर यह मॉडल पारदर्शी तरीके से लागू होता है, गोमूत्र की खरीद का भुगतान समय पर होता है, महिलाओं और पशुपालकों को उचित कीमत मिलती है और तैयार कृषि उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है।

सबसे जरूरी सवाल यही है कि इसका वास्तविक फायदा किसे मिलेगा? अगर पशुपालक को गोमूत्र का उचित मूल्य मिले, महिलाओं को संग्रहण से नियमित आय मिले और एफपीओ किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि उत्पाद उचित कीमत पर उपलब्ध कराए, तभी यह मॉडल वास्तव में सफल माना जाएगा।

गाय पालने वाले किसानों के लिए दूध के अलावा गोबर और गोमूत्र से भी आय का रास्ता बनाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। अब जरूरत है कि इस मॉडल को सिर्फ योजना और प्रचार तक सीमित न रखा जाए, बल्कि गांव स्तर पर इसकी पूरी व्यवस्था, खरीद, भुगतान, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को मजबूत किया जाए।

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बिहार के आम, अमरूद और लीची उत्पादक किसानों के लिए अच्छी खबर है। बगीचों में कीट और रोगों से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बिहार सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 से “बगीचों में कीट प्रबंधन योजना” शुरू की है। इस योजना के तहत वैज्ञानिक तरीके से कीटनाशी का छिड़काव कराने पर किसानों को 75 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाएगा।

बागवानी फसलों में कीट और रोग समय पर नियंत्रित नहीं किए जाएं तो इसका सीधा असर फल की गुणवत्ता, उत्पादन और किसान की आमदनी पर पड़ता है। कई बार किसान समस्या दिखाई देने के बाद छिड़काव शुरू करते हैं, जबकि उस समय तक फसल को काफी नुकसान हो चुका होता है। इसी समस्या को देखते हुए इस योजना के माध्यम से आम, अमरूद और लीची के बगीचों में वैज्ञानिक एवं समयबद्ध कीट प्रबंधन को बढ़ावा देने की बात कही गई है।

योजना के तहत आम के बगीचों में पहले छिड़काव के लिए 57 रुपये प्रति वृक्ष की दर निर्धारित की गई है, जिस पर 75 प्रतिशत अनुदान मिलेगा। वहीं दूसरे छिड़काव के लिए 72 रुपये प्रति वृक्ष की दर से 75 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा।

अमरूद उत्पादक किसानों के लिए पहले छिड़काव पर 33 रुपये प्रति वृक्ष और दूसरे छिड़काव पर 45 रुपये प्रति वृक्ष की दर से 75 प्रतिशत अनुदान का प्रावधान बताया गया है।

लीची के किसानों के लिए पहले छिड़काव की दर 162 रुपये प्रति वृक्ष और दूसरे छिड़काव की दर 114 रुपये प्रति वृक्ष रखी गई है। इन दोनों छिड़काव पर भी किसानों को 75 प्रतिशत अनुदान मिलेगा।

अगर इन दरों को समझें तो उदाहरण के तौर पर आम के पहले छिड़काव की निर्धारित दर 57 रुपये प्रति वृक्ष है। इसका 75 प्रतिशत यानी 42.75 रुपये अनुदान के रूप में होता है और शेष 14.25 रुपये किसान के हिस्से के बराबर बैठते हैं। आम के दूसरे छिड़काव में 72 रुपये की दर पर 75 प्रतिशत यानी 54 रुपये अनुदान और 18 रुपये किसान के हिस्से के बराबर होंगे।

अमरूद में पहले छिड़काव की 33 रुपये की दर पर 75 प्रतिशत यानी 24.75 रुपये और दूसरे छिड़काव की 45 रुपये की दर पर 33.75 रुपये अनुदान के बराबर होते हैं।

लीची में पहले छिड़काव की 162 रुपये की दर पर 75 प्रतिशत यानी 121.50 रुपये और दूसरे छिड़काव की 114 रुपये की दर पर 85.50 रुपये अनुदान के बराबर होंगे।

हालांकि किसान यह ध्यान रखें कि ये गणनाएं योजना में दी गई प्रति वृक्ष दर के 75 प्रतिशत के आधार पर हैं। वास्तविक भुगतान और लाभ लेने की प्रक्रिया विभाग द्वारा निर्धारित नियमों और पात्रता के अनुसार होगी।

इस योजना का उद्देश्य सिर्फ कीटनाशी का छिड़काव करवाना नहीं है, बल्कि बगीचों में वैज्ञानिक तरीके से कीट एवं रोग प्रबंधन को बढ़ावा देना है। सही समय पर सही तरीके से छिड़काव होने से कीट और रोगों के कारण होने वाले नुकसान को कम करने, फलों की गुणवत्ता सुधारने और उत्पादन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

किसानों के लिए यह बात भी महत्वपूर्ण है कि कीटनाशी का इस्तेमाल अपनी मनमर्जी से नहीं किया जाना चाहिए। कौन-सी समस्या के लिए कौन-सा कीटनाशी, कितनी मात्रा में और किस समय इस्तेमाल करना है, यह वैज्ञानिक अनुशंसा के अनुसार ही तय किया जाना चाहिए। जरूरत से ज्यादा या गलत कीटनाशी का इस्तेमाल खेती की लागत बढ़ाने के साथ-साथ फसल और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।

बिहार के आम, अमरूद और लीची उत्पादक किसान इस योजना का लाभ लेने के लिए विभाग के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। इसलिए इच्छुक किसान आवेदन की प्रक्रिया, पात्रता, जरूरी दस्तावेज और अन्य शर्तों की जानकारी विभागीय पोर्टल से जरूर 확인 कर लें।

बागवानी में एक अच्छी फसल सिर्फ पेड़ लगाने से नहीं मिलती। पेड़ की सही देखभाल, पोषण प्रबंधन, सिंचाई, छंटाई और समय पर कीट एवं रोग नियंत्रण सभी जरूरी हैं। अगर सरकार की इस योजना के माध्यम से किसानों को वैज्ञानिक छिड़काव की सुविधा और आर्थिक सहायता मिलती है, तो इससे बागवानी की लागत कम करने और उत्पादन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

खासकर छोटे और सीमांत बागवानों के लिए 75 प्रतिशत तक की सहायता महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि कीट और रोग नियंत्रण में होने वाला खर्च कई बार उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा बन जाता है। अनुदान मिलने से किसान समय पर बगीचे का उपचार करा सकेंगे और केवल लागत के कारण छिड़काव टालने की समस्या कम हो सकती है।

लेकिन किसानों को एक बात जरूर ध्यान रखनी चाहिए—अनुदान का मतलब यह नहीं कि हर स्थिति में कीटनाशी का छिड़काव करना जरूरी है। बगीचे में वास्तविक कीट या रोग की स्थिति, उसकी गंभीरता और विभागीय अनुशंसा के आधार पर ही प्रबंधन किया जाना चाहिए।

सरकार की ओर से कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने किसानों से इस योजना का अधिक से अधिक लाभ लेने की अपील की है। योजना का लक्ष्य उद्यानिकी फसलों की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ कीट एवं रोगों से होने वाले नुकसान को कम करना और बागवानी को किसानों के लिए अधिक लाभकारी बनाना है।

अब सवाल यह है कि आपके बगीचे में आम, अमरूद या लीची में सबसे ज्यादा किस कीट या रोग की समस्या आती है?

क्या आपके जिले में किसानों को इस तरह की सरकारी योजना की जानकारी समय पर मिलती है?

अगर आप बिहार के किसान हैं और आपके पास आम, अमरूद या लीची का बगीचा है, तो इस जानकारी को दूसरे बागवान किसानों तक जरूर पहुंचाएं, ताकि पात्र किसान योजना का लाभ लेने से वंचित न रहें।

योजना की मुख्य जानकारी एक नजर में:

आम — पहला छिड़काव: 57 रुपये/वृक्ष, 75% अनुदान
आम — दूसरा छिड़काव: 72 रुपये/वृक्ष, 75% अनुदान

अमरूद — पहला छिड़काव: 33 रुपये/वृक्ष, 75% अनुदान
अमरूद — दूसरा छिड़काव: 45 रुपये/वृक्ष, 75% अनुदान

लीची — पहला छिड़काव: 162 रुपये/वृक्ष, 75% अनुदान
लीची — दूसरा छिड़काव: 114 रुपये/वृक्ष, 75% अनुदान

आवेदन ऑनलाइन माध्यम से किया जा सकता है। आवेदन करने से पहले विभागीय पोर्टल पर योजना की पात्रता और वर्तमान दिशा-निर्देश जरूर जांच लें।

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किसान भाइयों, फसल में कीटों का प्रकोप शुरू होते ही सही कीटनाशी का चुनाव करना बहुत जरूरी है, क्योंकि हर कीट के लिए हर दवा प्रभावी नहीं होती। खासकर थ्रिप्स, फल छेदक, तना छेदक, इल्ली, लीफ फोल्डर, पॉड बोरर और दूसरी लेपिडोप्टेरन श्रेणी की सुंडियों के प्रबंधन के लिए किसानों के बीच Delegate Insecticide का इस्तेमाल किया जाता है।

