
क्या यह यूरिया की बिक्री है या किसान की मजबूरी का फायदा उठाने का खेल?
जौनपुर के सुजानगंज से सामने आए एक कथित वीडियो ने खाद की बिक्री और किसानों से वसूली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वीडियो में एक दुकानदार से यूरिया की कीमत पूछी जाती है और बातचीत के दौरान 370 से 380 रुपये प्रति बोरी तक कीमत बताए जाने का दावा किया गया है। वहीं, वीडियो में यह भी कहा गया है कि निर्धारित दर इससे काफी कम है। अगर यह दावा सही है, तो सवाल सिर्फ एक दुकान का नहीं, बल्कि पूरे खाद वितरण तंत्र की निगरानी का है।
किसान जब खाद खरीदने दुकान पर जाता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि उसे खाद निर्धारित कीमत पर मिलेगी या नहीं। किसान अपनी फसल बचाने के लिए मजबूर है। धान, गेहूं या दूसरी फसलों में समय पर यूरिया की जरूरत होती है। अगर खाद की जरूरत के समय किसान को यह कह दिया जाए कि निर्धारित कीमत पर खाद उपलब्ध नहीं है और ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे, तो किसान आखिर जाए कहां?
सामने आए वीडियो में बातचीत के दौरान दुकानदार से यूरिया की कीमत पूछी जाती है। जवाब में 370 से 380 रुपये तक की कीमत बताए जाने का दावा किया गया है। बातचीत में यह भी कहा गया कि निर्धारित कीमत पर यूरिया नहीं दी जा रही है और किसान को सरकारी गोदाम से लेने की सलाह दी जा रही है। यह पूरा घटनाक्रम वीडियो में रिकॉर्ड होने का दावा किया गया है।
अब यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि अगर किसी उर्वरक की बोरी पर MRP निर्धारित है, तो उससे अधिक कीमत वसूलने का आधार क्या है? किसान को खाद खरीदते समय स्पष्ट बिल मिलना चाहिए, निर्धारित मूल्य की जानकारी होनी चाहिए और यदि किसी अतिरिक्त शुल्क का प्रावधान है तो उसकी वैधता भी स्पष्ट होनी चाहिए। केवल किसान की मजबूरी का फायदा उठाकर मनमानी कीमत वसूलना किसी भी स्थिति में उचित नहीं माना जा सकता।
इस मामले में एक और गंभीर सवाल सरकारी दुकानों और समितियों को लेकर भी उठाया गया है। वीडियो में आरोप लगाया गया है कि कुछ सरकारी केंद्रों पर भी निर्धारित दर से अधिक रकम लिए जाने की शिकायतें हैं। यदि ऐसी शिकायतें वास्तव में सामने आ रही हैं, तो संबंधित विभाग को केवल दुकानदारों पर नजर रखने के बजाय सरकारी वितरण केंद्रों की भी जांच करनी चाहिए।
किसान पहले ही डीजल, मजदूरी, बीज, कीटनाशक, सिंचाई और मशीनरी की बढ़ती लागत से परेशान है। ऐसे में अगर एक बोरी यूरिया पर भी अतिरिक्त रकम देनी पड़े तो इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है। छोटी जोत वाले किसान के लिए 100 या 150 रुपये की अतिरिक्त वसूली भी मामूली रकम नहीं होती। अगर किसान को कई बोरी यूरिया खरीदनी पड़े, तो यह अतिरिक्त खर्च सैकड़ों से हजारों रुपये तक पहुंच सकता है।
लेकिन इस पूरे मामले में केवल दुकानदार को दोषी मानकर बात खत्म कर देना भी पर्याप्त नहीं होगा। सवाल यह है कि खाद की बिक्री की निगरानी कौन कर रहा है? दुकानों पर स्टॉक कितना आया, कितने किसानों को दिया गया, किस दर पर दिया गया और किसके नाम पर बिक्री हुई, इसकी जांच व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
अगर किसी दुकान पर निर्धारित दर से अधिक कीमत वसूली जा रही है, तो किसान के पास शिकायत करने का आसान और प्रभावी रास्ता होना चाहिए। शिकायत के बाद सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि मौके पर जांच और दोष साबित होने पर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
