
किसानों का गन्ना भुगतान अटका हुआ है, लेकिन चुनाव नजदीक आने के बावजूद सरकार को इसकी कोई खास चिंता दिखाई नहीं दे रही है। सवाल सिर्फ बकाया भुगतान का नहीं है, सवाल उस किसान का है जिसने महीनों पहले अपना गन्ना मिल को दे दिया, लेकिन आज भी अपनी मेहनत की कमाई के लिए इंतजार कर रहा है।
अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार, लखीमपुर खीरी जिले की तीन चीनी मिलों पर किसानों का करीब 6.47 अरब रुपये गन्ना मूल्य बकाया है। आरसी जारी होने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ है। इसका सीधा असर किसानों की अगली फसल की तैयारी पर पड़ रहा है।
किसान को खेत तैयार करना है, खाद-बीज खरीदना है, सिंचाई करनी है, बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी खर्च पूरे करने हैं। लेकिन जब गन्ने का भुगतान ही समय पर नहीं मिलेगा तो किसान अगली फसल की लागत कहां से लगाएगा?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब किसान अपनी फसल मिल को दे चुका है, तो उसे उसके पैसे के लिए महीनों इंतजार क्यों करना पड़े?
खबर में गन्ना भुगतान के आंकड़े भी सामने आए हैं। गोला चीनी मिल पर 499.85 करोड़ रुपये के गन्ना मूल्य में से 226.65 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ और 264.20 करोड़ रुपये बकाया बताया गया है। पलिया मिल पर 387.05 करोड़ रुपये में से 182.98 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ और 204.07 करोड़ रुपये बकाया है। वहीं खंभारखेड़ा मिल पर 387.84 करोड़ रुपये के मुकाबले 208.41 करोड़ रुपये भुगतान हुआ और 179.43 करोड़ रुपये बकाया बताया गया है।
यानी आंकड़े सिर्फ कागज पर नहीं हैं, इनके पीछे हजारों किसानों की मेहनत और उनके परिवारों की जरूरतें जुड़ी हुई हैं।
किसानों का कहना है कि आरसी जारी होने के बाद भी भुगतान अटका हुआ है। अगर किसान पर बैंक का कर्ज हो और वह समय पर किस्त न दे पाए तो ब्याज बढ़ता है, नोटिस आता है और कार्रवाई का डर रहता है। फिर किसान की फसल का भुगतान अटकने पर जिम्मेदारी किसकी होगी?
किसानों की मांग बिल्कुल स्पष्ट है। न्यायपालिका के आदेशों के अनुसार बकाया मूलधन के साथ ब्याज का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आगामी गन्ना सत्र में किसानों को निर्धारित समय के भीतर भुगतान मिले और भुगतान व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए।
किसान सिर्फ यह नहीं मांग रहा कि उसका पैसा आज दे दिया जाए। किसान चाहता है कि आगे से उसे अपनी फसल का पैसा समय पर मिले, ताकि वह कर्ज के चक्र में फंसने से बच सके।
गन्ना किसान महीनों तक फसल तैयार करता है। खेत में लागत लगाता है, मजदूरी करता है, सिंचाई करता है और फिर अपनी उपज चीनी मिल को देता है। अगर फसल देने के बाद भुगतान के लिए भी महीनों संघर्ष करना पड़े तो आखिर खेती को लाभकारी बनाने की बात कैसे पूरी होगी?
चुनाव आते-जाते रहेंगे, सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन किसान की मेहनत का पैसा किसी राजनीतिक समय-सारणी का इंतजार नहीं कर सकता।
किसान को उसकी फसल का भुगतान समय पर चाहिए।
बकाया भुगतान चाहिए।
ब्याज सहित भुगतान चाहिए।
और आने वाले सत्र में समयबद्ध भुगतान की गारंटी चाहिए।
अगर किसानों का पैसा अटका रहेगा तो इसका असर सिर्फ किसान पर नहीं पड़ेगा। इसका असर गांव की पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। किसान जब भुगतान पाता है तो वही पैसा खाद, बीज, डीजल, मजदूरी, बच्चों की पढ़ाई और स्थानीय बाजार में खर्च होता है। इसलिए समय पर गन्ना भुगतान ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी जरूरी है।
अब सवाल सरकार और प्रशासन से है-
6.47 अरब रुपये से अधिक के बकाये का भुगतान कब होगा?
आरसी जारी होने के बाद भी किसानों को भुगतान के लिए इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?
क्या किसानों को उनके बकाये पर नियमानुसार ब्याज मिलेगा?
और आगामी गन्ना सत्र में क्या किसान को निर्धारित समय सीमा के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा?
किसान किसी पर एहसान नहीं मांग रहा। वह अपनी मेहनत की कमाई मांग रहा है।
अन्नदाता की फसल का पैसा अटकना सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
आपके क्षेत्र में गन्ने का भुगतान समय पर हो रहा है या अभी भी किसानों का पैसा मिलों पर अटका हुआ है? अपनी बात कमेंट में जरूर बताइए।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन जिंदाबाद।
किसान की आवाज बुलंद हो।
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