Delegate में Spinetoram 11.7% SC सक्रिय तत्व होता है। यह Spinosyn समूह का कीटनाशी है और इसे IRAC Group 5 में वर्गीकृत किया जाता है। यह कीट के शरीर में संपर्क तथा भोजन के माध्यम से प्रवेश करके उसके तंत्रिका तंत्र पर असर डालता है। इसके प्रभाव से कीट का भोजन करना बहुत जल्दी बंद हो जाता है और इसके बाद धीरे-धीरे उसकी मृत्यु होने लगती है।

इसकी एक खास विशेषता translaminar movement बताई जाती है। यानी छिड़काव के बाद सक्रिय तत्व पत्ती के ऊतकों में प्रवेश कर पत्ती की दूसरी सतह तक पहुंच सकता है। इसलिए पत्तियों के अंदर या नीचे छिपे कुछ कीटों के नियंत्रण में भी यह उपयोगी हो सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव फसल, कीट की अवस्था, प्रकोप की तीव्रता और छिड़काव की गुणवत्ता पर निर्भर करेगा।

Delegate का इस्तेमाल कई फसलों में अलग-अलग कीटों के लिए किया जाता है। इसमें कपास, सोयाबीन, मिर्च, टमाटर, भिंडी, बैंगन, चना, अरहर, अंगूर, धान, आम और मक्का जैसी फसलें शामिल हैं। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि हर फसल में इसकी मात्रा एक जैसी नहीं होती। इसलिए केवल किसी दूसरे किसान की बताई हुई मात्रा देखकर दवा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

कपास में थ्रिप्स के लिए दिए गए विवरण के अनुसार 168 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है और पानी की मात्रा 200 से 400 लीटर रखी जाती है। स्पॉटेड बोलवर्म के लिए 168 से 188 मिलीलीटर प्रति एकड़, जबकि पिंक बोलवर्म के लिए 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। तंबाकू इल्ली के लिए भी 168 से 188 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है। कपास में दिए गए विवरण के अनुसार प्रतीक्षा अवधि यानी PHI 30 दिन है।

सोयाबीन में तंबाकू इल्ली के नियंत्रण के लिए 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। इसके लिए 200 से 250 लीटर पानी का उपयोग बताया गया है। सोयाबीन में भी दिए गए विवरण के अनुसार PHI 30 दिन है।

मिर्च में थ्रिप्स, फल छेदक और तंबाकू इल्ली के लिए 188 से 200 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। पानी की मात्रा 160 से 200 लीटर बताई गई है। मिर्च में दिए गए विवरण के अनुसार प्रतीक्षा अवधि 7 दिन है।

भिंडी में फल छेदक और शूट एंड फ्रूट बोरर के लिए 150 से 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। पानी की मात्रा 200 से 400 लीटर बताई गई है और PHI 3 दिन दिया गया है।

बैंगन में शूट एंड फ्रूट बोरर के नियंत्रण के लिए भी 150 से 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। 200 से 400 लीटर पानी में इसका छिड़काव करने की जानकारी दी गई है। यहां भी दिए गए विवरण के अनुसार PHI 3 दिन है।

चना फसल में पॉड बोरर के लिए 150 से 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है और 200 लीटर पानी में छिड़काव करने की जानकारी दी गई है। चना में PHI 20 दिन दिया गया है।

अरहर में पॉड बोरर के लिए 150 से 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है। 200 लीटर पानी में इसका छिड़काव करने की जानकारी दी गई है और PHI 23 दिन बताया गया है।

अंगूर में थ्रिप्स के लिए 120 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। पानी की मात्रा 200 से 400 लीटर बताई गई है और PHI 5 दिन दिया गया है।

धान की फसल में Delegate का उपयोग खास तौर पर Yellow Stem Borer यानी पीला तना छेदक और Leaf Folder यानी पत्ती लपेटक के लिए दिए गए विवरण में बताया गया है। Yellow Stem Borer के लिए 140 से 150 मिलीलीटर प्रति एकड़ और 200 लीटर पानी की मात्रा दी गई है। वहीं Leaf Folder के लिए 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ और 200 लीटर पानी बताया गया है। धान में दोनों मामलों के लिए दिए गए विवरण के अनुसार PHI 20 दिन है।

किसानों को यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए कि धान में तना छेदक और लीफ फोल्डर दिखाई देने मात्र से तुरंत दवा का छिड़काव करना जरूरी नहीं है। कीट की संख्या, फसल की अवस्था और आर्थिक नुकसान की स्थिति को देखकर निर्णय लेना ज्यादा उचित है। जरूरत पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ या स्थानीय कृषि विभाग की सलाह भी ली जा सकती है।

टमाटर में फल छेदक, तंबाकू इल्ली, लीफ माइनर और Tomato Pinworm के लिए 150 से 180 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा दी गई है। 200 लीटर पानी में छिड़काव की जानकारी है और PHI 3 दिन बताया गया है।

मक्का में Fall Armyworm यानी फॉल आर्मीवर्म के लिए दिए गए विवरण में 100 मिलीलीटर प्रति एकड़ और 200 लीटर पानी की मात्रा बताई गई है। यहां PHI 32 दिन दिया गया है।

आम में थ्रिप्स के लिए 0.4 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की मात्रा दी गई है और दिए गए विवरण के अनुसार PHI 21 दिन है।

Delegate को कीट दिखाई देने के शुरुआती चरण में इस्तेमाल करने की जानकारी दी गई है। इसका मतलब यह नहीं कि किसान फसल में बिना कीट देखे बार-बार छिड़काव करते रहें। कीट की पहचान, प्रकोप की स्थिति और फसल की अवस्था को ध्यान में रखना जरूरी है।

इस दवा का एक और महत्वपूर्ण पहलू है resistance management। एक ही रासायनिक समूह की कीटनाशी दवाओं का लगातार इस्तेमाल करने से समय के साथ कीटों में प्रतिरोध विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए कीट प्रबंधन में अलग-अलग IRAC समूहों की प्रभावी दवाओं को उचित रणनीति के साथ बदल-बदलकर इस्तेमाल करना महत्वपूर्ण है। Delegate को बार-बार लगातार इस्तेमाल करने के बजाय समेकित कीट प्रबंधन यानी IPM का हिस्सा बनाना ज्यादा उचित है।

छिड़काव करते समय केवल दवा की मात्रा ही नहीं, बल्कि पानी की मात्रा और स्प्रे की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है। पत्तियों पर समान रूप से छिड़काव होना चाहिए। बहुत तेज हवा में छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे दवा बहकर दूसरी जगह जा सकती है और छिड़काव करने वाले व्यक्ति के संपर्क में आने का खतरा भी बढ़ सकता है।

कीटनाशी का इस्तेमाल करते समय दस्ताने, मास्क, पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े और आंखों की सुरक्षा के लिए गॉगल्स का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। दवा को संभालते समय खाना, पीना या धूम्रपान नहीं करना चाहिए। छिड़काव के बाद हाथ, चेहरा और खुले हुए शरीर के हिस्सों को अच्छी तरह धोना चाहिए।

दवा को बच्चों, पशुओं और खाद्य सामग्री से दूर रखना चाहिए। इसे मूल पैक में, ठंडी, सूखी और हवादार जगह पर तथा सीधी धूप से दूर रखना चाहिए। किसी दूसरी दवा के साथ टैंक मिक्स करने से पहले उसकी compatibility की पुष्टि करना जरूरी है। दिए गए विवरण में भी tank mix करने से पहले कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेने की बात कही गई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऊपर दी गई मात्रा उत्पाद के उपलब्ध विवरण पर आधारित है। अलग-अलग फसल, कीट, उत्पाद लेबल या पंजीकृत उपयोग के अनुसार सिफारिश बदल सकती है। इसलिए खेत में वास्तविक छिड़काव करने से पहले अपने पास मौजूद Delegate के पैक पर दिए गए आधिकारिक लेबल और लीफलेट को जरूर देखें और उसी के अनुसार मात्रा, पानी की मात्रा, PHI तथा अन्य निर्देशों का पालन करें।

किसान भाइयों, कीटनाशी का मतलब यह नहीं है कि जितनी ज्यादा दवा डालेंगे, उतना अच्छा परिणाम मिलेगा। सही कीट की पहचान, सही समय, सही मात्रा, पर्याप्त पानी, उचित कवरेज और सही अंतराल-ये सभी मिलकर कीट नियंत्रण को प्रभावी बनाते हैं।

अगर फसल में कीट का प्रकोप है तो पहले यह पहचानिए कि कीट कौन-सा है। इसके बाद देखें कि उस फसल और उस कीट के लिए Delegate की सिफारिश है या नहीं। फिर फसल के अनुसार निर्धारित डोज में ही छिड़काव करें। बिना जानकारी के डोज बढ़ाना या बार-बार छिड़काव करना किसानों की लागत बढ़ा सकता है और कीटों में resistance की समस्या भी पैदा कर सकता है।

किसान भाइयों, आपके खेत में इस समय कौन-सी फसल है और उसमें कौन-सा कीट सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है? धान में Leaf Folder, Yellow Stem Borer, मिर्च में Thrips, टमाटर में Fruit Borer, चने में Pod Borer या मक्का में Fall Armyworm?