और अगर वीडियो में लगाए गए आरोप गलत हैं, तो संबंधित दुकानदार को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। प्रशासन को निष्पक्ष जांच करके यह स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तव में खाद किस कीमत पर बेची जा रही थी, बोरी पर क्या MRP अंकित थी, बिक्री का बिल क्या था और स्टॉक का रिकॉर्ड क्या कहता है।
यही वजह है कि इस मामले में सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है निष्पक्ष जांच।
जौनपुर प्रशासन और कृषि विभाग को सुजानगंज सहित जिले के उन सभी स्थानों पर जांच करनी चाहिए जहां से किसानों द्वारा अधिक कीमत पर यूरिया बेचने की शिकायतें सामने आ रही हैं। दुकानों के स्टॉक रजिस्टर, बिक्री रजिस्टर, POS रिकॉर्ड, बिल और उपलब्ध खाद के बैच की जांच की जानी चाहिए। अगर निर्धारित दर से अधिक वसूली प्रमाणित होती है तो नियमों के अनुसार सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
साथ ही किसानों को भी खाद खरीदते समय कुछ सावधानियां रखनी चाहिए। खाद खरीदते समय बोरी पर अंकित MRP जरूर देखें। संभव हो तो बिक्री की रसीद या बिल जरूर लें। बिना बिल के खाद लेने से बाद में शिकायत साबित करना मुश्किल हो सकता है। यदि कोई दुकानदार निर्धारित कीमत से अधिक पैसे मांगता है, तो किसान संबंधित कृषि विभाग या प्रशासन के समक्ष शिकायत कर सकता है।
सबसे जरूरी बात यह है कि किसान को खाद के लिए किसी दुकानदार के सामने मजबूर होकर अतिरिक्त पैसे देने की स्थिति में नहीं छोड़ा जाना चाहिए। सरकार किसानों को सब्सिडी के माध्यम से उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था करती है। ऐसे में वितरण व्यवस्था का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वास्तविक किसान तक खाद पारदर्शी तरीके से और निर्धारित शर्तों के अनुसार पहुंचे।
यह मामला सिर्फ यूरिया की एक बोरी का नहीं है। यह किसान के अधिकार, खाद की उपलब्धता और सरकारी निगरानी की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।
अगर सुजानगंज में वास्तव में निर्धारित दर से 100 रुपये या उससे अधिक अतिरिक्त वसूले जाने की बात सही साबित होती है, तो यह बेहद गंभीर मामला है। और अगर आरोप गलत हैं, तो जांच के बाद सच्चाई भी जनता के सामने आनी चाहिए।
किसान को न तो खाद के लिए दर-दर भटकना चाहिए और न ही अपनी फसल बचाने के लिए किसी भी कीमत पर खाद खरीदने को मजबूर होना चाहिए।
अब सवाल जौनपुर प्रशासन से है-क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या सुजानगंज में खाद की दुकानों और सरकारी केंद्रों के स्टॉक एवं बिक्री रिकॉर्ड की जांच की जाएगी? क्या किसानों से निर्धारित कीमत से अधिक वसूली की शिकायतों पर कार्रवाई होगी?
और किसान भाइयों से भी सवाल है-आपके गांव में यूरिया किस कीमत पर मिल रही है? क्या आपको निर्धारित दर पर खाद मिल रही है या अतिरिक्त पैसे देने पड़ रहे हैं? क्या आपको बिल या रसीद मिलती है?
अपना अनुभव कमेंट में जरूर बताइए। लेकिन किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय अपनी शिकायत के साथ बिल, रसीद या अन्य उपलब्ध प्रमाण साझा करें, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
किसान की मजबूरी किसी की कमाई का जरिया नहीं बननी चाहिए। खाद की कालाबाजारी या ओवररेटिंग जहां भी प्रमाणित हो, वहां नियम के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
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