कमेंट में अपनी फसल, फसल की उम्र और कीट का नाम जरूर बताइए। जानकारी सही होगी तो कीट प्रबंधन पर चर्चा भी सही दिशा में होगी।

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किस कारण हो रहा है?
किसानों के लिए लोन लेना होगा आसान, लोकसभा में पेश हुआ NCDC संशोधन विधेयक

किसानों और छोटे कारोबारियों के लिए बड़ी खबर सामने आई है। सहकारी समितियों से जुड़े किसानों और सहकारी क्षेत्र में काम करने वाली पात्र संस्थाओं के लिए कर्ज और वित्तीय सहायता का रास्ता आसान करने के उद्देश्य से सरकार ने लोकसभा में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम यानी NCDC संशोधन विधेयक पेश किया है।

इस प्रस्तावित संशोधन का मुख्य उद्देश्य NCDC की वित्तीय सहायता को अधिक सीधा, लचीला और समयबद्ध बनाना है। अभी कई ऐसी संस्थाएं हैं जो सहकारी क्षेत्र में काम करती हैं, लेकिन उन्हें NCDC से सीधे वित्तीय सहायता लेने में कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है।

नए प्रावधान लागू होने के बाद NCDC केवल सहकारी समितियों तक सीमित नहीं रहेगा। वह सहकारी क्षेत्र में काम करने वाली ऐसी पात्र संस्थाओं को भी सीधे ऋण और अनुदान दे सकेगा, जिनके माध्यम से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल सहकारी समितियों के लाभ के लिए किया जाना हो।

इसका सबसे बड़ा फायदा उन परियोजनाओं को मिल सकता है, जिनके लिए बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए किसी दुग्ध सहकारी समिति को दूध ठंडा करने का केंद्र बनाना हो, किसान सहकारी समिति को भंडारण या प्रसंस्करण सुविधा तैयार करनी हो या मछली उत्पादन और विपणन से जुड़ा ढांचा विकसित करना हो, तो ऐसी परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता का रास्ता आसान हो सकता है।

सरल शब्दों में समझें तो अगर कोई पात्र संस्था सहकारी समितियों के हित में काम कर रही है, तो उसे वित्तीय सहायता पाने के लिए हर बार राज्य सरकार या किसी दूसरी सहकारी संस्था को बीच में लाने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे परियोजनाओं को मंजूरी मिलने और जमीन पर काम शुरू होने में लगने वाला समय कम होने की संभावना है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसान को NCDC से सीधे व्यक्तिगत लोन मिल जाएगा। प्रस्तावित व्यवस्था मुख्य रूप से सहकारी समितियों और सहकारी विकास से जुड़ी पात्र संस्थाओं के लिए वित्तीय सहायता का दायरा बढ़ाने पर केंद्रित है। इसलिए किसानों को इसका लाभ मुख्य रूप से अपनी सहकारी समितियों और उनके माध्यम से विकसित होने वाली सुविधाओं के जरिए मिल सकता है।

विधेयक में NCDC को सरकार की मंजूरी से सहकारी समितियों या सहकारी विकास से जुड़ी पात्र संस्थाओं की शेयर पूंजी में हिस्सा लेने का अधिकार देने का भी प्रस्ताव है। यानी NCDC की भूमिका केवल कर्ज देने वाली संस्था तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जरूरत के अनुसार वह कुछ परियोजनाओं में पूंजीगत भागीदारी भी कर सकेगा।

इससे उन सहकारी परियोजनाओं को मजबूती मिल सकती है जिनमें शुरुआत में बड़ी पूंजी की जरूरत होती है। खासकर डेयरी, कृषि भंडारण, प्रसंस्करण, मछली पालन और सहकारी क्षेत्र से जुड़ी अन्य गतिविधियों में इसका महत्व हो सकता है।

सरकार ने 2025-26 से 2028-29 के बीच चार वर्षों में NCDC को ₹2,000 करोड़ का अनुदान देने का फैसला किया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इस सरकारी सहायता के आधार पर NCDC करीब ₹20,000 करोड़ जुटाकर सहकारी क्षेत्र को कर्ज देने की अपनी क्षमता बढ़ा सकेगा।

अगर यह वित्तीय क्षमता वास्तव में सहकारी क्षेत्र तक प्रभावी तरीके से पहुंचती है, तो इसका फायदा किसानों को कई स्तरों पर मिल सकता है। बेहतर भंडारण व्यवस्था बनने से किसान अपनी उपज को मजबूरी में तुरंत बेचने से बच सकते हैं। प्रसंस्करण इकाइयां बनने से कृषि उत्पादों में वैल्यू एडिशन हो सकता है और डेयरी या मत्स्य क्षेत्र में आधारभूत ढांचा मजबूत होने से किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित हो सकते हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है। केवल कानून में संशोधन कर देने से किसानों को अपने आप सस्ता और आसान कर्ज नहीं मिलेगा। असली चुनौती यह होगी कि नई व्यवस्था कितनी पारदर्शी, तेज और जमीन पर किसान-केंद्रित तरीके से लागू होती है।

किसानों और सहकारी समितियों को यह भी देखना होगा कि वित्तीय सहायता की प्रक्रिया अनावश्यक कागजी कार्रवाई और लंबी मंजूरी प्रक्रिया में न फंस जाए। अगर उद्देश्य वित्तीय सहायता को सीधा और समयबद्ध बनाना है, तो आवेदन से लेकर ऋण स्वीकृति और राशि जारी होने तक पूरी प्रक्रिया सरल और पारदर्शी होनी चाहिए।

साथ ही छोटे और कमजोर सहकारी संगठनों के लिए भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे केवल बड़े और मजबूत संस्थान ही इसका लाभ न उठा सकें। गांव स्तर की किसान सहकारी समितियां, छोटे डेयरी संगठन, कृषि प्रसंस्करण से जुड़े समूह और अन्य पात्र संस्थाएं भी अपनी आवश्यकता के अनुसार इस वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच सकें, तभी इसका वास्तविक लाभ व्यापक स्तर पर दिखाई देगा।

किसानों के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सहकारिता के माध्यम से सामूहिक आर्थिक ताकत बढ़ाने की संभावना बन सकती है। अकेला किसान भंडारण, प्रसंस्करण या मार्केटिंग के लिए बड़ी पूंजी जुटाने में कठिनाई महसूस कर सकता है, लेकिन मजबूत सहकारी संस्था इन सुविधाओं को सामूहिक रूप से विकसित कर सकती है।

उदाहरण के तौर पर अगर किसी क्षेत्र की किसान सहकारी समिति के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन हों और वह अपनी उपज के लिए गोदाम, ग्रेडिंग, पैकेजिंग या प्रसंस्करण सुविधा तैयार कर सके, तो किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए केवल स्थानीय बिचौलियों पर निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है।

इसी तरह डेयरी क्षेत्र में दूध संग्रह और शीतकरण केंद्र, मत्स्य क्षेत्र में उत्पादन और विपणन का ढांचा तथा कृषि क्षेत्र में भंडारण और प्रसंस्करण जैसी सुविधाएं किसानों की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत कर सकती हैं।

इसलिए NCDC संशोधन विधेयक को केवल एक और वित्तीय कानून के रूप में देखने के बजाय सहकारी क्षेत्र की वित्तीय क्षमता बढ़ाने की कोशिश के रूप में समझना चाहिए। हालांकि इसका वास्तविक असर तभी पता चलेगा जब प्रस्तावित प्रावधान कानून बनने के बाद किस तरह लागू किए जाते हैं और कितनी पात्र संस्थाओं तक वित्तीय सहायता पहुंचती है।

किसानों के लिए अच्छी खबर यह है कि सहकारी क्षेत्र में काम करने वाली पात्र संस्थाओं को सीधे ऋण और अनुदान देने का रास्ता खुल सकता है। लेकिन किसानों के लिए असली फायदा तभी होगा जब यह पैसा कागजों से निकलकर गांव, सहकारी समिति, गोदाम, डेयरी, प्रसंस्करण इकाई और किसान की आर्थिक गतिविधि तक पहुंचे।

कानून बनना पहला कदम है, लेकिन किसान तक लाभ पहुंचना असली परीक्षा होगी।

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🌳 खेत की मेड़ खाली क्यों छोड़ें? इसे भविष्य की अतिरिक्त आय का साधन बनाइए! 💰
अगर आपके पास 2–3 एकड़ जमीन है और आप हर साल गेहूं, धान या सब्जियां उगाते हैं, तो खेत की मेड़ यानी Boundary को आपने कितनी बार income source की तरह देखा है?
अधिकतर किसान मेड़ को खाली छोड़ देते हैं। लेकिन सही planning के साथ इसी जगह पर African Mahogany और Malabar Neem जैसे commercial timber trees लगाए जा सकते हैं।
🌱 Boundary Agroforestry के फायदे:
✅ मुख्य फसल का क्षेत्र बचाते हुए अतिरिक्त पेड़
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✅ खेत की खाली मेड़ का बेहतर उपयोग
✅ भविष्य में लकड़ी से अतिरिक्त आय की संभावना
✅ सही pruning और spacing से crop पर अनावश्यक छाया को कम किया जा सकता है
लेकिन ध्यान रखें—पेड़ लगाना सिर्फ पौधा लगाने का काम नहीं है। सही species, spacing, direction, pruning, irrigation और स्थानीय बाजार की जानकारी बेहद जरूरी है।
और सबसे महत्वपूर्ण बात: सोशल मीडिया पर महोगनी से करोड़ों की कमाई के जो दावे किए जाते हैं, उन्हें गारंटी न समझें। वास्तविक कमाई पेड़ की उम्र, तने के आकार, लकड़ी की गुणवत्ता, स्थानीय बाजार भाव, कटाई और परिवहन लागत पर निर्भर करती है।
⚠️ पेड़ लगाने से पहले अपने राज्य में कटाई, परिवहन और बिक्री से जुड़े नियमों की जानकारी जरूर लें और पौधे विश्वसनीय नर्सरी से ही खरीदें।
🌾 आप अपने खेत की मेड़ पर कौन-सा पेड़ लगाना पसंद करेंगे—महोगनी या मालाबार नीम?
कमेंट में जरूर बताइए। 👇
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मध्य प्रदेश में कृषि क्षेत्र से जुड़े युवाओं, किसानों, कृषि उद्यमियों और ग्रामीण बेरोजगारों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर सामने आया है। राज्य सरकार ने कृषि यंत्र किराए पर उपलब्ध कराने वाली कस्टम हायरिंग सेंटर यानी CHC स्थापित करने के लिए ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए हैं। इस योजना के तहत प्रदेश में कुल 1,000 कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य किसानों को महंगे कृषि यंत्र खरीदने के बजाय जरूरत के अनुसार किराए पर आधुनिक मशीनें उपलब्ध कराना है, ताकि खेती की लागत कम हो और कृषि कार्य समय पर पूरा किया जा सके।

कृषि यंत्रीकरण आज खेती की जरूरत बन चुका है। खेत की जुताई, बुवाई, रोपाई, निराई-गुड़ाई, फसल कटाई, अवशेष प्रबंधन और अन्य कृषि कार्यों के लिए आधुनिक मशीनों की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए ट्रैक्टर, सीड ड्रिल, रोटावेटर, मल्चर, रीपर, हार्वेस्टर और अन्य कृषि यंत्र खरीदना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में कस्टम हायरिंग सेंटर किसानों और कृषि उद्यमियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश में इस बार 1,000 CHC स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इच्छुक पात्र व्यक्ति निर्धारित अवधि में ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। आवेदन की प्रक्रिया 7 अगस्त 2026 से शुरू होगी और 21 अगस्त 2026 तक चलेगी। इसलिए जो लोग इस योजना का लाभ उठाकर कृषि यंत्र किराए पर उपलब्ध कराने का व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, उन्हें अंतिम तारीख का इंतजार नहीं करना चाहिए। आवेदन से पहले सभी पात्रता शर्तों, आवश्यक दस्तावेजों और बैंक ड्राफ्ट से संबंधित जानकारी को ध्यान से जांच लेना बेहतर रहेगा।

इस योजना के लिए आवेदन करने वाले आवेदकों को ₹10,000 का बैंक ड्राफ्ट जमा करना होगा। यानी केवल ऑनलाइन फॉर्म भरना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन राशि का बैंक ड्राफ्ट भी तैयार रखना होगा। बैंक ड्राफ्ट बनवाते समय उसके नाम, राशि और अन्य विवरण में किसी प्रकार की गलती न हो, इसका विशेष ध्यान रखें। गलत बैंक ड्राफ्ट या अधूरे दस्तावेज के कारण आवेदन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि CHC की जिलावार प्राथमिकता कंप्यूटरीकृत लॉटरी के माध्यम से निर्धारित की जाएगी। इसके लिए 22 अगस्त 2026 को दोपहर 12 बजे कंप्यूटरीकृत लॉटरी की प्रक्रिया होगी। लॉटरी के बाद चयनित या प्राथमिकता सूची में आने वाले आवेदकों की जानकारी उसी दिन शाम 5 बजे से संबंधित पोर्टल पर देखी जा सकेगी। इसका मतलब यह है कि आवेदन करने वाले व्यक्ति को केवल आवेदन करके निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए। उसे निर्धारित तारीख पर पोर्टल पर अपनी स्थिति भी जांचनी होगी।

लॉटरी में प्राथमिकता निर्धारित होने के बाद दस्तावेज और बैंक ड्राफ्ट जमा करने की प्रक्रिया 24 और 25 अगस्त 2026 को पूरी करनी होगी। इसलिए आवेदन करने वाले व्यक्ति को अभी से अपने दस्तावेज व्यवस्थित कर लेने चाहिए। अंतिम समय पर दस्तावेज जुटाने में परेशानी हो सकती है और किसी महत्वपूर्ण कागज के अभाव में प्रक्रिया अधूरी रह सकती है।

इस योजना को केवल सरकारी अनुदान या मशीन लेने की योजना के रूप में नहीं देखना चाहिए। कस्टम हायरिंग सेंटर ग्रामीण क्षेत्र में एक कृषि सेवा व्यवसाय का अवसर भी बन सकता है। यदि किसी क्षेत्र में किसानों को समय पर कृषि मशीनें उपलब्ध नहीं होती हैं, तो वहां CHC के माध्यम से मशीनें किराए पर देकर किसानों को सुविधा दी जा सकती है। किसान अपनी जरूरत और खेती के क्षेत्रफल के अनुसार मशीन किराए पर ले सकते हैं और उन्हें हर मशीन खरीदने के लिए बड़ी पूंजी लगाने की जरूरत नहीं होगी।

कस्टम हायरिंग सेंटर का सबसे बड़ा फायदा छोटे किसानों को मिल सकता है। उदाहरण के लिए किसी किसान के पास केवल कुछ एकड़ जमीन है और उसे साल में कुछ ही दिनों के लिए रोटावेटर, सीड ड्रिल, मल्चर या रीपर की आवश्यकता होती है। ऐसे किसान के लिए पूरी मशीन खरीदना आर्थिक रूप से उचित नहीं हो सकता। CHC से मशीन किराए पर लेकर वह कम लागत में अपना कृषि कार्य पूरा कर सकता है। दूसरी ओर CHC संचालक एक ही मशीन को अलग-अलग किसानों को किराए पर देकर उसका बेहतर उपयोग कर सकता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। केवल मशीन खरीद लेना CHC को सफल नहीं बनाता। CHC की सफलता के लिए स्थानीय किसानों की वास्तविक जरूरत, मशीनों की मांग, फसल पैटर्न, क्षेत्रफल, मशीनों का रखरखाव, ऑपरेटर की उपलब्धता और किराए की उचित दर जैसे कई पहलुओं पर ध्यान देना होगा। जिस क्षेत्र में धान की खेती अधिक है, वहां धान से संबंधित मशीनों की मांग अधिक हो सकती है। गेहूं, सोयाबीन, चना, मक्का या अन्य फसलों वाले क्षेत्रों में मशीनों की जरूरत अलग हो सकती है।

इसलिए आवेदन करने से पहले अपने क्षेत्र का कृषि सर्वेक्षण करना समझदारी होगी। आसपास के गांवों में किसानों से पता करें कि उन्हें किन कृषि यंत्रों की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है। यह भी देखें कि पहले से कितने ट्रैक्टर और कृषि यंत्र उपलब्ध हैं तथा कौन-सी मशीनें किसानों को समय पर नहीं मिल पातीं। यदि किसी मशीन की मांग बहुत ज्यादा है और उपलब्धता कम है, तो CHC के लिए वह मशीन आर्थिक रूप से अधिक उपयोगी हो सकती है।

किसानों के लिए भी यह योजना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक कृषि यंत्रों की उपलब्धता खेती में समय और श्रम दोनों बचा सकती है। सही समय पर बुवाई और कटाई होने से फसल प्रबंधन बेहतर हो सकता है। फसल अवशेष प्रबंधन जैसी गतिविधियों में भी मशीनों की भूमिका बढ़ रही है। खासकर ऐसे समय में जब ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि मजदूरों की उपलब्धता और मजदूरी दोनों कई जगह चुनौती बन रहे हैं, कृषि यंत्रीकरण किसानों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बनता जा रहा है।

हालांकि किसानों को मशीन किराए पर लेते समय भी सावधानी बरतनी चाहिए। मशीन की स्थिति, किराया, ईंधन का खर्च, ऑपरेटर का शुल्क, मशीन उपलब्ध होने का समय और किसी नुकसान की जिम्मेदारी पहले से स्पष्ट कर लेनी चाहिए। केवल कम किराया देखकर मशीन बुक करना उचित नहीं है। खराब या अनुपयुक्त मशीन से समय और पैसा दोनों का नुकसान हो सकता है।

जो लोग CHC खोलने के लिए आवेदन करने जा रहे हैं, उन्हें आवेदन की पूरी प्रक्रिया आधिकारिक पोर्टल और संबंधित कृषि विभाग के निर्देशों के अनुसार ही पूरी करनी चाहिए। आवेदन के नाम पर किसी अनधिकृत व्यक्ति या एजेंट को पैसे देने से बचें। ₹10,000 की निर्धारित बैंक ड्राफ्ट राशि और अन्य दस्तावेजों के संबंध में केवल आधिकारिक सूचना को आधार बनाएं। सोशल मीडिया पर चल रही अधूरी या पुरानी जानकारी पर भरोसा करने के बजाय विभागीय निर्देशों की पुष्टि करना जरूरी है।

ऑनलाइन आवेदन के लिए निर्धारित पोर्टल उपलब्ध कराया गया है: CHC मध्य प्रदेश आवेदन पोर्टल - http://www.chc.mpdag.org

आवेदन की महत्वपूर्ण तारीखों को एक बार फिर ध्यान में रखें। ऑनलाइन आवेदन 7 अगस्त से 21 अगस्त 2026 तक किए जा सकेंगे। जिलावार प्राथमिकता निर्धारित करने के लिए कंप्यूटरीकृत लॉटरी 22 अगस्त 2026 को दोपहर 12 बजे होगी। लॉटरी के बाद सूची 22 अगस्त को शाम 5 बजे से पोर्टल पर देखी जा सकेगी। इसके बाद दस्तावेज और ₹10,000 के बैंक ड्राफ्ट जमा करने की प्रक्रिया 24 और 25 अगस्त 2026 को पूरी करनी होगी।

किसी भी इच्छुक आवेदक को अंतिम तारीख 21 अगस्त का इंतजार नहीं करना चाहिए। पहले अपनी पात्रता जांचें, जरूरी दस्तावेज तैयार करें, बैंक ड्राफ्ट समय से बनवाएं और ऑनलाइन आवेदन सावधानीपूर्वक पूरा करें। आवेदन भरते समय मोबाइल नंबर, बैंक संबंधी जानकारी, पता और अन्य विवरण सही दर्ज करें। आवेदन जमा करने के बाद उसकी रसीद या आवेदन संख्या सुरक्षित रखें, क्योंकि आगे की प्रक्रिया में इसकी आवश्यकता पड़ सकती है।

यह योजना उन लोगों के लिए विशेष अवसर हो सकती है जो कृषि क्षेत्र में रोजगार या व्यवसाय का नया मॉडल विकसित करना चाहते हैं। लेकिन CHC को सफल बनाने के लिए केवल सरकारी योजना पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। मशीनों का सही चयन, समय पर सर्विस, प्रशिक्षित ऑपरेटर, किसानों तक आसान पहुंच और पारदर्शी किराया व्यवस्था ही इसे लंबे समय तक टिकाऊ बना सकती है।

किसानों के नजरिए से भी यह पहल तभी सफल मानी जाएगी जब CHC वास्तव में गांवों के नजदीक आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराएं और किसान उचित किराए पर समय पर मशीन प्राप्त कर सकें। यदि मशीनें कागजों पर उपलब्ध रहें लेकिन फसल के महत्वपूर्ण समय पर किसान को मशीन न मिले, तो योजना का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए निगरानी, मशीनों की वास्तविक उपलब्धता और किसानों की सुविधा पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए।

मध्य प्रदेश में 1,000 कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य निश्चित रूप से बड़ा अवसर है। जरूरत इस बात की है कि इच्छुक लोग इसे केवल आवेदन और लॉटरी तक सीमित न रखें, बल्कि अपने क्षेत्र की कृषि जरूरतों को समझकर व्यावहारिक और टिकाऊ कृषि सेवा केंद्र के रूप में विकसित करें। वहीं किसानों को भी आधुनिक मशीनों की सुविधा गांव के स्तर पर मिले, ताकि खेती का समय, श्रम और लागत कम हो सके।

अगर आप मध्य प्रदेश में CHC खोलने की योजना बना रहे हैं, तो 7 से 21 अगस्त 2026 की आवेदन अवधि, ₹10,000 के बैंक ड्राफ्ट, 22 अगस्त की दोपहर 12 बजे होने वाली कंप्यूटरीकृत लॉटरी और 24-25 अगस्त को दस्तावेज जमा करने की तारीख को जरूर याद रखें। जानकारी की पुष्टि आधिकारिक पोर्टल और संबंधित कृषि विभाग से करें और किसी भी बिचौलिए के झांसे में न आएं।

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“कुर्सी प्रेमियों का कृषि प्रधान देश है भारत।”
- हरिशंकर परसाई

व्यंग्य छोटा है, लेकिन सवाल बहुत बड़ा है। देश को कृषि प्रधान कहा जाता है, किसान को अन्नदाता कहा जाता है, लेकिन जब किसान की असली समस्याओं की बात आती है तो व्यवस्था अक्सर कुर्सी, फाइल और आंकड़ों के बीच कहीं खो जाती है।

किसान खेत में धूप, बारिश और मौसम की मार झेलकर अन्न पैदा करता है। उसकी लागत बढ़ती है, खाद के लिए लाइन लगती है, कभी बीज महंगा मिलता है, कभी बाजार में फसल का उचित दाम नहीं मिलता। लेकिन किसान की समस्या पर चर्चा अक्सर तब होती है जब वह सड़क पर उतरता है।

विडंबना यह है कि किसान को अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन करना पड़ता है। सवाल यह होना चाहिए कि अगर सरकार और प्रशासन की व्यवस्था किसानों की समस्याओं को पहले ही समझ ले, तो किसान को आंदोलन की नौबत ही क्यों आए?

कृषि प्रधान देश की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होनी चाहिए कि यहां कितने किसान हैं या कितनी कृषि भूमि है। असली पहचान यह होनी चाहिए कि किसान की आय, उसकी लागत, उसकी फसल का मूल्य और उसकी मेहनत को व्यवस्था कितनी गंभीरता से समझती है।

परसाई जी का यह व्यंग्य आज भी इसलिए चुभता है, क्योंकि सवाल सिर्फ कुर्सी का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें कुर्सी बचाना प्राथमिकता बन जाए और किसान की समस्या बाद की बात।

किसान को भाषण नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें खाद निर्धारित कीमत पर मिले, फसल का उचित बाजार मिले, बिचौलियों पर नियंत्रण हो, सिंचाई और बिजली की सुविधा मिले और प्राकृतिक आपदा में राहत समय पर पहुंचे।

कुर्सी पर बैठने वाले बदलते रहेंगे, लेकिन खेत में किसान वही रहेगा। इसलिए सत्ता की कुर्सी से ज्यादा महत्वपूर्ण उस किसान की स्थिति होनी चाहिए, जिसके खेत से देश की रसोई चलती है।

कृषि प्रधान देश में किसान अगर अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर है, तो सवाल किसान से नहीं, व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।

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किसान भाइयों, अगर आपके खेत की मिट्टी धीरे-धीरे सख्त होती जा रही है, उसमें पानी का निकास ठीक नहीं है, फसल के बाद मिट्टी भुरभुरी नहीं रहती और खाद डालने के बावजूद उत्पादन पहले जैसा नहीं मिल रहा, तो आपको खेत में मौजूद एक छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण जीव पर ध्यान देना चाहिए और वह है केंचुआ। केंचुए को अक्सर किसान खेत का प्राकृतिक मजदूर कहते हैं, क्योंकि यह मिट्टी के अंदर लगातार काम करता है। यह जैविक पदार्थों को तोड़ने में मदद करता है, मिट्टी में सुरंगें बनाता है, जिससे हवा और पानी का आवागमन बेहतर होता है और मिट्टी की संरचना में सुधार आता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि कई खेतों में आज केंचुओं की संख्या पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है। इसका सीधा असर मिट्टी की जैविक गुणवत्ता और लंबे समय में खेती की उत्पादकता पर पड़ सकता है।

केंचुओं की संख्या कम होने का सबसे बड़ा कारण खेत में जैविक पदार्थों की कमी है। केंचुए मिट्टी में पड़े सड़े-गले जैविक पदार्थ, फसल अवशेष और अन्य कार्बनिक पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन आज बहुत से खेतों में गोबर की सड़ी हुई खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद और फसल अवशेषों का इस्तेमाल कम हो गया है। किसान धान या गेहूं की कटाई के बाद अवशेषों को खेत में मिलाने के बजाय जला देते हैं या खेत से बाहर निकाल देते हैं। इसका मतलब यह है कि मिट्टी में केंचुओं के लिए भोजन लगातार कम होता जा रहा है। जब भोजन ही नहीं होगा तो केंचुओं की संख्या बढ़ना मुश्किल है।

दूसरी बड़ी समस्या है खेत में रसायनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल। हर कीट दिखाई देने पर तुरंत कीटनाशक का छिड़काव, हर खरपतवार के लिए जरूरत से ज्यादा खरपतवारनाशी और एक ही फसल में बार-बार रसायनों का इस्तेमाल मिट्टी के जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल स्थिति नहीं बनाता। इसका मतलब यह नहीं है कि किसानों को कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। जहां कीट आर्थिक नुकसान की स्थिति तक पहुंच चुका हो, वहां फसल और पंजीकृत लेबल के अनुसार सही दवा, सही मात्रा और सही समय पर इस्तेमाल करना जरूरी है। लेकिन बिना समस्या पहचाने बार-बार छिड़काव करना मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

अगर आप अपने खेत में केंचुओं की संख्या बढ़ाना चाहते हैं तो सबसे पहला काम खेत में जैविक पदार्थ वापस लाना है। अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद लगभग 2 से 5 टन प्रति एकड़, खेत की जरूरत और मिट्टी की स्थिति के अनुसार, उपयोग की जा सकती है। यदि पर्याप्त गोबर की खाद उपलब्ध नहीं है तो फसल अवशेषों को उचित तरीके से सड़ाकर कम्पोस्ट बनाएं और खेत में वापस मिलाएं। धान की पराली, गेहूं का भूसा, सूखी पत्तियां और अन्य फसल अवशेष अगर सही तरीके से अपघटित होकर मिट्टी में लौटते हैं तो वे मिट्टी के जैविक पदार्थ को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

हरी खाद भी इस दिशा में बहुत उपयोगी विकल्प हो सकती है। ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसल को उचित अवस्था पर मिट्टी में पलटने से खेत में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन दोनों की आपूर्ति में मदद मिलती है। लेकिन ध्यान रखें कि जैविक पदार्थ डालने का मतलब यह नहीं कि तुरंत अगले दिन केंचुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाएगी। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसके लिए लगातार कई फसल चक्रों तक मिट्टी का वातावरण सुधारना पड़ता है।

दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है मिट्टी में उचित नमी बनाए रखना। केंचुओं को नमी पसंद होती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि खेत में हमेशा पानी भरा रहना चाहिए। लगातार जलभराव से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है और पौधों की जड़ों के साथ-साथ मिट्टी के जीवों के लिए भी प्रतिकूल वातावरण बन सकता है। दूसरी तरफ बहुत लंबे समय तक मिट्टी पूरी तरह सूखी रहने पर केंचुओं की सक्रियता और प्रजनन दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सिंचाई और जल निकास का संतुलन बहुत जरूरी है।

इस काम में फसल अवशेषों की मल्चिंग भी मदद कर सकती है। खेत की सूखी घास, पत्तियां या उचित रूप से तैयार फसल अवशेषों की परत मिट्टी की सतह को सीधे धूप और तेज गर्मी से बचाती है तथा नमी के नुकसान को कम करती है। जैसे-जैसे यह जैविक सामग्री सड़ती है, मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ भी जुड़ता है। इस तरह एक ही उपाय से मिट्टी की नमी और केंचुओं के भोजन दोनों में सुधार किया जा सकता है।

तीसरी महत्वपूर्ण बात है अनावश्यक जुताई को कम करना। बहुत अधिक और बार-बार जुताई करने से मिट्टी की प्राकृतिक संरचना टूट सकती है और मिट्टी में रहने वाले कई जीवों का आवास प्रभावित हो सकता है। रोटावेटर, हैरो या अन्य उपकरणों का इस्तेमाल केवल इसलिए बार-बार न करें कि खेत बिल्कुल पाउडर जैसा दिखाई दे। फसल और मिट्टी की आवश्यकता के अनुसार न्यूनतम या संरक्षण जुताई अपनाने की कोशिश करें। खासकर उन खेतों में जहां मिट्टी की संरचना पहले से अच्छी है, अनावश्यक जुताई से बचना अधिक उपयोगी हो सकता है।

रासायनिक उर्वरकों के मामले में भी संतुलन जरूरी है। यूरिया, डीएपी, पोटाश या अन्य उर्वरकों को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं है। फसल को जितने पोषक तत्व चाहिए, उनकी आपूर्ति मिट्टी परीक्षण और फसल की आवश्यकता के आधार पर करनी चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब किसान अनुमान से बहुत ज्यादा मात्रा में उर्वरक डालते हैं। उदाहरण के लिए, केवल यह सोचकर कि ज्यादा यूरिया डालने से ज्यादा उपज मिलेगी, जरूरत से अधिक नाइट्रोजन देना सही रणनीति नहीं है। संतुलित पोषण के साथ जैविक पदार्थों की आपूर्ति करना मिट्टी के दीर्घकालीन स्वास्थ्य के लिए बेहतर तरीका है।

कीटनाशकों के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होता है। अगर फसल में कीट मौजूद है तो पहले उसकी सही पहचान करें। उसके बाद आर्थिक क्षति स्तर, फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि सलाह के आधार पर उपचार करें। किसी भी कीटनाशक की मात्रा केवल सामान्य सलाह देखकर तय नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अलग-अलग उत्पादों में सक्रिय तत्व की सांद्रता अलग हो सकती है। उदाहरण के लिए किसी उत्पाद पर 20% SC, 50% EC या 75% WG लिखा है तो तीनों को एक समान मात्रा में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हमेशा उत्पाद के लेबल पर दी गई फसल, कीट, मात्रा, पानी की मात्रा और प्रतीक्षा अवधि का पालन करें।

खरपतवारनाशी के मामले में भी जरूरत से ज्यादा मात्रा डालना बहुत बड़ी गलती है। किसान कई बार सोचते हैं कि अगर अनुशंसित मात्रा से ज्यादा दवा डालेंगे तो खरपतवार पूरी तरह खत्म हो जाएगा। लेकिन इससे फसल पर फाइटोटॉक्सिसिटी का खतरा बढ़ सकता है और मिट्टी के जैविक तंत्र पर भी अनावश्यक दबाव पड़ सकता है। इसलिए उदाहरण के लिए यदि किसी उत्पाद की अनुशंसित मात्रा 400 मिलीलीटर प्रति एकड़ है तो केवल अनुमान से उसे 600 या 800 मिलीलीटर करना सही नहीं है। सही मात्रा हमेशा संबंधित उत्पाद के पंजीकृत लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से तय होनी चाहिए।

अगर किसी खेत में केंचुए लगभग दिखाई ही नहीं देते हैं तो बाहर से केंचुए लाने का विचार भी कुछ किसान अपनाते हैं। लेकिन केवल केंचुए खरीदकर खेत में छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। अगर खेत में जैविक पदार्थ नहीं है, मिट्टी बहुत सूखी रहती है, लगातार जलभराव होता है या रसायनों का अत्यधिक इस्तेमाल होता है, तो बाहर से लाए गए केंचुए भी लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे। इसलिए पहले खेत का वातावरण सुधारना जरूरी है। यदि वर्मी कम्पोस्ट इकाई से केंचुए प्राप्त किए जा रहे हैं तो स्वस्थ और उपयुक्त प्रजाति तथा विश्वसनीय स्रोत का चयन करें।

यह भी समझना जरूरी है कि केंचुए की संख्या हर खेत में एक जैसी नहीं हो सकती। मिट्टी का प्रकार, जैविक कार्बन, नमी, तापमान, फसल प्रणाली और प्रबंधन पद्धति के अनुसार इनकी संख्या बदलती रहती है। इसलिए केवल एक दिन खेत खोदकर कुछ केंचुए मिल गए या नहीं मिले, इसी आधार पर मिट्टी को स्वस्थ या खराब घोषित नहीं किया जा सकता। लगातार 2 से 3 फसल चक्रों तक खेत में जैविक पदार्थ, नमी प्रबंधन और कम जुताई जैसी व्यवस्थाओं को अपनाने के बाद बदलाव को देखना ज्यादा सही तरीका है।

किसान भाइयों, एक बात हमेशा याद रखिए कि मिट्टी केवल रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का मिश्रण नहीं है। यह एक जीवित तंत्र है, जिसमें सूक्ष्मजीव, केंचुए और दूसरे जीव लगातार काम करते रहते हैं। जब हम खेत में जैविक पदार्थ वापस देते हैं, फसल अवशेषों को मिट्टी में लौटाते हैं, हरी खाद का इस्तेमाल करते हैं, उचित नमी बनाए रखते हैं, अनावश्यक जुताई कम करते हैं और कीटनाशकों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करते हैं, तो धीरे-धीरे मिट्टी का वातावरण बेहतर होने लगता है।

केंचुए को बढ़ाना कोई एक दिन का उपाय नहीं है और न ही कोई ऐसी दवा है जिसे डालते ही खेत में हजारों केंचुए पैदा हो जाएं। यह मिट्टी के पूरे प्रबंधन को सुधारने की प्रक्रिया है। अगर आप लगातार 1 से 3 वर्षों तक जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाते हैं, फसल अवशेषों को खेत में वापस लाते हैं, पानी का सही प्रबंधन करते हैं और रसायनों का इस्तेमाल केवल आवश्यकता और अनुशंसित मात्रा के अनुसार करते हैं, तो मिट्टी की संरचना और जैविक गतिविधि में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

इसलिए अगली बार जब आप अपने खेत में केंचुआ देखें तो उसे केवल एक छोटा जीव समझकर नजरअंदाज मत कीजिए। यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आपकी मिट्टी में जैविक गतिविधि मौजूद है। लेकिन लक्ष्य केवल केंचुओं की संख्या बढ़ाना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य ऐसी स्वस्थ मिट्टी बनाना होना चाहिए जिसमें जैविक पदार्थ, पोषक तत्व, हवा, पानी और सूक्ष्मजीवों का संतुलन बना रहे। स्वस्थ मिट्टी ही लंबे समय तक स्वस्थ फसल और स्थिर उत्पादन की नींव बनती है।

अगर आपके खेत में केंचुए लगातार कम हो रहे हैं, तो आज से ही तीन चीजों पर काम शुरू कीजिए। पहली, जैविक पदार्थ बढ़ाइए। दूसरी, मिट्टी में नमी और जल निकास का संतुलन रखिए। तीसरी, अनावश्यक जुताई और जरूरत से ज्यादा रसायनों के इस्तेमाल को कम कीजिए। गोबर की सड़ी खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और फसल अवशेषों को खेत में वापस लाने की आदत बनाइए। यही छोटे-छोटे बदलाव आने वाले वर्षों में आपकी मिट्टी की उर्वरता, संरचना और खेती की लागत पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। अगर आपको यह जानकारी उपयोगी लगी हो तो इसे दूसरे किसान भाइयों तक जरूर पहुंचाइए, क्योंकि अच्छी खेती की शुरुआत केवल अच्छी फसल से नहीं, बल्कि स्वस्थ मिट्टी से होती है।

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अन्नदाता के संघर्ष का असली फायदा किसे मिल रहा है?
किसान MSP, कर्जमाफी और मुआवजे के लिए आंदोलन करता है।
किसान-पुत्र शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक के खिलाफ लड़ता है।
सवाल सिर्फ इतना है-आखिर किसान और किसान पुत्र ही क्यों संघर्ष करें?
“फलदार पौधा लगाने में एक छोटी-सी गलती आने वाले कई वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकती है। बारिश के मौसम में पौधा लगाना सही है, लेकिन क्या आप उसे सही तरीके से लगा रहे हैं?”

भारत में बागवानी किसानों की आय बढ़ाने और खेती को अधिक विविध बनाने का महत्वपूर्ण माध्यम बन रही है। वर्षा ऋतु में आम, लीची, अमरूद और कई खट्टे फलों जैसे सदाबहार फलदार पौधों का रोपण उपयुक्त माना जाता है। लेकिन बाग लगाना केवल पौधा खरीदकर गड्ढे में डाल देने का काम नहीं है। पौधे की गुणवत्ता, सही किस्म, भूमि का चयन, जलनिकास, रोपण की गहराई और शुरुआती देखभाल ही आने वाले वर्षों में बाग की सफलता तय करती है।

सबसे पहली गलती किसान पौधे खरीदते समय करते हैं। केवल सस्ता पौधा देखकर खरीदना भविष्य में महंगा पड़ सकता है। पौधे हमेशा विश्वसनीय नर्सरी, कृषि विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थान या मान्यता प्राप्त पौधशाला से ही खरीदें। पौधा स्वस्थ, मजबूत और रोगमुक्त होना चाहिए। जड़ों में सड़न या गांठें नहीं होनी चाहिए और तना मजबूत होना चाहिए। कलमी पौधे में कलम और मूलवृंत का जोड़ भी स्वस्थ होना चाहिए।

दूसरी बड़ी गलती है बिना भूमि की स्थिति समझे बाग लगा देना। पौधा लगाने से पहले मिट्टी की जांच कराना उपयोगी है। सबसे महत्वपूर्ण है खेत में जलनिकास की व्यवस्था। वर्षा के मौसम में लगातार पानी जमा रहने से जड़ों में ऑक्सीजन की कमी हो सकती है और जड़-सड़न जैसे रोगों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए जहां जलभराव की संभावना हो, वहां पहले नालियां बनाकर अतिरिक्त पानी बाहर निकालने की व्यवस्था करें।

गड्ढे भी पौधा लगाने के ठीक समय पर नहीं, बल्कि पहले से तैयार करना बेहतर होता है। आम, लीची, अमरूद जैसे बड़े फलदार पौधों के लिए सामान्य परिस्थितियों में 1×1×1 मीटर के गड्ढे उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन अंतिम आकार मिट्टी, फल प्रजाति, मूलवृंत और स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार तय किया जाना चाहिए।

अब आती है सबसे महत्वपूर्ण बात-पौधे को कितनी गहराई में लगाना है। नए पौधे को जरूरत से ज्यादा गहरा लगाने की गलती बिल्कुल न करें। पौधे को लगभग उसी गहराई पर लगाएं जिस गहराई पर वह नर्सरी में था। कलमी पौधे में कलम का जोड़ मिट्टी की सतह से ऊपर रहना चाहिए। इसे मिट्टी में दबा देना आगे चलकर पौधे के विकास में समस्या पैदा कर सकता है।

पौधा लगाने के बाद मिट्टी को हल्के हाथ से दबाएं ताकि जड़ों के आसपास बड़ी हवा की जगह न रहे। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार हल्की सिंचाई करें। बारिश हो रही है तो बार-बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं होती। याद रखें, पौधे के लिए पानी जरूरी है, लेकिन जड़ों के आसपास लगातार पानी जमा रहना नुकसानदायक हो सकता है।

वर्षा ऋतु में नए पौधों को तेज हवा और आंधी से भी नुकसान हो सकता है। इसलिए पौधे को मजबूत खूंटी का सहारा देना चाहिए। खासकर युवा पौधों को सहारा देने से उनके गिरने और जड़ों के हिलने की संभावना कम होती है।

पौधे के आसपास उचित मल्चिंग भी उपयोगी हो सकती है। सूखी घास, पत्तियां या उपयुक्त जैविक मल्च मिट्टी में नमी बनाए रखने और खरपतवार नियंत्रण में मदद कर सकते हैं। लेकिन मल्च को सीधे पौधे के तने से सटाकर नहीं रखना चाहिए। तने के आसपास थोड़ी जगह खाली रखें, ताकि लगातार नमी के कारण तना-संबंधी रोगों का खतरा न बढ़े।

नए बाग में रोग-कीट प्रबंधन के लिए बीमारी आने का इंतजार करना भी एक बड़ी गलती है। शुरुआत से ही पौधों की नियमित निगरानी करें। रोगग्रस्त पौध सामग्री को बाग में लगाने से बचें और संक्रमित पौधों को स्वस्थ पौधों से अलग रखें। जैविक नियंत्रण एजेंट या जैव उर्वरक का प्रयोग भी स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार किया जा सकता है।

एक और महत्वपूर्ण गलती है नए लगाए गए पौधे में तुरंत भारी मात्रा में यूरिया या अन्य रासायनिक उर्वरक डाल देना। नए पौधे की जड़ें अभी स्थापित हो रही होती हैं। इसलिए बिना आवश्यकता और बिना वैज्ञानिक सिफारिश के अधिक रासायनिक उर्वरक डालने से बचें। आगे चलकर पोषण प्रबंधन मिट्टी की जांच और स्थानीय अनुशंसा के आधार पर करें।

किसान भाई यह भी समझें कि हर फलदार पौधे के लिए एक जैसी दूरी, एक जैसा गड्ढा और एक जैसी खाद की मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती। आम, लीची, अमरूद, नींबू वर्गीय फल और अन्य फसलों की जरूरतें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए प्रजाति, किस्म, मूलवृंत, मिट्टी और स्थानीय जलवायु के अनुसार तकनीकी सलाह लेना अधिक सुरक्षित है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में बाग लगाने की रणनीति भी बदलनी होगी। अनियमित बारिश, अचानक अत्यधिक वर्षा, लंबे सूखे अंतराल, बढ़ता तापमान और बदलते रोग-कीट दबाव को ध्यान में रखते हुए फल प्रजाति और किस्म का चयन करें। जहां बारिश अधिक होती है वहां जलनिकास को प्राथमिकता दें और जहां पानी की कमी रहती है वहां जल संरक्षण की व्यवस्था पहले से बनाएं।

फलदार बाग एक-दो मौसम का निवेश नहीं होता। एक बार पौधा लगाने के बाद किसान कई वर्षों तक उसकी देखभाल करता है और उसी से भविष्य की आय की उम्मीद रखता है। इसलिए पौधा खरीदने में जल्दबाजी, गलत किस्म का चुनाव, जलभराव, गलत गहराई पर रोपण या शुरुआती देखभाल में लापरवाही आने वाले वर्षों में उत्पादन और आय दोनों को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए पौधा लगाने से पहले केवल यह न सोचें कि “पौधा कब लगाना है?” बल्कि यह भी सोचें कि “कौन सा पौधा लगाना है, कहां लगाना है, कितनी दूरी पर लगाना है और लगाने के बाद उसकी देखभाल कैसे करनी है?”

याद रखें-अच्छी पौध सामग्री + सही किस्म + सही समय + उचित दूरी + सही रोपण गहराई + अच्छा जलनिकास + वैज्ञानिक पोषण + नियमित निगरानी = स्वस्थ और लाभदायक बाग।

इस वर्षा ऋतु में फलदार पौधे लगाने की योजना है तो सबसे पहले खेत की तैयारी करें, जलनिकास सुनिश्चित करें और गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री का चयन करें। केवल पौधा लगाना लक्ष्य नहीं होना चाहिए; ऐसा पौधा लगाना लक्ष्य होना चाहिए जो आने वाले वर्षों में स्वस्थ होकर अच्छी पैदावार और बेहतर आमदनी दे सके।

नोट: फल प्रजाति, किस्म, मूलवृंत, मिट्टी और स्थानीय जलवायु के अनुसार रोपण दूरी, गड्ढे का आकार, पोषक तत्व और पौध संरक्षण की सिफारिशें अलग हो सकती हैं। किसी भी कृषि-रसायन का प्रयोग संबंधित फसल पर पंजीकृत लेबल, स्वीकृत उपयोग और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की नवीनतम अनुशंसा के अनुसार ही करें।
किसानों के हिस्से की खाद अगर दूसरे राज्य भेजी जा रही है, तो सवाल सिर्फ 100 कट्टे DAP का नहीं, पूरी व्यवस्था की निगरानी का है।

राजस्थान के सवाई माधोपुर से सामने आया मामला किसानों के लिए गंभीर चिंता पैदा करता है। छाण पुलिस चौकी पर तिरपाल से ढकी एक पिकअप को रोककर जांच की गई तो उसमें करीब 100 कट्टे DAP खाद मिले। कृषि विभाग की जांच में खाद को मध्यप्रदेश ले जाने की बात सामने आने के बाद पिकअप चालक, मध्यप्रदेश निवासी व्यक्ति और खाद विक्रेता समेत तीन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई गई।

सवाल यह है कि जब खाद की उपलब्धता को लेकर किसान परेशान हैं, तब इतनी बड़ी मात्रा में DAP जिले से बाहर कैसे जा रही थी?

किसानों को खाद के लिए घंटों लाइन में लगना पड़ता है। कई जगह स्टॉक खत्म होने की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे माहौल में अगर 100-100 कट्टों की खेप दूसरे राज्य भेजे जाने लगे, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे कि खाद की सप्लाई चेन में आखिर कहां और कैसे गड़बड़ी हो रही है।

बताई गई जानकारी के अनुसार, पिकअप चालक से पूछताछ में खाद को मध्यप्रदेश के जावदेश्वर गांव निवासी व्यक्ति तक पहुंचाने की बात सामने आई। कृषि विभाग की जांच में यह खाद सवाई माधोपुर शहर स्थित एक खाद विक्रेता की दुकान से खरीदी जाना बताया गया है। इसके बाद विभाग की ओर से तीन लोगों के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया गया।

यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल खाद के परिवहन तक सीमित नहीं है। जांच का असली मुद्दा यह होना चाहिए कि यह खाद किसके नाम पर खरीदी गई, किस रिकॉर्ड में दर्ज हुई, किस किसान या संस्था के लिए आवंटित थी और आखिर मध्यप्रदेश तक पहुंचाने की नौबत क्यों आई?

अगर खाद वास्तव में अवैध रूप से दूसरे राज्य भेजी जा रही थी, तो केवल वाहन पकड़ना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। पूरी सप्लाई चेन की जांच होनी चाहिए। दुकान का स्टॉक रजिस्टर, बिक्री रिकॉर्ड, बिल, POS मशीन का डेटा, खरीदारों का विवरण और परिवहन से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जानी चाहिए।

क्योंकि एक सवाल बहुत बड़ा है-अगर खाद दुकान से निकली, तो रिकॉर्ड में उसकी बिक्री किसके नाम हुई?

किसानों का आरोप है कि तिरपाल से ढकी पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के जरिए खाद को जिले से बाहर ले जाया जाता है। यदि ऐसे आरोप लगातार सामने आ रहे हैं तो प्रशासन को केवल नाकाबंदी के दौरान वाहन पकड़ने के बजाय सप्लाई चेन की निगरानी भी मजबूत करनी होगी।

यह भी सामने आया है कि पिछले महीने बहरावंडा खुर्द चौकी पर एक पिकअप से करीब 100 कट्टे यूरिया पकड़े गए थे और प्रारंभिक जांच में उसे भी मध्यप्रदेश की ओर ले जाने की बात सामने आई थी। यदि अलग-अलग घटनाओं में एक जैसी स्थिति सामने आ रही है, तो इसे केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय पूरे नेटवर्क और वितरण व्यवस्था की जांच की जरूरत है।

हालांकि, किसी व्यक्ति या विक्रेता को दोषी मानने से पहले जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। FIR दर्ज होना आरोपों की जांच की शुरुआत है, अंतिम दोषसिद्धि नहीं। लेकिन प्रशासन के लिए यह निश्चित रूप से एक संकेत है कि खाद की आवाजाही और वितरण व्यवस्था पर अधिक कड़ी निगरानी की आवश्यकता है।

सबसे ज्यादा नुकसान किसे होता है? किसान को।

जब स्थानीय बाजार में खाद की उपलब्धता कम होती है, तो किसान को लाइन में लगना पड़ता है। समय पर खाद नहीं मिली तो फसल प्रबंधन प्रभावित होता है। और यदि किसान मजबूरी में महंगे दाम पर खाद खरीदता है, तो उसकी खेती की लागत बढ़ जाती है।

सरकार यदि किसानों को निर्धारित दर पर खाद उपलब्ध कराने की बात करती है, तो यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि आवंटित खाद सही जगह और सही लाभार्थियों तक पहुंचे।

इसके लिए कुछ सवालों के जवाब प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देने चाहिए-

100 कट्टे DAP किस स्टॉक से निकली थी?
विक्रेता के रिकॉर्ड में इसकी बिक्री किसके नाम दर्ज थी?
क्या POS मशीन में इन 100 कट्टों की बिक्री दर्ज हुई थी?
खाद को दूसरे राज्य ले जाने की अनुमति किस आधार पर थी?

क्या इससे पहले भी इसी दुकान या संबंधित लोगों के माध्यम से खाद की ऐसी खेप भेजी गई थी?

जिले से बाहर खाद के अवैध परिवहन की निगरानी के लिए क्या व्यवस्था है?

और सबसे महत्वपूर्ण-

जब स्थानीय किसान खाद के लिए परेशान हैं, तो इतनी बड़ी मात्रा में खाद जिले से बाहर कैसे निकल गई?

सवाई माधोपुर में हुई यह कार्रवाई अगर निष्पक्ष और व्यापक जांच तक पहुंचती है, तो इससे खाद की कालाबाजारी और अवैध परिवहन पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। लेकिन कार्रवाई केवल एक पिकअप और तीन आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी जांचना जरूरी है कि इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क तो काम नहीं कर रहा।

किसानों के हिस्से की खाद किसी भी कीमत पर अवैध व्यापार का माध्यम नहीं बननी चाहिए। खाद का वितरण पारदर्शी हो, स्टॉक की ऑनलाइन और भौतिक निगरानी हो, बिक्री रिकॉर्ड की नियमित जांच हो और जहां अनियमितता मिले वहां तत्काल कार्रवाई हो।

किसान खाद के लिए लाइन में खड़ा हो और उसी जिले से खाद की खेप दूसरे राज्य चली जाए-अगर यह सच है तो यह सिर्फ किसान की परेशानी नहीं, बल्कि पूरी वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।

अब जरूरत है कि प्रशासन इस मामले की तह तक जाए और किसानों को यह भरोसा दिलाए कि उनके हिस्से की खाद किसी भी हालत में अवैध तरीके से बाहर नहीं जाएगी।

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